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Showing posts from 2010

ये शब्द नहीं आईने हैं

शोर
मज़ाक
ठठोल
झूठ
आडम्बर
स्वार्थ
ये शब्द नहीं आईने हैं
ऐ इतिहास पड़ने वालों
अपना इतिहास क्या ये होगा ?

भूख
शोषण
क्रूरता
कमजोरी
धोखा
ये शब्द नहीं आईने हैं
ऐ कविमन कविवर जानो
अगली कविता में क्या होगा ?

अंधी भीड़
हाथ उठाये नाचते लोग
तेज़ रफ़्तार गाड़ियां
पर्दों पर चमचमाते सितारे
जीवन से दूर काल्पनिक एक दुनिया
पैसे की हवस
ज्ञान का इक दो राहे पे
असमंजस में पड़ जाना
दरत हूँ मैं...
हाँ! डरता हूँ मैं
ऐ धरती के प्यारे बच्चों
की अगली मुठ्ठी में क्या होगा ? (*नन्हे मुन्हे बचों तेरी मुठ्ठी में क्या है...)

बड़ा शहर या कारगर
अपनी जरूरतें या आवारा मन
दासत्व स्वीकार कर चुकी
ठंढी पड़ी धमनियां
डरता हूँ
हाँ! डरता हूँ मैं
ऐ प्यारे मेरे लोगों
के आगे न जाने क्या होगा?

मूक
संवेदनहीन
कीड़े
ये शब्द नहीं आईने हैं
ऐ ज़मीन पर रेंगने वाले
तेरा न जानेक या होगा ?

यूँही मुझको चुप रहने की आदत पड़ी पुरानी है

यूँही मुझको चुप रहने की आदत पड़ी पुरानी है
बात बात पे हंस देता हूँ आँखों में तो पानी है

चुन चुन कर के लाया तिनके पिरो पिरो बुनता रिश्ते
अब के मौसम ऐसा लागे दुनिया मेरी लुट जानी है

माँ का आँचल ऐसा छूटा रूठ गयीं मुझसे नींदें
सारा दिन फिर दुनिया-दारी रोज़ी रोटी कमानी है

रुक रुक करके पीछे देखूं आगे की मैं क्या जाऊं
नए साल में कुछ तो होगा, आस वही पुरानी है

शब्दों की इस माला में मेरी कुछ भावों की डोरी है
दर लगता है साथ में मेरे शायद ये जल जानी है

मैं न जाऊं कब डूबेगी मेरे ख्वाबों की कश्ती
गाल हाथ धरे देख रहा हूँ रात बड़ी तूफानी है








Ckh









आप इसे निदा फाजली जी की लिखी " मुह की बात सुने हर कोई दिल के दर्द को जाने कौन .." की धुन गा के देख सकते हैं...बहर में पूरी तरेह से तो नहीं है ...

याद नहीं कुछ याद नहीं

गो धूलि बेला आई कब थी
याद नहीं कुछ याद नहीं
कब जागा था पहली किरण संग
याद नहीं कुछ याद नहीं

अरसा बीता गौरिया संग
मिट्टी से बिनना दाने वाने
बैठ दुपहरी छाँव में तरु की
सुस्ताना चप्पल रख सिरहाने
कब चालीसा गयी थी मन से
याद नहीं कुछ याद नहीं

भोला सा तो था गाँव मेरा
भोले भाले थें लोग सभी
कब ये मौसम ऐसे बिगाड़ा
गैर हुए कब लोग सभी
कब खुल कर थहाके सुने थें
याद नहीं कुछ याद नहीं

बात उसके समझ न आई कभी

इक सहरांव था मेरे सीने में

पड़ी बंजर इक पथरीली ज़मीन थी जज्बातों की

और था सैलाब अश्कों का मेरी आँखों में

जो न छलका इक भी अश्क मेरी पलकों से

क्यूँ न समझा वो मेरी मजबूरी ....

न करता वो मुझको समझने की जो गलती

तो शायद

बात समझ उसको आजाती

जुगनू कब ख़ुशी स मुट्ठी में बंद हुआ करते हैं

हाथ फैलाकर कभी आँख बंद करके देखो तो

वो तो अक्सर हथेलियाँ दूंदते हैं सुस्ताने को ...

वो न समझा मेरी मजबूरी

बात उसके समझ न आई कभी

मई तो जुगनू हूँ

अन्धीरे से है पहचान मेरी

वो खामोखां उजाले करता था

का मिला हूँ मैं उजालों में

बात उसको कोई समझाए ज़रा

क्यूँ भागूं

इक मीठी सी नींद सुला जा
ऐसी के अब ना जाऊं
जिन सपनों का अर्थ नहीं कुछ
उनके पीछे क्यूँ भागूं

इक उम्मीद

मेरी कलम से निकले हर्फ़
तेरे होटों पे जो आयें
इक उम्मीद बंधी दिल में
के शायद अब मैं जी जाऊं

निकलता था कुशाँ से मैं
झुकाकर सर को कुछ ऐसे
के कोई रोककर मुझको
कहीं ये पूछ न बैठे
बताओ नाम क्या और
किधर निकले हो तुम घर से

बड़ी कमजोर तबीयत थी
बड़ा नाजुक था दिल मेरा
मगर कल रात महफ़िल में
जो तुमने गीत मेरे गाये
इक उम्मीद बंधी दिल में
के शायद अब मैं जी जाऊं

और नया भी क्या होगा

नया साल, पुराने ख़त, तेरी यादें

और नया भी क्या होगा
और नया भी क्या होगा

वही ठंढी, फिजा बरहम, वही सौतन, अँधेरी रात

और नया भी क्या होगा
और नया भी क्या होगा

दबी आवाज़ में कहता हूँ
मैं खुद से ही चुप रहने को
मिटा देंगे ये सुनने वाले

और नया भी क्या होगा

दीवाना मैं हूँ ख़्वाबों का
हकीकत में कब रखा कुछ था
वही बातें दुनिया दारी की
वही जिद-ओ-जहद जिन्दा रहने की

और नया भी क्या होगा
और नया भी क्या होगा

चुभा है शूल सीने में मगर तुम मुस्कराते हो

चुभा है शूल सीने में मगर तुम मुस्कराते हो

बड़े नाजुक हैं ये रिश्ते, इन्हें कैसे निभाते हो



कहो न यार ऐसे भी संजीदा तो नहीं थे तुम

हमी से रोज़ की बातें, हमी से बात छुपाते हो



कहाँ ढूँढूं मैं जाकर के तेरे हिस्से की खुशियाँ अब

मरीज़-ऐ-दिल की हालत भी कहाँ खुलकर बताते हो



पहले दरिया किनारे तुम लिखा करते थे ग़ज़लों को

मगर अब वहां बैठे कागज़ की नावें बहाते हो



कभी तुमने न देखा दर मालिक का लड़कपन में

उम्र गुजरी तो याद आया अब मस्जिद रोज़ जाते हो

कभी कोई नही मेरा, कभी कायनात मेरी है

कभी कोई नही मेरा, कभी कायनात मेरी है
अजब हालत हैं अपने , अलग ही बात मेरी है

अजब है खेल ये यारा दो चार मुहरों का
उधर गर शय कहीं तेरी, इधर फिर मात मेरी है

सुबो से शाम तक मैंने फकत मेहमाँ नवाजी की
करूँ अब खुद से कुछ बातें, ये सारी रात मेरी है

सफीनों को समंदर में है इक दिन समां जाना
यहाँ है आज मेरी बारी, बड़ी खुश बारात मेरी है

सऊबत का असर ऐसा हुआ अंदाज़ पर मेरे
हर शख्स कहे शायर, ग़ज़ल हर बात मेरी है

साथ जिनका मिला एक पल के लिए

साथ जिनका मिला एक पल के लिए

दे गए वो निशानियाँ कल के लिए



पास मेरे है तू आज है ye यकीन

ae खुदा शुक्रिया हर कँवल के लिए



यूँ तो तैयार है ताज ख़्वाबों की ईंट पर

मुमताज चाहिए बस इस महल के लिए



हमको कब थी खबर आप यूँ याद आयेंगे

आपका शुक्रिया इस गज़ल के लिए

आज की रात

लिख चल दिल की बात

खुल कर मेरे यार

आज की रात

क्यूँ न खो जाऊं कहीं

श्याही संग

बन कर जज़्बात

आज की रात



ऐसे तो मुझको nahi

होता कभी

आज हुआ जाने क्यूँ

ढल जा शब्दों में

बन कर कोई बात

आज की रात



कलि कलि गाये तेरा

गीत नया

मुस्का कर यार

ले आ

भावों की बारात

आज की रात

भोले लोग

मारो!मारो! नहीं तो काट लेगा
अरे वो सांप है!
जहरीला है काट लेगा!
पताक! चटाक ! धाड़ धुम !
और यूँ
मारा गया एक और सांप...
मेरे शहर के लोगों को
जहर से सख्त नफरत है
और जहरीले जीवों को
फूटी आँख नहीं देखते ये समझदार लोग
बजबजाती भिनभिनाती
गन्दी नालियां
सरकार साफ नहीं करतीं
वरना इस शहर में तो गन्दगी का नामों निशाँ न होता
वो तो ठेकेदार चोर था
और नेता बिमान
वरना सूरत ही कुछ और होती इस शहर की

आज मुझे कुछ याद आई

इक छुई मुई सी नज़्म लिखी
और लिख मैं भूल गया
आज मुझे कुछ याद आई
आज मुझे कुछ याद आई

कुछ था जीवन पर शायद
या प्रेम की थीं कुछ बातें
आंचन रेशम की साडी का
हर डोर जीवन के नाते
आज मुझे कुछ याद आई

डर था उसको गली में बैठे
कुछ आवारा लड़कों का
उसके घर तक जाती वो
सुनसान अँधेरी सडकों का
आज मुझे कुछ याद आई

पैदल पैदल धीरे धीरे
चुप-चाप चली वो जाती थी
कुछ कम कम होने का मुझको
अहसास पल पल कराती थी
आज मुझे कुछ याद आई

फूल खुशबू के लिये बागों को फिजायें चाहियें

फूल खुशबू के लिये बागों को फिजायें चाहियें
मुझको हंसने के लिए किसकी रजायें चाहियें

लडखडाता रह न जाऊं मैं ठोकरें खाता हुआ
थाम लें जो मुझको अब आज वो बाहें चाहियें

घुटता है दम कैफियत है सांस भारी हो रही
जिंदगी जीने की खातिर ताज़ी हवायें चाहियें

भर न पायें जख्म मेरे याद कर के बीती बात
याद करके भूल जाने की अदायें चाहियें

कसते हैं जो तंज सूरत पर मेरी इस शहर में
ऐ खुदा उनको मेरी माँ सी निगाहें चाहियें




राजयें*: is word ki meaning confirm karni hai mujhe....

न कहीं रहा कोई जिसे हाल-ऐ-दिल कहूं

न कहीं रहा कोई जिसे हाल-ऐ-दिल कहूं
हुआ क़त्ल मैं पर किसे आज कातिल कहूं

मेरी सांस जब रुकी वो था बस एक मेरे करीब
इस शाजिश-ऐ-बद में उसे कैसे शामिल कहूं

मिला जख्म दर्द-ओ-गम मुझे उसके शहर से
अब सोचता मैं के क्या उल्फत-ऐ-हासिल कहूं

यहाँ क्या है गर्द के सिवा हर चीज है मामूली
जिया जाए किसके लिए किसे जीने के काबिल कहूं

वो तो मचलता रहा मिलने को मैं ही नहीं गया
मैं उसे लहर कहूं 'चक्रेश' को साहिल कहूं

ये तो धड़कन का कसूर है जो जिन्दा होने का एहद कराती है

ये तो धड़कन का कसूर है जो जिन्दा होने का एहद कराती है
मौत आये मुझे बरसो गुजारें बस यूँही सांस आती जाती है

सैकड़ों खंजर हैं मेरी छाती में, खूँ का कतरा नहीं है कोई मगर;
काश समझ पाते ये लोग यहाँ, कलम स्याही कहाँ से लाती है ?

बैठे हैं यहाँ आज मेरी महफ़िल में, इस शहर के समझदार कई
हर शेर पे बहोत खूब कहते हैं, जाने कैसे इन्हें हर बात समझ आती है

मेरा साया मुझको हर शाम एक वही पुराना सवाल दे जाता है
सारा दिन मुट्ठी कस कर रखी थी बंद मैंने ये रेत कैसे सरक जाती है

हर शख्स यहाँ सीते आया है घावों को, रफू किये हैं जाने कितने
'चक्रेश' देखना कैसे जिंदगी ये तुझको, एक दिन दरजी बनाती है

मैं पूछता रहा उससे के

मैं पूछता रहा उससे के दरिया-ऐ-हयात गहरा तो नहीं

जूँ न रेंगी उसके कानो पे, नाखुदा कहीं बेहरा तो नहीं?


गहराई वाली जगहों पे दरिया में हलचल कम होती है

मैं पत्थर लेकर देख रहा हूँ, के कहीं पानी ठहरा तो नहीं


लोगों के कन्धों से ऊपर अब सब काला काला दिखता है

किस जुबाँ ये सब लिखा है, फारसी में हर चेहरा तो नहीं


जाने कितने ठुकरायें हैं मैंने, इस आज़ादी की चाहत में

हर ताज देख कर डरता हूँ, कम्बखत कहीं सेहरा तो नहीं



झूठ मूठ का क्यूँ हँसते हो ये मुखोटे उतार फेंको यारों

आईनों की सुनते हो क्यूँ, बदसूरत कोई चेहरा तो नहीं



बैठा है संजीदा सा 'चक्रेश', यहाँ हर महफ़िल में

चुप चुप सा क्यूँ वो रहता है कुछ कहने पे पेहरा तो नहीं

one liners

"मैं नहीं था तो भला वो कौन था जो लिख गया,
के मेरे पहले भी कोई था मेरे जैसा कहीं ........... "

ख्वाब बुनिय ख्वाब में ख़्वाबों ही की जुबाँ...


सोचूँ के न सोचूँ के सोचूँ तो कुछ होता भी नहीं ...

अब के सोऊँ तो न जगाने आना कोई
कई रातों का जागा हुआ हूँ मैं
तुमसा ही मैं भी एक कैदी हूँ यारों
अपनी कैद से भागा हुआ हूँ मैं





मैं हैरान था तो सब थें हैराँ मुझसे
सब थें हैराँ मुझसे सो मैं हैराँ था

इन दरख्तों से आती आवाजों के पीछे

=.== .== === .==, .===== .=====
इन दरख्तों से आती आवाजों के पीछे, कहीं कोई पिन्हा कहानी तो होगी
गौर दे कर कभी खामोशी को सुनिये, कहीं कोई लुटती जवानी तो होगी

अब सियासत को रुसवा रियाया करे क्यूँ,अगर सोचिये तो जी हम भी क्या कम हैं
खुद परस्ती के चोलों में जो खोया अदम है, कहीं पर वो कीमत चुकानी तो होगी

जंगलों से परिंदे हैं गायब अचानक, बड़ी देर से है इक सन्नाटा सा छाया
घोंसलों का न जानूं अब क्या हाल होगा, हवायें चलेंगी रात तूफानी तो होगी

है लहू में जो डूबा ये आलम शहर का, ये लाशों के ढेरों पे रोती जो मायें
आह का असर है होना बस बाकी है नादाँ, लहू संग जाया कुर्बानी तो होगी

अब के मौसम अजब है खिजाएँ न जाएँ, दरिया है सूखा बगिया है वीराँ
फूल देखे ज़माना हुआ आँख प्यासी, कहीं कोई बच्ची हंसानी तो होगी

बाद मेरे न कहना किसी से ये यारों, के इन गलियों में हमारा था आना जाना
मुश्किलों से बड़ी है कुछ शुहरत कमाई, रखों मुह पे ताले ये बचानी तो होगी

बिकता है दुकानों में सब कुछ यहाँ पर, कारोबारी शेहेर है सौदागर ज़माना
जो कभी आप यूँही आजाओ यहाँ तो, कहीं अपनी टोपी छुपानी तो होगी


खाब में भी यहाँ चीखें सुनता रह…

ज़िन्दगी तुने मुझे ये आज क्या सिखला दिया

ज़िन्दगी तुने मुझे ये आज क्या सिखला दिया
सैकड़ों तिमिरों के आगे उजाला दिखला दिया

मैं निर्बोध अबोध बालक निराश ना हताश था
तुने खुद ही दीप नयी आशाओं का जला दिया

क्या नहीं कर लूं अगर मैं ठान लूं करने की तो
भूल गया था अपना तेज़ मैं तुने याद दिला दिया

देखता रह दूर से अब बड़ चलें मेरे कदम
ऐ निराशाओं के सागर तुझको मैंने भुला दिया

तनहा तन्हा

तनहा तन्हा हमको यहाँ लगने लगा है ये jahan
कैसे कटे अब ये सफ़र, कोई nahi है कारवाँ

साहिल पे गुजार दें अब सोचते हैं ये उमर
मौज-ओ-दरिया प्यार का है दूर हमसे अब वहाँ

(मौज-ओ: 22 दरि:12)

इन गुहरों का अब क्या होगा ले आई जिनको लहर
किसे दूँ तोहफे प्यार के है कौन अपना जान-ऐ-जाँ

इस शाम ने हमको रुलाया फिर अपने उसी सवाल से
आया कहाँ से तू बता? अब जाएगा कह तू कहाँ ?

जब ख़ाक हम हो जाएँ तो आना कफ़न पे तुम सबा
आना न इस रात अभी, साया नहीं कोई यहाँ....

तुमने ऐसा क्या किया

तीरे नज़र का दोष है
मारा मारा फिरे है वो
तुमने ऐसा क्या किया
बेचारा फिरे है

तू दिल-फरेब है यहाँ
महफ़िल सजा रहा
क्या पता किसी सह्रांव में
बेसहारा फिरे है वो


इश्क का कसूर है
कुछ होश नहीं उसे
आप का है करम
नाकारा फिरे है वो

आपने घर सजा लिया
हंस कर रकीब संग
आज तलक आस में
कंवारा फिरे है वो

जाना न मज़ार-ऐ-कैश पे
वो अब नहीं वहाँ
कहते हैं आज कल कहीं
आवारा फिरे है वो

एक ख़त आखिरी

शबनमी लिबाज में जो आगयी शाम फिर
एक नज़्म लिख चले लो आप के नाम फिर

जो हम बार-बार चाँद देखने लगे
तारों के पार संसार देखने लगे
उफ़! कहाँ रह गया करने को कोई काम फिर

सोचते थें लिख चलें रूह की पुकार को
एक ख़त आखिरी खोये हुए प्यार को
क्या पता हो न हो आपसे कभी सलाम फिर

आप तो सो गए चैन से हम मगर
रात जागते रहे और हो गयी सेहर
चर्चे अपने प्यार के शेहेर में हुये आम फिर


दाग न लग सके आपके दामन पे कहीं
लोग आप को न कहदें हाय! बेवफा कहीं
सोच के ले लिए हमने सब इल्जाम फिर

हे माँ सरस्वती ज्ञान दे

हे माँ सरस्वती ज्ञान दे
अंतर की निद्रा तोड़ सकूं
तू आज मुझे वरदान दे
चिंता सकल मैं छोड़ सकूं

एक नया उत्साह हो
एक नया उजियाला हो
अपने गीतों से मैं माँ
बिखरे समाज को जोड़ सकूं

भ्रष्ट हुआ संसार ये कह कर
अपना जीवन न बिसराऊँ
औरों से आगे मैं बढ़ कर मैं
ये उलटी धरा मोड़ सकूं

हे माँ सरस्वती ज्ञान दे
वरदान दे

हम को नहीं था ये पता के हम यहाँ मेहमान थें

हम को नहीं था ये पता के हम यहाँ मेहमान थें
सब में रहें कल तक मगर सबसे यहाँ अनजान थें

हमसे सभी कहते रहे करना न तू कभी दिल लगी
रहता मगर कब होश था हम भी बड़े नादान थें

पलकें न भीं/गे यार का दामन सदा महका करे
सबसे अलग हो इक जहाँ अपने अजब अरमान थें

जिनसे कभी कुछ न गिला वो भी रंज जताने लगे
राहें न थीं सीधी कभी हर बात पे फरमान थें


==.=/==.=/==.=
jeena yahan, marna yahan....

bachpan

बंद वहाँ उस कमरे में भरी दुपहरी मेरा bachpan
हाय! कब तक शाम के इंतज़ार में रह पता
लू क्या होती मैं क्या जानू
डर तो बस दादी की फटकार का रहता था

दूर से आतीं सायें सायें की आवाजें
बागीचे मुझको बुलाते थें
और मैं दबे पाँव
किवाड़ खोल के धीरे से
चौखट तक आ जाता

छज्जे के नीचे,
पकड़ खम्भे को
जैसे मैं ये कहता हूँ -
"थाम ले तू हाथ मेरे नहीं तो मैं भाग जाऊंगा
और शाम फिर फटकार दादी की मजबूरन मैं खाऊंगा"

पर खम्भा जो न सुनता बात मेरी
मैं मन के बहकावे में आये
धीरे धीरे पाँव बड़ा
बागीचे की ओर निकल जाता

मेड़-मेड़ से होते होते खेतों-खेतों
चलता जाता
याद आती फिर कहानी बंसवार में रहने वाली चुडेल की
और मैं सहमा सहमा सा रह जाता
फिर पलट कर धीरे धीरे अपने घर को मैं आता
और धीरे से दादी के बगल में आकर सो जाता

रंज बन के जब धुवाँ आँखों पे यूँ ही छा गया

रंज बन के जब धुवाँ आँखों पे यूँ ही छा गया
तब उसे भी पागलों सा खुद पे हँसना आ गया

हार के रोया न होता दिन सारा पर वो रो पड़ा
खुद खुदा आ ख़्वाबों में सजदा करना सिखा गया

आयतों में पीर कहता तो सही सब बात है
वो यहाँ लगता है लेकिन काफी कुछ छुपा गया

आज तू हँसता क्यूँ काफिर हाल पे उसके बता
सोचता हूँ वो क्या हारा, और तू क्या पा गया ?

तू न समझा उम्र के पहलू कभी ऐ नासमझ
और नासमझी में अपनी तू बस सवाल उठा गया

जीवन का ये आजीवन कारावास

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जीवन का ये आजीवन कारावास
कैद में जिसकी हैं अंसंख्य,
स्वछन्द विचरने की अभिलाषा लिए
विवशता में बंधी आत्मायें
किसी विधाता की सोच का परिणाम कैसे हो सकता है भला ?
जंगलों में मार कर-छीन कर
एक दूसरों से जुदा रहने वाले जानवरों में रह कर
जब उसने ये समझा होगा
के जरूरी बहुत है
धर्म में बांधना इन स्वार्थी दरिंदों को
तब कहीं जा कर के उसने ये स्वांग रचा होगा
वेद पुराण गीता कुरान का सृजन कर
मोक्ष का लोभ दिया होगा
और तभी से कैद-कैद सी हो पायी
वर्ना तो वीराने होते
खंजर हर सिरहाने होते
जीवन का ये आजीवन कारावास
कैद में जिसकी मैं हूँ तुम हो
दे रहा है रह रह कर
आज न जाने क्यूँ दर्द बड़ा
क्या क्यूँ कौन ये प्रश्नों से मैं आगे
राहो में अकेला यहाँ
सोच रहा हूँ जन्म निरर्थक ही था शायद
मौत के आगे भी कुछ न होगा

उन दिनों तुम न थे

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जिन दिनों उम्र पर तन्हाई का बुखार था
टूटता शरीर और ह्रदय तार-तार था
चिलचिलाती धुप में छाँव ढूंढ रहा था मैं
वीरानी पड़ी बस्तियों में गाँव ढूंढ रहा था मैं
मेरे हर इक स्वप्न पर वक़्त का प्रहार था
उन दिनों तुम न थे
उन दिनों तुम न थे

रक्त-लेप भाल पर
मैं समय की ताल पर
गर्त नापता गया
अंतर झाँकता गया
समाज रुष्ट जब हुआ मेरे हर सवाल पर
उन दिनों तुम न थे
उन दिनों तुम न थे

स्वाभिमान हार कर असहाय था जब पड़ा
जागता था रात-रात, शोक था जब बड़ा
साँस-साँस में एक बस ही पुकार थी
हार स्वीकार थी, मौत की गुहार थी
निर्वस्त्र बीच बाज़ार में सर झुका था मैं खड़ा
उन दिनों तुम न थे
हाय! तब तुम न थे

दोष शास्त्र ने मढा जब हाथ की लकीर पर
कुंडली भी हंस पड़ी जब भाग्य के फ़कीर पर
न कोई जब विकल्प था
चला लिए संकल्प था
जब हँसा वो योद्धा मेरे खाली तुनीर पर
हाय! तब तुम न थे
उन दिनों तुम न थे

सिन्दूरी आँचल शाम के बादल

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सिन्दूरी आँचल शाम के बादल

चंदा का यूँ शर्माना
कितनी मधुर है प्रेम की बेला
कितना मधुर तेरा आना


इन साँसों की तुम सरगम हो
धड़कन की तुम हो शेहनाई
पल भर जो आकर मिलती हो
मिट जाती है सब तन्हाई
क्या मांगे अब वो इश्वर से
सोच में तेरा दीवाना

मन की गलियों में झंकृत हो
बन कर के पायल की धुन
वीणा की जैसे तान कोई हो
मीठा सा इक स्वर रुनझुन
लायी हो इंतना संगीत कहाँ से
मुझको ज़रा ये बतलाना



विधाता की कोई रचना हो तुम
क्या लिखे कहो तुमपे ये कवी
शब्दों में उतारे कोई तुमको
ऐसी कहाँ बोलो है ये छवि
रूप में जल के क्या हाल हुआ है
कैसे कहे ये परवाना





क्या होठों पे तुम रखती हो
हर शब्द कलि बनके ढल्कें
ये नयन दो मद से हैं भरे
मुस्काई जो तुम ये छलकें
सीख भी लो अब रूप पे अपने
थोड़ा  सा तुम इठलाना


सिंदूरी आँचल ....

धूल से ढंकी कुछ किताबें

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आज अनायास ही
घर के पीछे वाल कमरे से आलमारी में रखी
छठी की इतिहास की पुस्तक ऊठा लाया |
धूल से ढंके जिल्द पर
मेरे ही नन्हे कांपते हाथों से लिखा था
मेरा ही बचपन का भोला सा नाम |
एक एक कर के पलटता पन्ने और
सोचता के
समय के साथ
हर रिश्ते की ही तरह
किताबों से मेरा रिश्ता भी कितना बदल चला है
वो भोलापन
वो अपनत्व
वो मिठास अब कहाँ इस रिश्ते में भी ?
जीवन की आपाधापी में
जीवन कहाँ पीछे छूट गया
पता भी न चला
इन पीले पड़ते पन्नों में
इतिहास सा विषय
और भी गंभीर सा दिखा मुझे
हर पन्ने पे पुराने समय की एक नयी कहानी
कहानी वो
ज़मींदारों की विवशता के बीच लोभ की
वो किसानों की पीड़ा की
वो बुख्मरी
और
मेनचेस्टर में भारत के कपास की
बंगाल का वो तरसा देने वाला सूखा
पूना में किसानों की हाहाकार की

फिर न जाने कौन था वो
जो खींच ले आया मुझे दो सौ साल पीछे से
और अगले ही पल मैंने खुद को पाया
TV के सामने आज के समाचारों के बीच
सचिन का दुहरा शतक
CWG पर विश्व समूह की भारत को बधाई
और उसमें हुई धांधली पर लीपा पोती
अयोध्या में राम मंदिर बनाने का किसी नेता का वादा

मेरे घर के पीछे वाले कमरे में रखीं हैं
धूल से ढंकी कुछ किताबें

सोचने कब दिया

जिंदगी ने हमे तो था गम सब दिया
हंसाते रहे तुम सोचने कब दिया

हर नए शेर की तुम पहचान हो
शायरी का है तुमने नया ढब दिया

जिस गली में हारे अपनी खुदी
देने वाले ने हमको वहीं रब दिया

आँचल के कोने में लपेटें वो उंगली
कब साँसें रूकीं गिरेह कब दिया

बाग़ का हर फूल मेहरबान तुम्हारा
खिलने का कलि को तुमने सबब दिया

Secret of Blissful life..revealed in The Lotus temple, Delhi

Away from home in college and then away from college in the corporate world, I am going through transitions and amidst these transitions I have seen so many different colors of life. There were times when the desire to go on was no longer there. There were times when the heart was broken the belief system fore shaken and energies lost in contemplation. I never knew where was I headed and was sad to know that I was moving without a heading. There were questions that started with words like ‘what if’ and ‘why should I’. I was weak and constantly looking for help. I had friends but I didn’t want to loose them. I was quiet.
Time kept passing at it’s pace patiently and I kept getting weaker and weaker till one day it so happened that I decided to go to The Lotus temple. The one and half hour metro train journey to the Lotus temple from Gurgaon was no different from the life so far. It was painful, it was full of doubts. I kept asking with every time a gush of passengers filled the train at …

शाम होते ही तलास-ऐ-आशियाँ होने लगी

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शाम होते ही तलास-ऐ-आशियाँ होने लगी

खुद से बातें छोड़ दीं खामोशियाँ होने लगी
दिल की सब बातें नज़र से बयाँ होने लगी

अब नहीं रोके रुके है
आसूवों का सिलसिला
क्या कहें किनसे है शिकवा
और किनसे था गिला
महफ़िल में आम सब बातें-पिन्हाँ होने लगी...१

रोज़ सोचें हम ठहर कर
और आगे अब कहाँ
दैर हमसे दूर है
दर नहीं कोई यहाँ
शाम होते ही तलास-ऐ-आशियाँ होने लगी...२

इक सदी से छाई रही
वीरानी औ खिजा जहाँ
हम वहीं पर चले सजाने
ख़्वाबों का इक बागबाँ
जिंदगी जीने की फिर हसरत जवाँ होने लगी...३

हमको कब मालूम था
के हम अकेले थें खड़े
वो तमाशाई फकत थें
जिनके खातिर हम लड़े
'चक्रेश' जुदा सब अपनी परछाईयाँ होने लगी...४

यूँ तो तनहा ही सफ़र था
था न कोई कारवाँ
हम किनारों पे कहीं थें
और न था कोई वहां
आज क्यूँ हर हमपे नज़र मेहरबाँ होने लगी...6


Ckh.

ये शाम कहीं फिर मुझसे न

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ये शाम कहीं फिर मुझसे न
कोई कविता लिखवा जाए
कहीं अनकही बात कोई फिर
इन पन्नो पे न आ जाए

हाथ बाँध दो कोई मेरे
मुझे कहीं और ले जाओ
शोर मचा दो बस्ती में
मौन मुझे बस दे जाओ
मन के गलियारों में फिर से
भूला बचपन न छा जाए

क्यूँ करती हो अट्हास मुझसे
ऐ डूबती किरणों बोलो
उपहासित करते हो क्यूँ मुझको
शब्द माला के वर्णों बोलो
अंतर मन की पीड़ा का
कोई थाह कहीं न पा जाए

न करो बात मुझसे तुम ऐ मन
भावुकता से मैं दूर सही
नहीं चाह मुझको भावों की
चूर ह्रदय सो चूर सही
कहीं कोई स्नेह भाव से
घाओं को न सहला जाए

ह्रदय का मद्धम साँसों का
रुक रुक कर आना जाना
मंद सुरीली पुरवाई का
कानों में कुछ कह जाना
कहीं पल भर का सुख दे कर
मुझको न रुला जाए

शाम रिन्दों ने हमको पिलाया बहुत

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शाम रिन्दों ने हमको पिलाया बहुत
हौसला टूटे दिल को दिलाया बहुत

हम भी पीते रहे,
घाव सीते रहे
भूल हम ना सके फिर भी उनको कभी
देखो होता है वो
होना होता है जो
मिल ना पाये दो दिल मिलाया बहुत

सजती दुल्धन कहीं
खूबसूरत कोई
जैसे अम्बर से उतरी हो कमसिन परी
आखों में है उसकी
बस मूरत यही
ना टूटे ये मूरत हिलाया बहुत

ऐसे देखो कभी
ऐसा होता है भी
फूल गुलशन में खिलता बिखर जाता है
फिर भी दुखता है मन,
क्यूँ उस फूल प़र
खिल पाया ना जिसको खिलाया बहुत



जाम छलका किये
रात कटती रही
खुद को खोने का हमको गुमाँ हो गया
जाने किस सख्स से
हमने दिल की कही
होश आया जब उसने हिलाया बहुत

शाम रिन्दों ने हमको पिलाया बहुत.....................

पत्थर का टुकड़ा

एक पहाड़ की चोटी
सदियों से इक ऊचाई पर टिक कर
लगातार खुला आसमान देखती आई है
और साथ ही नीचे वादी में बहते
तेज धार पानी की उथल पुथल को भी
आज अचना धरती के नीचे हुए हल्की सी गतिविधि से
सतेह पे बड़ा भूचाल आया था
और वो चोटी पहाड़ से टूट कर
घाटी में लुढ़कती ठोकर खाती आ गिरी
गिरते समय एक पल को खुला आसमान दीखता
और दूसरे पल नीचे जल का तेज़ प्रवाह
सदियों का भूत, वर्मान के कुछ क्षणों में परत दर परत खुलता चला गया
और वो पत्थर का टुकड़ा लुढ़कता चला गया
लुढ़कता चला गया

अयोध्या

मैं प्रतिमा हूँ
मैं प्रतिमा हूँ
प्रतिमा हूँ मैं राम की
मैं प्रतिमा हूँ
मैं प्रतिमा हूँ
बोलो मैं किस काम की ?

न तू मुझसे पूछे है
न कहता है मन की बात
क्या करूँ जान के तू पंडित है
जब मुझसे ही है तेरी जात

हर रोज़ सजा कर थाल आरती की
जाने क्या जप जाता है
दिन में तू प्रशाद चढ़ाता
रात बैठ खुद खाता है

ये न कह की मुझमे तुने
राम को कहीं देखा है
सच और झूठ के बीच में प्यारे
एक हल्की सी रेखा है

अपराध नहीं तेरा जो तूने
भक्त जनों को ज्ञान दिया
मुझ पाषाण की मूरत को तूने
इतना उच्च स्थान दिया

बस डरता हूँ मुझ जैसा ही
तू पत्थर न हो जाए
जलता हो अयोध्या में मस्जिद
और तू मंदिर में सो जाए

फासला क्यूँ हो

ता उम्र जिल्लत गुमनामी रहा तेरा नसीब
तुझे खुल्द का हौसला क्यूँ हो ?

गर शाहीन तू मज़हब है उड़ान तेरा
आसियान तेरा ये घोंसला क्यूँ हो ?

खुदा परस्ती मेरी बुरी अब तू बता
लहू में डूबा काबा-ओ-कर्बला क्यूँ हो ?

ईसा या मुहम्मद से हो तो हो ताल्लुख तेरा
इंजील गीता कुरान में फासला क्यूँ हो ?

ये रस्म बहुत थी जहाँ में इक बार आने की
आने जाने का ये सिलसिला क्यूँ हो ?

अपनी गली में जो रहता हूँ अकेला
हर शख्स को मुझसे शिकवा गिला क्यूँ हो ?

यहाँ ठेस लगाती है दिल टूटता है

मुझे रास न आया ये खेल यारों
यहाँ चोट लगती है दिल टूटता है
ज़रा भी न भाया ये खेल यारों
यहाँ ठेस लगती है दिल टूटता है

ये आखें तो देखें बस मासूम सपने
मंदिर जोड़े जो भी हाथ अपने
तुम ही कहो वो क्या मांगता है-२

एक बच्चा लड़कपन से पाए जवानी
जवानी बन जाए एक करूड़ कहानी
तुम ही कहो वो क्या मांगता है -२

बागीचे में बाबा फूलों से भंवरे उड़ाता
थक जाता हांफता फिर सुस्ताता
तुम ही कहो वो क्या मांगता है -२

कर्म तुला पे झूलता तराजू पुण्य पाप का
समझ न आये मुझे हिसाब इसके माप का
विरासत में पाया ये खेल यारों
मुझे रास न आया ये खेल यारों
यहाँ घाव भरता है फिर फूटता है
यहाँ ठेस लगाती है दिल टूटता है

याद बहुत वो आती है

वो लड़की सुन्दर श्यामल सी
भोली सी पगली वो कोमल सी
सारी रात जगाती है
याद बहुत वो आती है

पावनता की वो परिभाषा
जीवन जीने की वो आशा
ख़्वाबों में मुस्काती है
याद बहुत वो आती है

बोली की जैसे धुन वीना की
बालों में खुशबू उसके हीना की
जाने क्या कह जाती है
याद बहुत वो आती है

सावन आये बरखा बरसे
उसके रूप को आँखें तरसे
हाय ! कितना मुझको सताती है
याद बहुत वो आती है

किस्तों में आया बचपन

किस्तों में आया बचपन
किस्तों में मेरी जवानी
कतरे लहू के टपके
आँखों से बन के पानी

किसने किया था सौदा
मेरी ज़िन्दगी का जाने
रद्दी में बिक चली है
ये उम्र के कहानी

ऐ दिल नहीं खबर थी
शहर का हाल ऐसा होगा
अब याद आ रही हैं
गलियाँ वो पुरानी

अपने बाद फिर ना होगा
चर्चा कहीं हमारा
इक सांस आखिरी फिर
ना होगी कोई निशानी

मुझको नहीं है फिर भी
शिकवा किसी से ऐ दिल
तकलीफ दे रही है
ये सांस की रवानी

नादाँ हूँ मैं शायद
मुझको खबर नहीं है
"चक्रेश" हो गया पागल
या दुनिया हुई दीवानी.....

स्याह आँचल रात्री का

बंद करके घर के दरवाज़े,
टूटे छप्पर से ऊपर देखूं तो
ऐसा लगता है के सारे तारे,
राज की बात कोई बताने को
जैसे चुपके से मेरे कानों में,
दैवीय गीत कोई गाने को
आये हों मेरे दुनिया में
रंग नया लाने को
फिर कहीं से चंदा बैरी
चला आये दबे पांव बीच हमारे
और रात्री के स्याह आँचल में
सिमट जाएँ सारे तारे.......
बात अधूरी रह जाती
हृदय की वेदना तड़पाती
समझ से मेरी बाहर है
तारों का मुझ तक आना
बिना कहे कुछ भी पर
अंधेरों में खो जाना ....

Ocean within

There’s an ocean within
So deep I can’t tell
Rivers dancing together
Don’t know its heaven or hell

Every breeze is frozen
Cold waves sing no songs
A dumb struck silence
Seems time has stopped
There’s no ticking sound
no ringing bell
There’s an ocean within
So deep I can’t tell...

The blue-gray lines
From the horizon O’ dear
Keeps calling from beyond
but still I am here...
no song no joy
no breeze no smell
there’s an ocean within
so deep I can’t tell

A wretched ship sinks
leaving all sailors dead
caption’s promise stands broken
sad albatross said:
there’s an ocean all around
so deep I can’t tell
rivers dancing together
don’t know it’s heaven or hell
..............................................................................Chakresh

The question was wrong

Four year my college life, I spent walking alone and thinking why life is not the way I wanted it to be? ...and then one question would lead to another and I would end up asking why don't I understand life?....I went through depression, frustration, anger and then lost all my energies. Today I realise that the question itself was wrong.The essence of life is not how it is right now, but rather what can I do to make it better...The question was wrong ..

काल से द्वूत खेलता मैं

स्वप्न में
काल से द्वूत खेलता मैं,
जाने क्या क्या दाव पर लगा चुका हूँ |
पासों के इस खेल में
काल की पकड़ इतनी अच्छी क्यूँ है ?
यह भी मेरी समझ से बाहर ही है अबतक |
काल बहुत धनि तो नहीं पर
हार का डर उसके माथे पर आता ही नहीं |
उसका मेरे सर्वस्व लगा देने पर
मेरी तरफ देख कर हँसना
मुझे बिलकुल पसंद नहीं आता |
पर मेरे स्वप्न में मेरी ही हार तो हो नहीं सकती,
ये सोच कर एक और दाव लगा बैठा मैं |
पासे हाथों में लिए बैठा काल,
हँसता ही जाता
हँसता ही जाता

बड़ों का खिलौने

समय के साथ हम खिलौने बदल देते हैं
बड़ों के खिलौने उनके 'शब्द' होते हैं
और शब्दों से खेलना बड़ों खेल |
कोई अच्चा खिलाडी है तो कोई एकदम फिसड्डी,
पर खेल तो एक ही है |

अंक गणित

अंक गणित
अंको से शुरू होकर
एक सीमा रहित व्योम में उड़ती जाती है |
इस विस्तार को देख कर
दंग रह गया हूँ मैं |
अंकों का ज्ञान,
सृष्टी रचयिता को कितना था?
इस प्रश्न ने मुझे दे दिया है
एक अनिर्वचनीय मौन |

अभिमान अवसरवादी होता है

अभिमान अवसरवादी होता है
एक सियार की ही तरेह .
नहीं तो ऐसा क्यूँ होता है कि,
दिन के उजाले में,
दफ्तर में बॉस की चार गलियाँ हंस कर सह जाने वाला आदमी
शाम को घर पहुँचने पर
एक ऊंची आवाज़ भी बर्दास्त नहीं कर पाता

ओ लल्ला हौले हौले

कच्चे रास्तों पे नंगे पाँव चलना
वो कहना बाबा का- ओ लल्ला हौले-हौले

मंदिर की सीड़ी तेज़ी से चढ़ना
वो कहना अम्मा का- ओ लल्ला हौले हौले

डंडे के घोड़े को आँगन में दौड़ना
वो कहना माँ का -ओ लल्ला हौले हौले

Building a new India..India of our dreams

I just finished reading an article by a leading French journalist (based in India), Francois Gautier, India’s self denial. In his article he has praised the tolerance of the Indians and he says that he has noticed a striking similarity in the Indian people, their tolerance. He has praised our nation for it’s glorious past and the ancient wisdom. But according to him (and as it is quite visible today to us too) our people (we Indians) lack a sense of pride and we tend to feel belittled when we compare our country’s present situation with the developed western nations. We have started feeling that the system here is rotten, corrupt and incompetent.
I do not disagree with the author for most of what he has written. I feel he is quite right when he says that Indians keep judging themselves by the western standards and western wisdom. The main reason, as he too points out, is our poverty. We are a poor nation (now don’t tell me that the GDP is 7.4 today), and we feel this is because of our…

जीवन एक कविता ही तो है ....( एक और प्रयास )

(मैंने एक ही कविता को चार अलग अलग तरह से लिखने का प्रयास किया है....)




जीवन एक कविता ही तो है
हूँ किसी पंक्ति का एक शब्द मात्र मैं
इन मात्राओं का उन मात्राओं से मेल है जीवन
कुछ छंदों की लय ताल का खेल है जीवन
मैं न होता पर्याय भी कोई मेरा यदि कविता में होता
तो भी अर्थ कविता का शायद लेश मात्र भी न खोता
पर मैं हूँ इन छंदों में क्यूंकि
उन छंदों में साथी तुम हो
लय ताल कविता की हमसे
फिर क्यूँ आज तुम गुमसुम हो ?
जीवन एक कविता ही तो है

जीवन एक कविता ही तो है
है भावों का एक पावन मेला

कल कल करता निर्मल जल हो
या हो कोयल का मीठा गीत
मंदिर से आता स्वर घंटी का
या हो गीता का चिर संगीत
जीवन एक कविता ही तो है


जीवन एक कविता ही तो है
रंगों छंदों का सुन्दर संगम

भीनी गंध गीली मिट्टी की
हैं खेतों में फसलें लहरातीं
तितलियाँ उड़ती पंक पसार
कैसे कलि कलि मंडरातीं
जीवन एक कविता ही तो है


जीवन एक कविता ही तो है
रिश्ते नातों का ताना बाना

माँ बेटे का प्यार कहीं है
पिता का कहीं है लाड-दुलार
बहन-भाई का एक धागे का रिश्ता
कहीं पति में पत्नी का पूरा संसार
जीवन एक कविता ही तो है

जीवन एक कविता ही तो ह

जीवन एक कविता ही तो है
और हूँ किसी पंक्ति का एक शब्द मात्र मैं
इन मात्राओं का उन मात्राओं से मेल है जीवन
कुछ छंदों की लय ताल का खेल है जीवन
मैं न होता पर्याय भी कोई मेरा यदि कविता में होता
तो भी अर्थ कविता का शायद लेश मात्र भी न खोता
पर मैं हूँ इन छंदों में क्यूंकि
उन छंदों में साथी तुम हो
लय ताल कविता की हमसे
फिर क्यूँ आज तुम गुमसुम हो ?
जीवन एक कविता ही तो है

adhoori kavita

मैंने हर इक पहलू को उलट पलट कर देखा है
जीवन मेरा और कुछ नहीं हाथ की अविरल रेखा है

कौन कहता है समय ये चलता है चलता जाता है
....................kuch samajh nahi aata hai .........hahahahha

NOthiNGneSS

A glass top shinning table in front of me on which my laptop is resting right now and cool air from the new Samsung air conditioner has chilled the air around me. I am sitting on this cosy couch with my legs stretched and I’m looking at the books arranged so well in front of me in those wooden shelves. Yes, this is it! This is the room I always dreamt of. I have seen a life where I used to live with my parents in small rented rooms. I have seen tough days and now we have this big house of our own. What else do I want I have a job in hand, I have graduated from a top engineering institute of India. How do I feel? Do you want to hear? I feel NOTHING. See I didn’t put an exclamatory mark after the one word answer. It’s not that the feeling of nothingness came to me like a sudden shock, but it’s there for a long time now. I live with this feeling and I am now so much accustomed to it that I do not even notice it’s presence. I am with my family today, after such a long time and I do not fe…

क्या देखा है तुमने कभी

शाखों से गिरते पत्तों को क्या देखा है तुमने कभी,
एक गिरता है फिर अक और भी
एकदम वैसे ही...
बारिश में बींगते बच्चों को क्या देखा है तुमने कभी
माँ दौड़ती है उनके पीछे
और भींगती है एकदम वैसे ही
प्याली में राखी चाय को ठंडी होते क्या देखा है तुमने कभी
भाप उठती है और खो जाती है हवा में
एकदम उठते है
मेरी प्याली खाली क्यूँ है अब तक
माँ नहीं दौड़ती मेरे पीछे क्यूँ
क्यूँ बारिश की बूँदें नहीं भिंगोतीं मुझको अब
किस पत्ते के गिरने की राह देख रहा हूँ मैं

एक चलती आकृति

भावनाओं का अनुसरण करती मेरी समझ
आ पहुचती है बार बार इक पड़ाव पे
जहाँ धुंधले आसमान में
एक चलती आकृति
स्वेत साडी में लिपटी ,
आँचल लहराती
जाने कबसे क्या दूंढ रही है
हाथ आगे बड़ा कर चाहता हूँ छूना उसको मैं
चाहता हूँ साथ बिठा कर पूछना,
उसकी अनवरत यायावरी का उद्देश्य
पर न जाने क्यूँ वो दूर भागती है मुझसे
एक शून्य में,
एक अँधेरी काली भयावह गुफा की ओर

‘People’, ‘society’ and ‘need’

‘People’, ‘society’ and ‘need’ were some of the words that I found difficult to spell in my school days. It’s not that these words were long or difficult to memorize, I was rather scared by their mention. I fond myself so weak. Constantly my conscience kept telling me that I was a unique human being with some great qualities but the real word made me feel my limitations and meaninglessness of my qualities. A poet for instance has no place in the corporate world. A human being with no desires, no passions will be left behind in the competitive world outside. A thinker living below poverty line will never be able to emerge as a great leader and reformer. Well exceptions are always there but that’s also not very encouraging. If I am born in India and I do not belong to Gandhi-Nehru family what are my chances to become the Prime Minister of my country some day? Some of you will start counting the names of Manmohan Singh ji, Atal ji etc. Well I leave this question here and move forward. Th…

उलझनें जीवन की

सुलझाने जो बैठा उलझनें जीवन की
उलझता चला गया
जाने कब गांठें पड़ी जीवन की डोर में
जाने कब दोनों सिरे हाथ से छूट गए


चक्रेश

अंत अनंत का है नहीं फिर

अंत अनंत का है नहीं फिर
डगर का मोल क्या
मृतु मुक्ति है नहीं फिर
उमर* का मोल क्या ....................................................0

कारवां मेरा नहीं ये
मैं तो बस एक राहगीर
मैं किसी का हूँ नहीं फिर
सफ़र का मोल क्या .......................................................1

प्रभु के जिसको कहते हैं सब
पास होकर भी दूर है
धर्म मारने के हो काबिल फिर
ज़हर का मोल क्या.........................................................2


गर्भ सागर का गुहर से हो भरा
पल पल उठता तूफ़ान हो
खाली हाथ आये किनारे फिर
लहर का मोल क्या..........................................................3


टप टप टपकती चाँदनी का
'चक्रेश' एक चातक है तू
चाँद अनजान हो यदि फिर
चाक जिगर को मोल क्या...................................................4

चक्रेश चल अब लौट चल
चाह तुझको किसकी यहाँ पर
भीड़ में भी हो तू अकेला फिर
शहर का मोल क्या...........................................................5

अंतिम दिन जीवन के

अंतिम दिन जीवन के यदि ये
पीर हृदय की रह जाए
के दौड़-धूप में बीत गए पल
प्रियतम से कुछ ना कह पाएँ

प्राण कंठ तक आ पहुंचें हों
भाव मुखरित न होते हों
प्यासा हो मन पाने को प्रिय को
बैरी नयन धुंधला जाएँ

शिथिल पड़ता मेरा शरीर हो
धमनियों में हो मद्धम रक्त प्रवाह
और बीते पल एक एक करके
मस्तिष्क पटल परछा जाएँ

चित्त चिता की राह ताकता
मृत सैया पे लेटा हो
आगे बढ़ कर दाग दे कोई
धुवां राख सब हो जाए

अंतिम दिन जीवन के यदि ये
पीर हृदय की रह जाए
के दौड़-धूप में बीत गए पल
प्रियतम से कुछ ना कह पाएँ

Its never easy for me to translate a poem. I give it a shot.
--------------

On the last day of life, if a guilt sets in the heart
All life got lost in senseless race and I couldn't speak my heart to my beloved..

That life is about to leave the body and I am not able able to express myself
In that moment if the eyes wander to catch a glimpse of the beloved and every sight gets blurred..

That the blood flow in the nerves starts to slow down and each and every moment from the past
starts unfurling in the mind...

for all my batchmates @ISM

chalte tehalte kab aa pahuncha tha
main is anjaan se sheher mein
aur hissa ban gaya ek naye caarvan ka

kab shaam dhali naya din aaya
kuch yaad hi nahi

fir safar par chal diye thein
naye raahgeeron ke saath
haste gaate ek naye sheher ki or

kab shaam dhali naya din aaya
kuch yaad hi nahi

ab alvida kehne ka samay aaya hai
kyun lag raha hai ke
kisi se theek se kuch baat bhi na hui

kab shaam dhali naya din aaya
kuch yaad hi nahi

kaise beet gaye ye din raat
hum to dheere dheere chal rahe thein
ye antim padaav kab aaya


kab shaam dhali naya din aaya
kuch yaad hi nahi

haath hilata hun hanskar alvida kehta hun
par hridey ko to bas udaasiyon ne ghera hai
antim padaav par antim bhnet ye tumko saathi
antim kavya ye mera hai

ये जिंदगी by Sanjay Bhaskar

ये जिंदगी भी न जाने कितने मोड़ लेती है
हर मोड़ पर नया सवाल दे देती है
ढूंढते रहते है हम जवाब जिंदगी भर
जवाब मिल जाते है तो
जिंदगी सवाल बदल देती है |




http://sanjaybhaskar.blogspot.com/

सृष्टी एक अनंत रचना

सृष्टी एक अनंत रचना
विधाता की दैवीय रचना

पात्र जिसके तुम हो हम हैं
विवरण में जिसके शब्द कम हैं
विधाता के कर कमलों की महिमा
काल पृष्टों पर अंकित ये रचना

नदी की लय ताल देखो
व्योम वो ये पाताल देखो
जीवन का संचार जिसमे
ऐसी अद्भुत विस्तृत ये रचना

कुछ पन्ने थें अधूरे दिल की किताब के

कुछ पन्ने थें अधूरे दिल की किताब के
कुछ लिखा मिटा गए ये छीटे शराब के

सब-ऐ-फुरकत गुजारी मैकदे में कुछ ऐसे
चर्चे सारी रात चलें उन्ही के शबाब के

सिलवट नहीं चेहरे पर कोई शिकन न थी
रात दाग भी न था हुस्न पर माहताब के

फिर सय्याद दिन का तीर आँखों में चुभ गया
तनहाइयों से घिर गए सिलसिले टूटे खाब के

टुकड़ों से खाबों के कोई शिकवा नहीं लेकिन
चुभने लगे हैं ताने अब जहाँ-ने-खराब के

तारीफ़ करता था शेरों की जो अपने नहीं थें

तारीफ़ करता था शेरों की जो अपने नहीं थें
लिखता था जुमले जो कभी छपने नहीं थें

करता था बागबानी अरमानों के बागों में
लगये वो फूल जो खिजाओं में पनपने नहीं थें

जुदा हुआ मुझसे ज़ालिम साया भी मेरा
मेरे पते के ख़त भी अब मेरे अपने नहीं थें

इन आखों में चुभते हैं हर पल ये तुकडे
टूटे जो पलकों पे, फकत सपने नहीं थें

खूब रोया लिपट कर जिनसे मैं पहरों
होश आया तो जाना वो अपने नहीं थें

एक तस्वीर

एक तस्वीर..
..अनभिज्ञ..
दर्शक की आँखों से
आज्ञाकारी, सुशील पुत्री सी
कलाकार पिता की तुलिका का मान रखती
एक संस्कृति को अपने आप के संजोये
मानो किसी आदेश का पालन करती
या किसी कपिल मुनि के शाप
से पत्थर बनी अहिल्या सी
राम के पद कमलों के स्पर्श की प्रतीक्षा में
सदियों से
चिपकी हुई है इन गुफाओं की पथरीली कठोर छाती पर

My pursuit to know LIFE

Sitting in the side upper birth of a train, I realise how similar is this journey and my journey of life are. For many days I was having some questions about life and I was unable to comprehend the purpose of life. I read Shreemad Bhagwad Geeta but still I could understand very little. If I believed that there was a supreme power called God, and that He created the Universe and life and everything we can perceive or can’t, then also I could not understand His purpose of creating everything. If He is so great He won’t just go on showing off His power just to see His followers, worshippers and to see how a man becomes weak and finally kneels down to Him and asks for help. I found the whole philosophy presented in Bhagwad Geeta lacking one critical point which I give utmost importance and that is PURPOSE. I talked to many wise men, and ended up finding myself even more puzzled. Throughout my life I have believed that a theory, a fact or an answer to a question can be taken as correct if …

आज होठों पे हैं दिलबर अफसाना तेरा

आज होठों पे हैं दिलबर अफसाना तेरा
रुख से पर्दा हटा तू कहता दीवाना तेरा

रात भर जागना, चाँद से बतियाना
फिर वही गीत हंसकर गुनगुनाना तेरा

अकेले में सजना, गज़रे लगाना
आइना देखना, खुद ही शर्माना तेरा

मेरी राह तकना, आने पे कहना
ऐसे आने से बेहतर था न आना तेरा

नाराज़ हो जाना, रूठ जाना मानना
लड़ना झगड़ना फिर मुस्काना तेरा

फिर सजा बाज़ार मौला आज तेरे शेहेर में

फिर सजा बाज़ार मौला आज तेरे शेहेर में
बिकता है खरीदार मौला आज तेरे शेहेर में

नीलाम है ईमान का घर
हर शख्स है बे आबुरु
वाइज़ भी गमखार मौला आज तेरे शेहेर में

मुल्क शहीदों का जो था
है आज मुलजिमो के हाथ में
शहादत गयी बेकार मौला आज तेरे शेहेर में

अब्र बरसा दे अब के
पानी से लहू मिटाता नहीं
हर हाथ में तलवार मौला आज तेरे शेहेर में

खूब रोया याद कर के
बीते दिनों के बात मैं
ईमान की है मज़ार मौला आज तेरे शेहेर में

अब नहीं कश्टी हमारी
चाह में साहिल के है
हैवान है खूंखार मौला आज तेरे शेहेर में

LIfe, so far

Four years of college life is now coming to an end. Here I am standing all alone, under a tall tree, in its shades and observing a kid in the park who is running after a puppy. All of a sudden now I realize that it has been long since I have chased puppies.
There was a time when I was a kid, running behind butterflies and observing blades of grasses for hours. I wanted to see a plant grow but then dad told me the plants grow only when I am in deep sleep, in day time the plants are afraid of me. I would feel so strong to know that I can connect with even a blade of grass. I knew for sure that there is one single thread that runs throughout the universe and everything interact with each other. I was so happy. Everything was meaning and full of wonder and beauty.
I cannot recall when exactly everything changed. I believe the things did not change overnight. The flood of thoughts and imagination was hindered by the bitter, cruel realities. The school and its education made me think differ…

प्रांगन में था पेड़ बरगद का, मैंने देखा नहीं

नहीं जानती माँ उसकी
लिखता है वो कवितायें
बस उदास रहती है के
बेटा कुछ कहता नहीं ....
गम सुम बस बैठ जाता है
हर शाम मुंडेर पर
उँगलियों में कलम घुमाता
देखता रात के आँचल को
मन ही मन कुछ कहता और
हंस देता...फिर वही एक विचित्र सा मौन
नहीं पूछती वो कुछ भी लाल से
मन को खुद ही समझा लेती
ये उम्र ही ऐसी है उसकी
हो सकता है किसी लड़की के सपने होंगे जागते उसे
क्या पता चाँद में एक चेहरा ढूंढता होगा वो
या कुछ सोचता होगा भविष्य की
हो सकता है भागवद का कोई श्लोक गूंजता होगा उसके मन में ..
ऐसा तो नहीं किसी ने कह दिया कुछ मेरे भावुक लाल से
ऐसा तो नहीं कोई बात टीस उठा रही है उसके निर्मल मन में
या बस जिद्दी है क्रमों से दूर भाग रहा वो ............

दादी

दादी की कोठरी में रखी लकड़ी की आलमारी
अन्दर रखती है दादी उसमें
पूजा का सामन और एक डब्बे में
मिश्री बताशे और किशमिश .
दोपहर में सब सो जाते नींद मुझे आती नहीं
सोयी दादी तो उठानी भी थीक नहीं
एक डब्बा खीच लाता हूँ नन्हे हाथों से
और सामने रेख कर आलमारी के
खड़ा हो जाता हूँ उसपर
फिर खोलता हूँ पल्ला आलमारी का
मुट्ठी भरता हूँ किशमिश बताशों से
छोटी मुट्ठी मेरी, थोडा खता ज्यादा गिराता हूँ
कुछ भी शोर किया नहीं मैंने
जाने कब दाबी नींद से जाग गयी
अब मेरे पीछे खड़ी मुस्का रही है वो
कान्हा कह गोंद में उठा लिया मुझे...
दादी की गोंद में कितना ऊंचा हो जाता हूँ में
.

वो वाली कहानी सुना दो

बाबा वो वाली कहानी सुना दो
राज कुमारी जिसमें रजा से
मांग बैठती है चंदा को
जिसमें राजा के सारी सेना
निकल पड़ती है चाँद लाने
बाबा आगे कुछ कुछ भूल गया मैं
थोड़ा सा तुम याद दिला दो
कैसे राजा ने फिर बिटिया के
नाखून को चाँद बताया था
और कैसे आसमान से चाँद उँगलियों पर लाया था
बाबा ऐसा क्यूँ है बोलो
जो कहानिया बचपन में
मुझको खूब हंसाती थीं
आज सत्य के क्रूर प्रहार पर
मौन धरे रह जाती हैं ...

निः शब्द मन

क्या कहें के दर्द कोई अब कहीं उठता नहीं
जाने ऐसा क्या हुआ के घाव मुझको भा गया.
समाज घर परिवार यहाँ से अब मुझे दिखता नहीं
आँखों के मेरे सामने ये कैसा अँधेरा छा गया.
मौत नहीं अभी आई मुझको इतना तो आभास मुझे
चोंच मारने भूखा परिंदा यहाँ तक फिर क्यूँ आ गया..
गला मेरा सूखता है विश्रांति की अब बस प्यास मुझे
भूख मिटाने के लिए मैं गम अपना सारा खा गया.
अब कोई मुझसे जो पूछे मेरा ऐसा हाल क्यूँ
क्या हुआ के इस चट्टान पर मैं अकेला आ गया
निर्वस्त्र हूँ क्यूँ और यहाँ पर खड़ा फैलाये बाल क्यूँ
अनायास किस बात पर फिर मुझको रोना आ गया.

हार

दुखता है मन हर हार पर
जाने क्यूँ एय दिल जीत की प्यास भी नहीं
क्या कहें कैसे कहें कौन समझेगा
हमको अपने भी समझे ही नहीं
चल चलें कहीं दूर यहाँ से
चलें उस रेत के सेहरांव पर
कहते हैं साहिल जिसे
चल बनायें वहां एक रेत का घर
कुछ नहीं तो याद अपना
बचपन ही आ जाएगा
तो क्या की उठती लहर के साथ
घर अपना खो जाए गा
चल लिखेंगे नाम अपना
हाथ से हम लहर पर
और हँसेंगे चट्टानों पे नंगे खड़े हो
जीवन के सफ़र पर
सीपियाँ चुन दिन बितायेगें एय दिल
रात वही अपनी कब्र खोद कर
सो जायेंगे
किसी खामोश लहर के आगोश में
सो जायेंगे
रात वही अपनी कब्र खोद कर
हम दोनों ही सो जायेंगे

धर्मं का भी आँगन कितना श्वेत है ?

तेरे मेरे इस देश में
वाराणसी नाम का एक गाँव है
वहां अस्सी घाट पर
एक अलग सा ठहराव है
गंगा का अद्भुत विस्तार उधर
इधर श्रद्धा का अनुपम बहाव है

यहाँ बैठ तू देख मानुज़
एक झलकी अपने ही संसार की
डुबकी लगाता भक्त एक
अंजुली जल से भरी नार की
इस पार बैठ सोच तनिक तू
कहानी क्या है उस पार की

निर्मल जल, मध्य धार लाश तैरती
सामने तेरे भक्त मंत्र बोलता
साथ उसके वो लाश बोलती -
"क्यूँ नहीं तू आँख खोलता
समर्पण तेरा किस अज्ञात में
आखिर कौन तेरे कर्म तोलता ?"

क्षितिज पर टिके उस लाल सूर्या से
अब एय भक्त पूछ जरा तू
साँसों का आखिर तेरी क्या मोल था
है आज जीवित या मरा तू
कहता है तू आस्था है ये तेरी उसमें
मुझको फिर दीखता है इतना क्यूँ डरा तू


दैवीय इस स्थान पर भी
पत्थर जल और बस रेत है
प्रश्नों से दूर भागती भीड़ चीखती
पूछने वाला एक भूत या प्रेत है
मुझपर अधर्म का आरोप सही तू ये बता
धर्मं का भी आँगन कितना श्वेत है ?

शतरंज

अपलक देख रहा हूँ
शतरंज की बिसात पर बिछी बाज़ी को
जो वजीर बढ़ाती हूँ
घोडा मात खाता है
घोडा पीछे हटा दूँ जो,
तो पुरानी चार चालें निरर्थक
क्यूँ न प्यांदा बलि चढ़ा दूँ ,
फिर देखि जायेगी ..
पहले ही एक गलती पर हांथी गँवा चूका हूँ मैं ...

मुद्दत हुई मयकदे गए

मुद्दत हुई मयकदे गए, नहीं है फुर्सत आज कल
मयनोशी का वो दौर था, नहीं है आदत आज कल

कुछ बात के जी नहीं लगता ऐ दिल तेरे शेहेर में
हर शख्स से जाने क्यूँ हमको है नफरत आज कल

दरवाजे घर के खोल कर, आये हैं हम चौक पर
जाओ सब कुछ लूट लो, भाति नहीं दौलत आज कल

कोई मिले तो दे चले हम सब कुछ अपना सौंप कर
हाथों में लेकर घुमते हैं अपनी वसीयत आज कल

क्या कहें 'चक्रेश' के जी लगता नहीं अब बज़्म में
हिज्र की रा-ना- ई-यों में दिखाती है जन्नत आज कल

मुहब्बत की स्याही वाही कलम

जब उस रोज़ बैठा था मैं
अकेले किसी सोच में खोया
बाग़ में पेड़ों की छाँव में ...
याद है क्या तुम्हे वो दिन, जब तुम आई थी
हंसकर
और दे गयी थी मुझे एक तोहफा कलम का...
फिर बैठ गयी थी वहीं पहलू में मेरे
और जिद्द की थी एक नज़्म लिखने की
लिखी थी एक नज़्म उसी मुहब्बत की स्याही वाही कलम से मैंने
याद है क्या तुम्हे
कैसे नज़्म पढ़ते पढ़ते
मदहोश हो गयी
ऊपर दाल से ताकती एक कली कनेर की
और आ गिरी कागज़ के सीने पर
फिर तुमने रख ली थी वो कली
अपनी एक किताब के पन्नो में दबा कर
कैद कर लिया था तुमने उस लम्हे को,
खुसी से, सदा के लिए .
अब वक़्त बदल गया है
काफी कुछ नहीं रहा पहले जैसा ... जानता हूँ
कुछ था उस कलम में,
उसकी स्याही से निकली ...
हर नज़्म में खुशबू थी
कुछ बात थी ...
जीने का सहारा बन गया था वो तोहफा तेरा
आज वो कलम खो आया
फिसल गयी उँगलियों से मेरी, मैं पकड़ न सका उसे
जिंदगी फिर वीरानी सी लग रही है अब
दीवाना हूँ... जानता हूँ ..मगर फिर भी
मांगता हूँ तुमसे आज वही कलम उसी स्याही वाली फिर से
देखो शायद मुहब्बत की स्याही वाली बोलत में,
कुछ बूंदे स्याही की बची रह गयीं हो कहीं .....
जानता हूँ कोई वास्ता नहीं अब तुमको मुझसे
फिर भी
क्यूँ नहीं पुरानी अप…

जनम दिवस (मेरा)

समझ की डोर में
गाँठ पर गाँठ पड़ती जाती है
उंगलियाँ सुलझाने में हैं असमर्थ.
हो सकता है नाखून छोटे हैं,
मेरी उँगलियों के अभी.
उलझते सुलझते आज अनायास आभास हुआ
कि
एक बरस बीत गया
और
द्वार आ खड़ा हुआ मेरे,
रवि के रथ पर सवार होकर,
एक और जनम दिवस (मेरा).

घर में बिखरा सामन,
सपनों के टुकड़ो से ढकी फर्श,
समय कि धुल से छिपी यादों की तस्वीरें,
भावना की अध्-जली काली लकड़ियाँ,
और बीचों बीच, डोर में उलझा बैठा मैं
ऊठुं कैसे पहुंचूं द्वार तक,
करूँ कैसे मेहमान का स्वागत ?
साल में एक ही बार तो आता है ये प्रिय मेरा
बस एक दिन हंस कर मेरे साथ बिताने के लिए
हर बार की तरह, कैसे हंसकर द्वार खोल दूँ घर का इसबार ?
हंस कर कैसे व्यक्त करूँ खुसी उसके आगमन पर ?

क्यूँ न जिद्द की झाडू उठा
साफ़ कर दूं घर को
क्यूँ न बाहर कर दूँ इन बेकार की चीजों को
क्या मोल है ऐसी उलझी हुई समझ की डोर का,
ये तुकडे भी तो याद दिलाते रहते हैं टूटे सपनों के बस,


या कह दूं आगंतुक से
ना आ इस बार द्वार नहीं खोलूँगा मैं
घर छोड़ कर या चला जाऊं मैं कहीं दूर टहलता

....

प्रतीक्षा

समझ की मथनी से
आत्म मंथन करते करते
जाने कब ऐसा हुआ
कि मस्तिष्क कि सतेह से भाप बन
शब्दकोश के सारे शब्द
एक एक करके छु हो गए |
मैं अकिंचन
आज आ बैठा कविता तेरी चौखट पर
सारी रात तेरी झोपड़ी के पट को
टक टकी बांधे देखता रहा
तू द्वार खोलती ही नहीं |
तुझ गरीब की झोपड़ी के टूटे छप्परों
से छन छन कर अन्दर जाती चाँदनी
से भाग भी न हैं मेरे
कि एक झलक भी तेरी पालूँ |
बहार पड़ी चारपाई बार बैठा
सारी रात
भावना कि लकड़ियों पर हाथ सेकता
ठिठुरता
कांपता मैं
प्रतीक्षा कर रहा हूँ
पट के खुलने का |
शून्य मेरी आत्म का
कदाचित तू मुखरित कर दे
अभिव्यक्ति की सीमाओं के आगे जाकर
आत्म और बाह्य शरीर के बीच के व्योम को
भर दे |

ey कविता एक anurod बस इतना सा है
अपनी चौखट से khaali न लौटा मुझे
मुझको भी अन्दर आने का
पावन एक अवसर दे ...

तिनका तिनका टुकड़ा टुकड़ा

तिनका तिनका टुकड़ा टुकड़ा चुन चुन के पैगाम लिखा
इक ख़त अपने दिल की बातों का हमने तेरे नाम लिखा

तुमको देखूं तो जाने छाती है क्या खामोशी
अब तक जो कुछ कह न पाया वो सब दिल को थाम लिखा

सच कहते है सब पीने वाले मय में कोई बात है
हमने भी आज मैखाने जाकर हाथों में ले जाम लिखा

रहता है तू दिल में मेरे है दिल के कितना करीब
एय बासिन्दे दिल की गलियों के प्यार का पहला सलाम लिखा

बेखुदी येही है शायद दीवानगी इसी का नाम
इक इक करके सब लिख गए हम अपना पता न नाम लिखा

कुछ ने कहा है चाँद

कुछ ने कहा है चाँद कुछ ने तुझे हूर कहा है
शायरों ने तेरे हुस्न पे कुछ न कुछ जुरूर कहा है

जिस जिस पर पड़ गयी कातिल तेरी नज़र
झुक झुक कर उसने तुझे बारहां हुजूर कहा है

एक हम ही हैं अकेले शायर सारे शेहेर में
जिसने तुझे एय साकी हंसकर मुग्रूर कहा है

कहते हैं अदा जिसे वो अपने शेरों में
आकर देख इधर हमने उसे बस गुरूर कहा है

उसके आगे एय साकी तेरा हुस्न कुछ नहीं
जिस शख्स को हमने अपनी आँखों का नूर कहा है

इक घडी हुआ करती थी

इक घडी हुआ करती थी (मेरी )
टिक टिक चलती रहती थी
कुछ न कहती कुछ न मांगती
बस समय दिखाया करती थी

इक दिन हंस कर के पूछ जाने किस कारण
क्यूँ चलती रहती हो तुम एय 'जान -ए -मन '
न्योछावर करती हो मुझपर आखिर क्यूँ
तुम अपना योवन, तन-मन-जीवन ?

बस इतना सुनना था की वो,यारों चहक गयी
सच कहता हूँ ,बिन पीये भरी दुपहरी बहक गयी
घूम घूम कर कांटे तीनों टूट गए यारों उसकी अंगड़ाई पर
जाने ऐसा क्या हुआ की दुनिया उसकी महक गयी

'एय प्राण प्रिये अपनाया तुमने
पूरी हुई जीवन की आस
पाषाण बन कर रह गयी थी मैं अहिल्या
अब पहुंची साजन के पास'

मैं भौचक्का रह गया हक्का बक्का
घड़ियाँ भी क्या बोलती हैं
हाल-ए -दिल यूँ खोलती हैं?

वो तुक रुक देख रही मुझे बस
ऐसे जैसे काम तीरों से घायल हुई वो
खो बैठी अपने आप पर वश

'देख प्यारी, प्राण दुलारी,
फुर्सत में करेंगे बातें ढेर सारी
समय बता दे
छूट न जाए मेरी लोरी'

पर कहाँ मानती जब ठान लेती हैं
घड़ियाँ भी तो आखिर स्त्री होतीं हैं
हार जाते हैं महारथी भी इनसे
जब ये नैनो में नीर भरकर रो देतीं हैं

अब हार गया मैं भी क्या करता
ये नहीं की मैं हूँ उससे डरता
चल दिए 'डेट' पर दोनों
इससे पहले की सदमे से उभरत…

खिलौना टूट गया

खिलौना टूट गया
मैं चुप रहा
खिलौना टूट गया
मैंने कुछ न कहा

माटी का पुतला था
टूट गया तो क्या ?
माटी का पुतला था
हाँथ से छूट गया तो क्या ?

टुकडे कब जुड़ते हैं बोलो
टुकड़ों पे कैसा रोना ?
टुकडे कब जुड़ते हैं बोलो
ये तो था इक दिन होना

कल फिर आयेगा खिलोने वाला
फिर लायेगे खिलोनों का भण्डार
कल फिर आएगा खिलोने वाला
फिर पूरा हो जायेगा मेरा संसार

खिलौना टूट गया
मैं चुप रहा
खिलौना टूट गया
मैं चुप रहा
मैं चुप रहा



...............................
चक्रेश सिंह
८/२/२०१०

जब कभी

जब कभी शाम का सूरज टिका हो किनारे पर
लौट रहे हों परिंदे
ढल रहा हो दिन
और
आँखें दब दबा जाएँ तेरी
उठने लगे भीनी खुसबू भींगे गालों से

जब कभी क्षितिज तक उंगलिया दौड़ाने पर भी
न मिले अपना खोया सितारा
और नहीं लगता हो मन जब
किसी और तारे में

जब कभी चाँद उफक से ताकता हो
पूछता हो बेकरारी का सबब
और जब एहसास होता हो की
बस यूंही मन हुआ था
आज रोने का
और कोई बात न थी
इक बहनa था अपना सितारा खोने का
बस रो पड़े, के यूँही मन था आज रोने का

जब कभी धड़कन टोकने लगे
समय की सूइयों से होती हो चुभन
और यूँही जब मन उदास हो
प्यारा साथी न कोई पास हो

तब गीत मेरा वो
तुम गुन गुना लेना
और भूल jaana तुम सब कुछ
dheere se मुस्करा देना

==============================================

Chakresh

एक ग़ज़ल तेरे नाम कर गए

लम्हा लम्हा याद कर सुबो से शाम कर गए
लो आज फिर एक ग़ज़ल तेरे नाम कर गए

हुस्न देख लिया हमने परदे को खेंच कर
इस बेखुदी में जाने क्या क्या काम कर गए

खूब चला सिलसिला छुप छुप के मिलने का
चर्चा मुहब्बत का शेहेर में आम कर गए

अपनी कब थी परवाह, जिल्लत से कब था डर
लो साथ अपने तुझको भी बदनाम कर गए

जुदा हुआ तू मुझसे , चाँद में पा लिया तुझे
तुझसे जुदा तन्हा जीने का इत्तेजाम कर गए

ये अनुरोध कैसा है

जलता दिया मंदिर का
पीपल के सीने से लिपटी असंख डोरें
आस्था परिभाषित करती
भीड़ मानसरोवर की
एक अद्रिस्य में
एक सर्व्वापी में
एक परमात्मा में
एक ब्रह्म में

गीता पुराण उपनिषद् धर्मं ग्रंथों
की दीवारों का किला
एक ऊंचा लाल झंडा
जीत का प्रतीक
या कदाचित आस्था का
संजोये अपने अन्दर
एक मूक
एक प्रश्नहीन भक्ति में लीन
एक जगराता से थक हार कर सोयी भीड़ को

पूछता हूँ मैं एक ही प्रश्न बार बार
क्या सोच थी जीवन मरण के सोच के पीछे
क्यूँ हथेलियों पर भाग्य रेखाओं ने खींचे
जन्म का स्रोत जो था है जब अंत वहीं पर
क्या उद्देष्य सिद्दा हुआ रचईता संसार को रच कर ?
आज मेरे प्रश्नों पर का उत्तर ये क्रोध कैसा है
नास्तिकता का आरोप मुझपर है क्यूँ
प्रश्नों को बदलने का ये अनुरोध कैसा है ?

और कुछ नहीं

क्यूँ बांधते हो मुझको, चाहत की डोर पर
इक गाँठ छोड़ जाऊँगा मैं और कुछ नहीं

बदनामों की कमी कहाँ, उल्फत की राहों में
एक नाम जोड़ जाऊंगा मैं और कुछ नहीं

नूर बना लिया क्यूँ मुझे मासूम निगाहों का
इक वादा तोड़ जाऊँगा मैं और कुछ नहीं

फ़ना होगा तू, जुलूस होगा जनाजे पे
मुह मोड़ जाऊँगा मैं और कुछ नहीं

मुसाफिर हूँ, रुकना रात तेरे शेहेर में
सुबह सबको छोड़ जाऊँगा मैं और कुछ नहीं

दंगे

सुना रात मस्जिद गिरा दी की एक मंदिर बनाना है
मासूमो की लाशों पर किसी को खुनी वोट पाना है

दंगे शेहेर में काटे जिन्दा जलाये गए लोग कई
या इल्लाही ! हैवानियत का ये कैसा जमाना है

थर्राता है बचपन अँधेरे कमरों में छिपा हुआ
कौन जाने आज किस नन्हे यार का घर जल जाना है

नंगी तलवारों का नंगा शोर, कट्टे बन्दूंके हर हाथ में
गरीबी बेरोजगारी की आग दिखाने का ये अच्छा बहाना है


राम तुम हार गए रावन से युद्ध में
आओ देखो आज हर अयोध्या रावनो का ठिकाना है

लम्हों को जिया करो

ढलती हुई शाम का मज़ा चक्रेश लिया करो
लम्बी बहुत है जिंदगी लम्हों को जिया करो

पीते नहीं हो तुम ये जानता हूँ मैं
दोस्तों की खातिर यूँही जाम उठा लिया करो

अफ़सोस रह जाए दिल को ये ठीक तो नहीं
साकी से दिल की बात खुल कर किया करो

साहिल तक आती लहेरों को बस रेत नसीब है
कुछ खोने की भूल कर बेफिक्र बहा* करो

वो देखो हंसने पे तुम्हारे बहार आ गयी
लोगों की फ़िज़ूल बातों से मायूस न हुआ करो

कोई आईना दिखाता ही नहीं

खुद को देखे अरसा हो गया
की अब कोई आईना दिखाता ही नहीं

थक गया हूँ, देखता आया अब तक औरों को
की इस शेहेर में कोई चेहरा भाता ही नहीं

सोचा था ये जिंदगी तेरे नाम कर दूंगा
मेरी गली पलट कर तू आता ही नहीं

अश्को का सैलाब बहा रखा है
के ये दिल अब कोई बात छुपाता ही नहीं

खुद अपना ही जनाजा सजाये बैठा हूँ
कोई आगे बढ़ कर हाथ लगता ही नहीं

कल नए फूल लगा दूंगा

शाम हुई घर लौट आया मैं
मेरी राह ताकते थक गए गुल गुल्दाम के
सूख कर बेजान हो चुके सारे...
मेरे प्यारे
फूल सारे
निकाल फेंकता हूँ पुराने फूलों को
कल नए फूल लगा दूंगा
कल नए फूल लगा दूंगा

Let there be some sun shine

‘I love my country’ is probably the second most common phrase for a youth of today to say (of course ‘I love you’ being the first). The painful aspect attached to both the phrases is that most of times the person who utters these seemingly simple words, does not even realises the idea behind love. Well, though this is what I feel. One may disagree with me.
Come with me on a tour, and let’s see what we find out. Think of a compartment of a train, where a heated discussion is going on. Topic? Any guesses? Well yes, politics! of course. What do we talk most of the time? I do not even need to bother myself writing all that, you know already. The point is let say, there are thousands of trains running at every moment of time across our vast, diverse nation and let say, there are thousands of such compartments where such heated discussions are going on. Who is the speaker? And who is the listener? Where does, such talks lead us to? And what exactly is the outcome? Well these are the questi…

जीवन के रंग रूप

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सुख दुःख के घेरे
जीवन के रंग रूप
माँ के आँचल की छाँव
कहीं चिलचिलाती धुप

चाहने वालों के मेले
गुमनामी का विराना
कोशों तक फाली चुप्पी
खुद से ही बतियाना
रुन्धता गला
यूंही ही आदतन मुस्काना
दुहराना बार बार गीता का
ढूढना ईश्वर स्वरुप

सुख दुःख के घेरे
जीवन के रंग रूप
माँ के आँचल की छाँव
कहीं चिलचिलाती धुप

अनुमान आज से ही
चित्त को चिता की ताप का
कर्म-तुला पर
लेखा जोखा पुण्य-पाप का
ये काव्य है परिणाम
मन से उठते भाप का
आगई आज पृष्ठ पर
हृदय की भावना अनूप


सुख दुःख के घेरे
जीवन के रंग रूप
माँ के आँचल की छाँव
कहीं चिलचिलाती धुप

आज का अर्जुन

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कुछ देर से ठहर गया हूँ
गया हूँ चलना भूल
जाने क्या सहता रहा है हृदय
चुभा कौन सा शूल

किस कुरुक्षेत्र का अर्जुन हूँ मैं
लेने हैं किनके प्राण
कौन सी गीता गूँज रही कानों मनी
सिद्ध करना है आखिर कौन सा संधान ?


जलता है मन धुंवा उठता हृदय में
पर पीड़ा समझे कौन ?
गहुँ किसके चरण आज मैं
केशव भी हैं मौन ?


चाह नहीं मुझको कुछ पा लूँ
या करूँ श्रेथता सिद्ध
अपनों के लहू चीथड़ो से ढक दूं धरा को
नोचे उनको गिद्ध


यदि गांडीव धरी धरा पर
क्यूँ उकसाते हो मुझको
व्यर्थ हुंकार भरते हो क्यूँ
क्यूँ जागते हो मुझको ?


नहीं जानते क्या तुम इतना भी
लहू पीते हैं ये तीर
नहीं रोकते रुकते हैं किसिके
उठ जाते हैं जब मुझसे वीर !


आज अगर मैं चुप शांत खड़ा हूँ
और धरा है मौन
नहीं समझ पाओगे तुम
समझा है अब तक कौन?


सृष्टि के नीयम सिद्धांता
एक शून्य जुड़ा है संग
विस्तार देख चुका हूँ उसका
रह गया हूँ निःशब्द औ' दंग


कुछ करूँ भी तो शून्य है सब
न करूँ भी तो शून
देख सब कुछ सोच रहा हूँ
दिन बिताओं कैसे आखें मून

क्या धेय जीवन का है
जब नहीं है कुछ उस पार ?
जब व्यर्थ है चल अचल औ'
नश्वर सब संसार


क्यूँ नहीं समझता है कोई
बात है गंभीर
कहाँ खोलूँ कुंठित मन को
हृदय दिखाओं चीर




-------------…

आज का अर्जुन

कुछ देर से ठहर गया हूँ
गया हूँ चलना भूल
जाने क्या सहता रहा है हृदय
चुभा कौन सा शूल

किस कुरुक्षेत्र का अर्जुन हूँ मैं
लेने हैं किनके प्राण
कौन सी गीता गूँज रही कानों मनी
सिद्ध करना है आखिर कौन सा संधान ?


जलता है मन धुंवा उठता हृदय में
पर पीड़ा समझे कौन ?
गहुँ किसके चरण आज मैं
केशव भी हैं मौन ?


चाह नहीं मुझको कुछ पा लूँ
या करूँ श्रेथता सिद्ध
अपनों के लहू चीथड़ो से ढक दूं धरा को
नोचे उनको गिद्ध


यदि गांडीव धरी धरा पर
क्यूँ उकसाते हो मुझको
व्यर्थ हुंकार भरते हो क्यूँ
क्यूँ जागते हो मुझको ?


नहीं जानते क्या तुम इतना भी
लहू पीते हैं ये तीर
नहीं रोकते रुकते हैं किसिके
उठ जाते हैं जब मुझसे वीर !


आज अगर मैं चुप शांत खड़ा हूँ
और धरा है मौन
नहीं समझ पाओगे तुम
समझा है अब तक कौन?


सृष्टि के नीयम सिद्धांता
एक शून्य जुड़ा है संग
विस्तार देख चुका हूँ उसका
रह गया हूँ निःशब्द औ' दंग


कुछ करूँ भी तो शून्य है सब
न करूँ भी तो शून
देख सब कुछ सोच रहा हूँ
दिन बिताओं कैसे आखें मून

क्या धेय जीवन का है
जब नहीं है कुछ उस पार ?
जब व्यर्थ है चल अचल औ'
नश्वर सब संसार


क्यूँ नहीं समझता है कोई
बात है गंभीर
कहाँ खोलूँ कुंठित मन को
हृदय दिखाओं चीर




-------------…

रंग अकेलेपन के