Saturday, January 16, 2010

मृत

मौसा तुम दम तोड़ गए मेरी अभागी बाँहों में
नन्हे पुत्रों के नाम थें बस तुम्हारी अंतिम आँहों में
मैं निठुर चुप बैठा रहा
दो अश्रु न आ सके मेरी शिथिल निगाहों में

ab* अपलक मुझको देख रहे हो मृत मूरत बन
भरी जवानी में यूँ तुम क्यूँ छोड़ चले तन?
मेरी भी नियति निराली है प्यारे मौसा
कैसे सम्झाहूँ है खुद को कुंठित आज मेरा ही मन?

कैसे कहूँ आज नान्हे तेरे पुत्रों से ये
तुम नही हो, नश्वर था, बस शरीर है ये
केशव क्यूँ आज तुम चुप हो प्रतिमा बन
कैसे बुझा दूँ आरती जो मौसी हैं jalaye* लिये?

एय कविता तुझे यहीं छोड़ दूँ मैं
कलम आज स्वयं ही तुझे तोड़ दूँ मैं
क्यूँ न आज ही अभागा
ये शरीर इसी पल छोड़ दूँ मैं ?


गीता के श्लोक आज क्यूँ मौन पड़े हो
देव दारूद बन शांत खड़े हो
केशव तेरी मुरली क्या भूल गयी स्वर
संवेदन लुप्त हो गयीं क्या महाभारत जबसे लड़े हो ?

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तू किसी शोख़ का सिंगार कर रख भी दे ये ख़ामोशी उतार कर तीरगी ये पल में टूट जायेगी  चल दोबारा ज़िन्दगी से प्यार कर एक ही नहीं कई शिकायतें ...