Friday, January 8, 2010

ये सभ्यता

समय के साथ अनुतरित प्रश्नों का सार्थकता खोते जाना
विश्वास की बैसाखी पकडे उत्तरों में केवल एक मौन पाना
आज क्षितिज पर आँखें टिकाये, स्थिर खड़ा मैं
फिर वही प्रश्न पूछता हूँ, आखिर कब तक यूंही खुद को बहलाना?

ईश्वर, भागवद, पूरण, धर्म की चौ दिवारी के अन्दर बैठी ये सभ्यता
मौन खड़ी प्रश्नों को सुन कर, कहाँ है इसकी महान निर्भयता
हृदय के इस पीड़ा और आलाप का कारन बनी ये
चुप लज्जाहीन खड़ी सुन रही, है क्रूर ये है इसकी निर्दयता

मृग त्रिश्नाओं के मध्य खड़ा मैं सत्य का प्यासा
संग मरती जाती प्रतिपल मेरे, उसे जानने की मेरी जिज्ञासा
ये निर्दयी समाज अधूरा रह जाएगा चौ दिवारी में
कोई समझाओ अब इसको जीवन की सच्ची परिभासा

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चल दोबारा ज़िन्दगी से प्यार कर

तू किसी शोख़ का सिंगार कर रख भी दे ये ख़ामोशी उतार कर तीरगी ये पल में टूट जायेगी  चल दोबारा ज़िन्दगी से प्यार कर एक ही नहीं कई शिकायतें ...