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Showing posts from March, 2010

फिर सजा बाज़ार मौला आज तेरे शेहेर में

फिर सजा बाज़ार मौला आज तेरे शेहेर में
बिकता है खरीदार मौला आज तेरे शेहेर में

नीलाम है ईमान का घर
हर शख्स है बे आबुरु
वाइज़ भी गमखार मौला आज तेरे शेहेर में

मुल्क शहीदों का जो था
है आज मुलजिमो के हाथ में
शहादत गयी बेकार मौला आज तेरे शेहेर में

अब्र बरसा दे अब के
पानी से लहू मिटाता नहीं
हर हाथ में तलवार मौला आज तेरे शेहेर में

खूब रोया याद कर के
बीते दिनों के बात मैं
ईमान की है मज़ार मौला आज तेरे शेहेर में

अब नहीं कश्टी हमारी
चाह में साहिल के है
हैवान है खूंखार मौला आज तेरे शेहेर में

LIfe, so far

Four years of college life is now coming to an end. Here I am standing all alone, under a tall tree, in its shades and observing a kid in the park who is running after a puppy. All of a sudden now I realize that it has been long since I have chased puppies.
There was a time when I was a kid, running behind butterflies and observing blades of grasses for hours. I wanted to see a plant grow but then dad told me the plants grow only when I am in deep sleep, in day time the plants are afraid of me. I would feel so strong to know that I can connect with even a blade of grass. I knew for sure that there is one single thread that runs throughout the universe and everything interact with each other. I was so happy. Everything was meaning and full of wonder and beauty.
I cannot recall when exactly everything changed. I believe the things did not change overnight. The flood of thoughts and imagination was hindered by the bitter, cruel realities. The school and its education made me think differ…

प्रांगन में था पेड़ बरगद का, मैंने देखा नहीं

नहीं जानती माँ उसकी
लिखता है वो कवितायें
बस उदास रहती है के
बेटा कुछ कहता नहीं ....
गम सुम बस बैठ जाता है
हर शाम मुंडेर पर
उँगलियों में कलम घुमाता
देखता रात के आँचल को
मन ही मन कुछ कहता और
हंस देता...फिर वही एक विचित्र सा मौन
नहीं पूछती वो कुछ भी लाल से
मन को खुद ही समझा लेती
ये उम्र ही ऐसी है उसकी
हो सकता है किसी लड़की के सपने होंगे जागते उसे
क्या पता चाँद में एक चेहरा ढूंढता होगा वो
या कुछ सोचता होगा भविष्य की
हो सकता है भागवद का कोई श्लोक गूंजता होगा उसके मन में ..
ऐसा तो नहीं किसी ने कह दिया कुछ मेरे भावुक लाल से
ऐसा तो नहीं कोई बात टीस उठा रही है उसके निर्मल मन में
या बस जिद्दी है क्रमों से दूर भाग रहा वो ............

दादी

दादी की कोठरी में रखी लकड़ी की आलमारी
अन्दर रखती है दादी उसमें
पूजा का सामन और एक डब्बे में
मिश्री बताशे और किशमिश .
दोपहर में सब सो जाते नींद मुझे आती नहीं
सोयी दादी तो उठानी भी थीक नहीं
एक डब्बा खीच लाता हूँ नन्हे हाथों से
और सामने रेख कर आलमारी के
खड़ा हो जाता हूँ उसपर
फिर खोलता हूँ पल्ला आलमारी का
मुट्ठी भरता हूँ किशमिश बताशों से
छोटी मुट्ठी मेरी, थोडा खता ज्यादा गिराता हूँ
कुछ भी शोर किया नहीं मैंने
जाने कब दाबी नींद से जाग गयी
अब मेरे पीछे खड़ी मुस्का रही है वो
कान्हा कह गोंद में उठा लिया मुझे...
दादी की गोंद में कितना ऊंचा हो जाता हूँ में
.

वो वाली कहानी सुना दो

बाबा वो वाली कहानी सुना दो
राज कुमारी जिसमें रजा से
मांग बैठती है चंदा को
जिसमें राजा के सारी सेना
निकल पड़ती है चाँद लाने
बाबा आगे कुछ कुछ भूल गया मैं
थोड़ा सा तुम याद दिला दो
कैसे राजा ने फिर बिटिया के
नाखून को चाँद बताया था
और कैसे आसमान से चाँद उँगलियों पर लाया था
बाबा ऐसा क्यूँ है बोलो
जो कहानिया बचपन में
मुझको खूब हंसाती थीं
आज सत्य के क्रूर प्रहार पर
मौन धरे रह जाती हैं ...

निः शब्द मन

क्या कहें के दर्द कोई अब कहीं उठता नहीं
जाने ऐसा क्या हुआ के घाव मुझको भा गया.
समाज घर परिवार यहाँ से अब मुझे दिखता नहीं
आँखों के मेरे सामने ये कैसा अँधेरा छा गया.
मौत नहीं अभी आई मुझको इतना तो आभास मुझे
चोंच मारने भूखा परिंदा यहाँ तक फिर क्यूँ आ गया..
गला मेरा सूखता है विश्रांति की अब बस प्यास मुझे
भूख मिटाने के लिए मैं गम अपना सारा खा गया.
अब कोई मुझसे जो पूछे मेरा ऐसा हाल क्यूँ
क्या हुआ के इस चट्टान पर मैं अकेला आ गया
निर्वस्त्र हूँ क्यूँ और यहाँ पर खड़ा फैलाये बाल क्यूँ
अनायास किस बात पर फिर मुझको रोना आ गया.

हार

दुखता है मन हर हार पर
जाने क्यूँ एय दिल जीत की प्यास भी नहीं
क्या कहें कैसे कहें कौन समझेगा
हमको अपने भी समझे ही नहीं
चल चलें कहीं दूर यहाँ से
चलें उस रेत के सेहरांव पर
कहते हैं साहिल जिसे
चल बनायें वहां एक रेत का घर
कुछ नहीं तो याद अपना
बचपन ही आ जाएगा
तो क्या की उठती लहर के साथ
घर अपना खो जाए गा
चल लिखेंगे नाम अपना
हाथ से हम लहर पर
और हँसेंगे चट्टानों पे नंगे खड़े हो
जीवन के सफ़र पर
सीपियाँ चुन दिन बितायेगें एय दिल
रात वही अपनी कब्र खोद कर
सो जायेंगे
किसी खामोश लहर के आगोश में
सो जायेंगे
रात वही अपनी कब्र खोद कर
हम दोनों ही सो जायेंगे

धर्मं का भी आँगन कितना श्वेत है ?

तेरे मेरे इस देश में
वाराणसी नाम का एक गाँव है
वहां अस्सी घाट पर
एक अलग सा ठहराव है
गंगा का अद्भुत विस्तार उधर
इधर श्रद्धा का अनुपम बहाव है

यहाँ बैठ तू देख मानुज़
एक झलकी अपने ही संसार की
डुबकी लगाता भक्त एक
अंजुली जल से भरी नार की
इस पार बैठ सोच तनिक तू
कहानी क्या है उस पार की

निर्मल जल, मध्य धार लाश तैरती
सामने तेरे भक्त मंत्र बोलता
साथ उसके वो लाश बोलती -
"क्यूँ नहीं तू आँख खोलता
समर्पण तेरा किस अज्ञात में
आखिर कौन तेरे कर्म तोलता ?"

क्षितिज पर टिके उस लाल सूर्या से
अब एय भक्त पूछ जरा तू
साँसों का आखिर तेरी क्या मोल था
है आज जीवित या मरा तू
कहता है तू आस्था है ये तेरी उसमें
मुझको फिर दीखता है इतना क्यूँ डरा तू


दैवीय इस स्थान पर भी
पत्थर जल और बस रेत है
प्रश्नों से दूर भागती भीड़ चीखती
पूछने वाला एक भूत या प्रेत है
मुझपर अधर्म का आरोप सही तू ये बता
धर्मं का भी आँगन कितना श्वेत है ?

शतरंज

अपलक देख रहा हूँ
शतरंज की बिसात पर बिछी बाज़ी को
जो वजीर बढ़ाती हूँ
घोडा मात खाता है
घोडा पीछे हटा दूँ जो,
तो पुरानी चार चालें निरर्थक
क्यूँ न प्यांदा बलि चढ़ा दूँ ,
फिर देखि जायेगी ..
पहले ही एक गलती पर हांथी गँवा चूका हूँ मैं ...

मुद्दत हुई मयकदे गए

मुद्दत हुई मयकदे गए, नहीं है फुर्सत आज कल
मयनोशी का वो दौर था, नहीं है आदत आज कल

कुछ बात के जी नहीं लगता ऐ दिल तेरे शेहेर में
हर शख्स से जाने क्यूँ हमको है नफरत आज कल

दरवाजे घर के खोल कर, आये हैं हम चौक पर
जाओ सब कुछ लूट लो, भाति नहीं दौलत आज कल

कोई मिले तो दे चले हम सब कुछ अपना सौंप कर
हाथों में लेकर घुमते हैं अपनी वसीयत आज कल

क्या कहें 'चक्रेश' के जी लगता नहीं अब बज़्म में
हिज्र की रा-ना- ई-यों में दिखाती है जन्नत आज कल

मुहब्बत की स्याही वाही कलम

जब उस रोज़ बैठा था मैं
अकेले किसी सोच में खोया
बाग़ में पेड़ों की छाँव में ...
याद है क्या तुम्हे वो दिन, जब तुम आई थी
हंसकर
और दे गयी थी मुझे एक तोहफा कलम का...
फिर बैठ गयी थी वहीं पहलू में मेरे
और जिद्द की थी एक नज़्म लिखने की
लिखी थी एक नज़्म उसी मुहब्बत की स्याही वाही कलम से मैंने
याद है क्या तुम्हे
कैसे नज़्म पढ़ते पढ़ते
मदहोश हो गयी
ऊपर दाल से ताकती एक कली कनेर की
और आ गिरी कागज़ के सीने पर
फिर तुमने रख ली थी वो कली
अपनी एक किताब के पन्नो में दबा कर
कैद कर लिया था तुमने उस लम्हे को,
खुसी से, सदा के लिए .
अब वक़्त बदल गया है
काफी कुछ नहीं रहा पहले जैसा ... जानता हूँ
कुछ था उस कलम में,
उसकी स्याही से निकली ...
हर नज़्म में खुशबू थी
कुछ बात थी ...
जीने का सहारा बन गया था वो तोहफा तेरा
आज वो कलम खो आया
फिसल गयी उँगलियों से मेरी, मैं पकड़ न सका उसे
जिंदगी फिर वीरानी सी लग रही है अब
दीवाना हूँ... जानता हूँ ..मगर फिर भी
मांगता हूँ तुमसे आज वही कलम उसी स्याही वाली फिर से
देखो शायद मुहब्बत की स्याही वाली बोलत में,
कुछ बूंदे स्याही की बची रह गयीं हो कहीं .....
जानता हूँ कोई वास्ता नहीं अब तुमको मुझसे
फिर भी
क्यूँ नहीं पुरानी अप…

जनम दिवस (मेरा)

समझ की डोर में
गाँठ पर गाँठ पड़ती जाती है
उंगलियाँ सुलझाने में हैं असमर्थ.
हो सकता है नाखून छोटे हैं,
मेरी उँगलियों के अभी.
उलझते सुलझते आज अनायास आभास हुआ
कि
एक बरस बीत गया
और
द्वार आ खड़ा हुआ मेरे,
रवि के रथ पर सवार होकर,
एक और जनम दिवस (मेरा).

घर में बिखरा सामन,
सपनों के टुकड़ो से ढकी फर्श,
समय कि धुल से छिपी यादों की तस्वीरें,
भावना की अध्-जली काली लकड़ियाँ,
और बीचों बीच, डोर में उलझा बैठा मैं
ऊठुं कैसे पहुंचूं द्वार तक,
करूँ कैसे मेहमान का स्वागत ?
साल में एक ही बार तो आता है ये प्रिय मेरा
बस एक दिन हंस कर मेरे साथ बिताने के लिए
हर बार की तरह, कैसे हंसकर द्वार खोल दूँ घर का इसबार ?
हंस कर कैसे व्यक्त करूँ खुसी उसके आगमन पर ?

क्यूँ न जिद्द की झाडू उठा
साफ़ कर दूं घर को
क्यूँ न बाहर कर दूँ इन बेकार की चीजों को
क्या मोल है ऐसी उलझी हुई समझ की डोर का,
ये तुकडे भी तो याद दिलाते रहते हैं टूटे सपनों के बस,


या कह दूं आगंतुक से
ना आ इस बार द्वार नहीं खोलूँगा मैं
घर छोड़ कर या चला जाऊं मैं कहीं दूर टहलता

....

प्रतीक्षा

समझ की मथनी से
आत्म मंथन करते करते
जाने कब ऐसा हुआ
कि मस्तिष्क कि सतेह से भाप बन
शब्दकोश के सारे शब्द
एक एक करके छु हो गए |
मैं अकिंचन
आज आ बैठा कविता तेरी चौखट पर
सारी रात तेरी झोपड़ी के पट को
टक टकी बांधे देखता रहा
तू द्वार खोलती ही नहीं |
तुझ गरीब की झोपड़ी के टूटे छप्परों
से छन छन कर अन्दर जाती चाँदनी
से भाग भी न हैं मेरे
कि एक झलक भी तेरी पालूँ |
बहार पड़ी चारपाई बार बैठा
सारी रात
भावना कि लकड़ियों पर हाथ सेकता
ठिठुरता
कांपता मैं
प्रतीक्षा कर रहा हूँ
पट के खुलने का |
शून्य मेरी आत्म का
कदाचित तू मुखरित कर दे
अभिव्यक्ति की सीमाओं के आगे जाकर
आत्म और बाह्य शरीर के बीच के व्योम को
भर दे |

ey कविता एक anurod बस इतना सा है
अपनी चौखट से khaali न लौटा मुझे
मुझको भी अन्दर आने का
पावन एक अवसर दे ...

तिनका तिनका टुकड़ा टुकड़ा

तिनका तिनका टुकड़ा टुकड़ा चुन चुन के पैगाम लिखा
इक ख़त अपने दिल की बातों का हमने तेरे नाम लिखा

तुमको देखूं तो जाने छाती है क्या खामोशी
अब तक जो कुछ कह न पाया वो सब दिल को थाम लिखा

सच कहते है सब पीने वाले मय में कोई बात है
हमने भी आज मैखाने जाकर हाथों में ले जाम लिखा

रहता है तू दिल में मेरे है दिल के कितना करीब
एय बासिन्दे दिल की गलियों के प्यार का पहला सलाम लिखा

बेखुदी येही है शायद दीवानगी इसी का नाम
इक इक करके सब लिख गए हम अपना पता न नाम लिखा

कुछ ने कहा है चाँद

कुछ ने कहा है चाँद कुछ ने तुझे हूर कहा है
शायरों ने तेरे हुस्न पे कुछ न कुछ जुरूर कहा है

जिस जिस पर पड़ गयी कातिल तेरी नज़र
झुक झुक कर उसने तुझे बारहां हुजूर कहा है

एक हम ही हैं अकेले शायर सारे शेहेर में
जिसने तुझे एय साकी हंसकर मुग्रूर कहा है

कहते हैं अदा जिसे वो अपने शेरों में
आकर देख इधर हमने उसे बस गुरूर कहा है

उसके आगे एय साकी तेरा हुस्न कुछ नहीं
जिस शख्स को हमने अपनी आँखों का नूर कहा है

इक घडी हुआ करती थी

इक घडी हुआ करती थी (मेरी )
टिक टिक चलती रहती थी
कुछ न कहती कुछ न मांगती
बस समय दिखाया करती थी

इक दिन हंस कर के पूछ जाने किस कारण
क्यूँ चलती रहती हो तुम एय 'जान -ए -मन '
न्योछावर करती हो मुझपर आखिर क्यूँ
तुम अपना योवन, तन-मन-जीवन ?

बस इतना सुनना था की वो,यारों चहक गयी
सच कहता हूँ ,बिन पीये भरी दुपहरी बहक गयी
घूम घूम कर कांटे तीनों टूट गए यारों उसकी अंगड़ाई पर
जाने ऐसा क्या हुआ की दुनिया उसकी महक गयी

'एय प्राण प्रिये अपनाया तुमने
पूरी हुई जीवन की आस
पाषाण बन कर रह गयी थी मैं अहिल्या
अब पहुंची साजन के पास'

मैं भौचक्का रह गया हक्का बक्का
घड़ियाँ भी क्या बोलती हैं
हाल-ए -दिल यूँ खोलती हैं?

वो तुक रुक देख रही मुझे बस
ऐसे जैसे काम तीरों से घायल हुई वो
खो बैठी अपने आप पर वश

'देख प्यारी, प्राण दुलारी,
फुर्सत में करेंगे बातें ढेर सारी
समय बता दे
छूट न जाए मेरी लोरी'

पर कहाँ मानती जब ठान लेती हैं
घड़ियाँ भी तो आखिर स्त्री होतीं हैं
हार जाते हैं महारथी भी इनसे
जब ये नैनो में नीर भरकर रो देतीं हैं

अब हार गया मैं भी क्या करता
ये नहीं की मैं हूँ उससे डरता
चल दिए 'डेट' पर दोनों
इससे पहले की सदमे से उभरत…

खिलौना टूट गया

खिलौना टूट गया
मैं चुप रहा
खिलौना टूट गया
मैंने कुछ न कहा

माटी का पुतला था
टूट गया तो क्या ?
माटी का पुतला था
हाँथ से छूट गया तो क्या ?

टुकडे कब जुड़ते हैं बोलो
टुकड़ों पे कैसा रोना ?
टुकडे कब जुड़ते हैं बोलो
ये तो था इक दिन होना

कल फिर आयेगा खिलोने वाला
फिर लायेगे खिलोनों का भण्डार
कल फिर आएगा खिलोने वाला
फिर पूरा हो जायेगा मेरा संसार

खिलौना टूट गया
मैं चुप रहा
खिलौना टूट गया
मैं चुप रहा
मैं चुप रहा



...............................
चक्रेश सिंह
८/२/२०१०

जब कभी

जब कभी शाम का सूरज टिका हो किनारे पर
लौट रहे हों परिंदे
ढल रहा हो दिन
और
आँखें दब दबा जाएँ तेरी
उठने लगे भीनी खुसबू भींगे गालों से

जब कभी क्षितिज तक उंगलिया दौड़ाने पर भी
न मिले अपना खोया सितारा
और नहीं लगता हो मन जब
किसी और तारे में

जब कभी चाँद उफक से ताकता हो
पूछता हो बेकरारी का सबब
और जब एहसास होता हो की
बस यूंही मन हुआ था
आज रोने का
और कोई बात न थी
इक बहनa था अपना सितारा खोने का
बस रो पड़े, के यूँही मन था आज रोने का

जब कभी धड़कन टोकने लगे
समय की सूइयों से होती हो चुभन
और यूँही जब मन उदास हो
प्यारा साथी न कोई पास हो

तब गीत मेरा वो
तुम गुन गुना लेना
और भूल jaana तुम सब कुछ
dheere se मुस्करा देना

==============================================

Chakresh

एक ग़ज़ल तेरे नाम कर गए

लम्हा लम्हा याद कर सुबो से शाम कर गए
लो आज फिर एक ग़ज़ल तेरे नाम कर गए

हुस्न देख लिया हमने परदे को खेंच कर
इस बेखुदी में जाने क्या क्या काम कर गए

खूब चला सिलसिला छुप छुप के मिलने का
चर्चा मुहब्बत का शेहेर में आम कर गए

अपनी कब थी परवाह, जिल्लत से कब था डर
लो साथ अपने तुझको भी बदनाम कर गए

जुदा हुआ तू मुझसे , चाँद में पा लिया तुझे
तुझसे जुदा तन्हा जीने का इत्तेजाम कर गए

ये अनुरोध कैसा है

जलता दिया मंदिर का
पीपल के सीने से लिपटी असंख डोरें
आस्था परिभाषित करती
भीड़ मानसरोवर की
एक अद्रिस्य में
एक सर्व्वापी में
एक परमात्मा में
एक ब्रह्म में

गीता पुराण उपनिषद् धर्मं ग्रंथों
की दीवारों का किला
एक ऊंचा लाल झंडा
जीत का प्रतीक
या कदाचित आस्था का
संजोये अपने अन्दर
एक मूक
एक प्रश्नहीन भक्ति में लीन
एक जगराता से थक हार कर सोयी भीड़ को

पूछता हूँ मैं एक ही प्रश्न बार बार
क्या सोच थी जीवन मरण के सोच के पीछे
क्यूँ हथेलियों पर भाग्य रेखाओं ने खींचे
जन्म का स्रोत जो था है जब अंत वहीं पर
क्या उद्देष्य सिद्दा हुआ रचईता संसार को रच कर ?
आज मेरे प्रश्नों पर का उत्तर ये क्रोध कैसा है
नास्तिकता का आरोप मुझपर है क्यूँ
प्रश्नों को बदलने का ये अनुरोध कैसा है ?

और कुछ नहीं

क्यूँ बांधते हो मुझको, चाहत की डोर पर
इक गाँठ छोड़ जाऊँगा मैं और कुछ नहीं

बदनामों की कमी कहाँ, उल्फत की राहों में
एक नाम जोड़ जाऊंगा मैं और कुछ नहीं

नूर बना लिया क्यूँ मुझे मासूम निगाहों का
इक वादा तोड़ जाऊँगा मैं और कुछ नहीं

फ़ना होगा तू, जुलूस होगा जनाजे पे
मुह मोड़ जाऊँगा मैं और कुछ नहीं

मुसाफिर हूँ, रुकना रात तेरे शेहेर में
सुबह सबको छोड़ जाऊँगा मैं और कुछ नहीं

दंगे

सुना रात मस्जिद गिरा दी की एक मंदिर बनाना है
मासूमो की लाशों पर किसी को खुनी वोट पाना है

दंगे शेहेर में काटे जिन्दा जलाये गए लोग कई
या इल्लाही ! हैवानियत का ये कैसा जमाना है

थर्राता है बचपन अँधेरे कमरों में छिपा हुआ
कौन जाने आज किस नन्हे यार का घर जल जाना है

नंगी तलवारों का नंगा शोर, कट्टे बन्दूंके हर हाथ में
गरीबी बेरोजगारी की आग दिखाने का ये अच्छा बहाना है


राम तुम हार गए रावन से युद्ध में
आओ देखो आज हर अयोध्या रावनो का ठिकाना है

लम्हों को जिया करो

ढलती हुई शाम का मज़ा चक्रेश लिया करो
लम्बी बहुत है जिंदगी लम्हों को जिया करो

पीते नहीं हो तुम ये जानता हूँ मैं
दोस्तों की खातिर यूँही जाम उठा लिया करो

अफ़सोस रह जाए दिल को ये ठीक तो नहीं
साकी से दिल की बात खुल कर किया करो

साहिल तक आती लहेरों को बस रेत नसीब है
कुछ खोने की भूल कर बेफिक्र बहा* करो

वो देखो हंसने पे तुम्हारे बहार आ गयी
लोगों की फ़िज़ूल बातों से मायूस न हुआ करो

कोई आईना दिखाता ही नहीं

खुद को देखे अरसा हो गया
की अब कोई आईना दिखाता ही नहीं

थक गया हूँ, देखता आया अब तक औरों को
की इस शेहेर में कोई चेहरा भाता ही नहीं

सोचा था ये जिंदगी तेरे नाम कर दूंगा
मेरी गली पलट कर तू आता ही नहीं

अश्को का सैलाब बहा रखा है
के ये दिल अब कोई बात छुपाता ही नहीं

खुद अपना ही जनाजा सजाये बैठा हूँ
कोई आगे बढ़ कर हाथ लगता ही नहीं

कल नए फूल लगा दूंगा

शाम हुई घर लौट आया मैं
मेरी राह ताकते थक गए गुल गुल्दाम के
सूख कर बेजान हो चुके सारे...
मेरे प्यारे
फूल सारे
निकाल फेंकता हूँ पुराने फूलों को
कल नए फूल लगा दूंगा
कल नए फूल लगा दूंगा

Let there be some sun shine

‘I love my country’ is probably the second most common phrase for a youth of today to say (of course ‘I love you’ being the first). The painful aspect attached to both the phrases is that most of times the person who utters these seemingly simple words, does not even realises the idea behind love. Well, though this is what I feel. One may disagree with me.
Come with me on a tour, and let’s see what we find out. Think of a compartment of a train, where a heated discussion is going on. Topic? Any guesses? Well yes, politics! of course. What do we talk most of the time? I do not even need to bother myself writing all that, you know already. The point is let say, there are thousands of trains running at every moment of time across our vast, diverse nation and let say, there are thousands of such compartments where such heated discussions are going on. Who is the speaker? And who is the listener? Where does, such talks lead us to? And what exactly is the outcome? Well these are the questi…

जीवन के रंग रूप

Image
सुख दुःख के घेरे
जीवन के रंग रूप
माँ के आँचल की छाँव
कहीं चिलचिलाती धुप

चाहने वालों के मेले
गुमनामी का विराना
कोशों तक फाली चुप्पी
खुद से ही बतियाना
रुन्धता गला
यूंही ही आदतन मुस्काना
दुहराना बार बार गीता का
ढूढना ईश्वर स्वरुप

सुख दुःख के घेरे
जीवन के रंग रूप
माँ के आँचल की छाँव
कहीं चिलचिलाती धुप

अनुमान आज से ही
चित्त को चिता की ताप का
कर्म-तुला पर
लेखा जोखा पुण्य-पाप का
ये काव्य है परिणाम
मन से उठते भाप का
आगई आज पृष्ठ पर
हृदय की भावना अनूप


सुख दुःख के घेरे
जीवन के रंग रूप
माँ के आँचल की छाँव
कहीं चिलचिलाती धुप

आज का अर्जुन

Image
कुछ देर से ठहर गया हूँ
गया हूँ चलना भूल
जाने क्या सहता रहा है हृदय
चुभा कौन सा शूल

किस कुरुक्षेत्र का अर्जुन हूँ मैं
लेने हैं किनके प्राण
कौन सी गीता गूँज रही कानों मनी
सिद्ध करना है आखिर कौन सा संधान ?


जलता है मन धुंवा उठता हृदय में
पर पीड़ा समझे कौन ?
गहुँ किसके चरण आज मैं
केशव भी हैं मौन ?


चाह नहीं मुझको कुछ पा लूँ
या करूँ श्रेथता सिद्ध
अपनों के लहू चीथड़ो से ढक दूं धरा को
नोचे उनको गिद्ध


यदि गांडीव धरी धरा पर
क्यूँ उकसाते हो मुझको
व्यर्थ हुंकार भरते हो क्यूँ
क्यूँ जागते हो मुझको ?


नहीं जानते क्या तुम इतना भी
लहू पीते हैं ये तीर
नहीं रोकते रुकते हैं किसिके
उठ जाते हैं जब मुझसे वीर !


आज अगर मैं चुप शांत खड़ा हूँ
और धरा है मौन
नहीं समझ पाओगे तुम
समझा है अब तक कौन?


सृष्टि के नीयम सिद्धांता
एक शून्य जुड़ा है संग
विस्तार देख चुका हूँ उसका
रह गया हूँ निःशब्द औ' दंग


कुछ करूँ भी तो शून्य है सब
न करूँ भी तो शून
देख सब कुछ सोच रहा हूँ
दिन बिताओं कैसे आखें मून

क्या धेय जीवन का है
जब नहीं है कुछ उस पार ?
जब व्यर्थ है चल अचल औ'
नश्वर सब संसार


क्यूँ नहीं समझता है कोई
बात है गंभीर
कहाँ खोलूँ कुंठित मन को
हृदय दिखाओं चीर




-------------…

आज का अर्जुन

कुछ देर से ठहर गया हूँ
गया हूँ चलना भूल
जाने क्या सहता रहा है हृदय
चुभा कौन सा शूल

किस कुरुक्षेत्र का अर्जुन हूँ मैं
लेने हैं किनके प्राण
कौन सी गीता गूँज रही कानों मनी
सिद्ध करना है आखिर कौन सा संधान ?


जलता है मन धुंवा उठता हृदय में
पर पीड़ा समझे कौन ?
गहुँ किसके चरण आज मैं
केशव भी हैं मौन ?


चाह नहीं मुझको कुछ पा लूँ
या करूँ श्रेथता सिद्ध
अपनों के लहू चीथड़ो से ढक दूं धरा को
नोचे उनको गिद्ध


यदि गांडीव धरी धरा पर
क्यूँ उकसाते हो मुझको
व्यर्थ हुंकार भरते हो क्यूँ
क्यूँ जागते हो मुझको ?


नहीं जानते क्या तुम इतना भी
लहू पीते हैं ये तीर
नहीं रोकते रुकते हैं किसिके
उठ जाते हैं जब मुझसे वीर !


आज अगर मैं चुप शांत खड़ा हूँ
और धरा है मौन
नहीं समझ पाओगे तुम
समझा है अब तक कौन?


सृष्टि के नीयम सिद्धांता
एक शून्य जुड़ा है संग
विस्तार देख चुका हूँ उसका
रह गया हूँ निःशब्द औ' दंग


कुछ करूँ भी तो शून्य है सब
न करूँ भी तो शून
देख सब कुछ सोच रहा हूँ
दिन बिताओं कैसे आखें मून

क्या धेय जीवन का है
जब नहीं है कुछ उस पार ?
जब व्यर्थ है चल अचल औ'
नश्वर सब संसार


क्यूँ नहीं समझता है कोई
बात है गंभीर
कहाँ खोलूँ कुंठित मन को
हृदय दिखाओं चीर




-------------…

रंग अकेलेपन के

Image
जब भी अकेला हो जाता हूँ
हूँ न जब हंस पाता
तब याद बहुत आती हो
तब याद बहुत आती हो -2

सपनो में जब जागी आँखों से
मैं दूर निकल जाता हूँ
चिंताओं की तोड़ जंजीरें जब
स्वतंर्त्र स्वयं को पाटा हूँ
तब याद बहुत आती हो -२

मधुबन में जूही कलियाँ
जब हैं पवन संग लहराती
डोर तोड़ जब पतंग कोई
नब है खो jaati
तब याद बहुत आती हो -२

भूली कोई धुन बन्सी की
याद मुझे जब आ जाती
यमुना तीरे गोपी जब कोई
मटकी भरने आती
तब याद बहुत आती हो -२

जब नीले आकाश पर
लाली शाम की छाती
साड़ी रात जब चाँद की
है चाँदनी जगती
तब याद बहुत आती हो -२

रिश्ते स्वार्थ के जब
तान तान तीर चलाते
पौरुष कवच बेद तीर जब
हृदय चीर हैं जाते
तब याद बहुत आती हो -२

जब ठोकर खा गिरता हूँ
और fir सम्हालता हूँ
घावों पर जब खुद ही
हांथों से मलहम मलता हूँ
तब याद बहुत आती हो -२
त्योहारों में दीपों रंगों के
जब होते हैं बेरंग अँधेरे
भीड़ से दूर जब एकांत मांगते
आत्मा-हृदय-तन -मन मेरे
तब याद बहुत आती हो -२

विना की बेसुरी तान पे
राग जब अर्थ खो जाते
जीवन के सपने सागर जब
व्यर्थ अधूरे रह जाते
तब याद बहुत आती हो
हाँ, तब याद बहुत आती हो
तब याद बहुत आती हो.....

ये बालक

ये बालक

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जवानी की देहलीज पर खड़ा
समय के एक धक्के की प्रतीक्षा में
ये बालक

समझ कुछ दूर साथ चली पर
थक रही है अब लड़खड़ा रही है
नशे में धुत एक शराबी सी .
जलती आँखों से नींदे गायब
थके शरीर में सोने की इक्षा का अभाव
कुछ करने न करने में अंतर नहीं कर पाता
समय की छोटी सी खिड़की से
एक टुकड़ा आसमान यथार्थ का देख कर लौटा
ये बालक

जीवन के द्वंदों से जूझता
हांफता काँपता डरता गिरता सम्हलता
आगे बढता
ये बालक

डरता हूँ मैं
कहीं जो ये बोझ न उठा पाया
कहीं जो ये औरों की तरह खुद को न बदल पाया
कहीं कुछ बचपना शेष रह गया,
समय की मार से खुद को बचा कर यदि
कैसे फिर ये चल पायेगा सत्य की नग्न तलवार पर ?
सपनों का आकाश
तारों से सजी रात
और इसपर चमकता चाँद
जो इक इक कर के टूटने लगे
इस आकाश के तारे
जो घुलने लगे चाँद
सत्य के उजाले में
और जो खो jaaye ये सपने सारे
क्या वो रह पायेगा जो आज है
ये बालक ?
क्या ये एक क्षति नहीं होगी
क्या ये एक हत्या नहीं होगी
जो दम तोड़ दे
ये बालक ?
ये कैसा सत्य की जिसमे
कोई बालक नहीं
ये कैसा बड़ो का समाज
की जिसमे भावनाओं पर बाँध है
ये कैसी रात
की जिसमे सबका एक ही चाँद है ?