Wednesday, March 3, 2010

आज का अर्जुन

कुछ देर से ठहर गया हूँ
गया हूँ चलना भूल
जाने क्या सहता रहा है हृदय
चुभा कौन सा शूल

किस कुरुक्षेत्र का अर्जुन हूँ मैं
लेने हैं किनके प्राण
कौन सी गीता गूँज रही कानों मनी
सिद्ध करना है आखिर कौन सा संधान ?


जलता है मन धुंवा उठता हृदय में
पर पीड़ा समझे कौन ?
गहुँ किसके चरण आज मैं
केशव भी हैं मौन ?


चाह नहीं मुझको कुछ पा लूँ
या करूँ श्रेथता सिद्ध
अपनों के लहू चीथड़ो से ढक दूं धरा को
नोचे उनको गिद्ध


यदि गांडीव धरी धरा पर
क्यूँ उकसाते हो मुझको
व्यर्थ हुंकार भरते हो क्यूँ
क्यूँ जागते हो मुझको ?


नहीं जानते क्या तुम इतना भी
लहू पीते हैं ये तीर
नहीं रोकते रुकते हैं किसिके
उठ जाते हैं जब मुझसे वीर !


आज अगर मैं चुप शांत खड़ा हूँ
और धरा है मौन
नहीं समझ पाओगे तुम
समझा है अब तक कौन?


सृष्टि के नीयम सिद्धांता
एक शून्य जुड़ा है संग
विस्तार देख चुका हूँ उसका
रह गया हूँ निःशब्द औ' दंग


कुछ करूँ भी तो शून्य है सब
न करूँ भी तो शून
देख सब कुछ सोच रहा हूँ
दिन बिताओं कैसे आखें मून

क्या धेय जीवन का है
जब नहीं है कुछ उस पार ?
जब व्यर्थ है चल अचल औ'
नश्वर सब संसार


क्यूँ नहीं समझता है कोई
बात है गंभीर
कहाँ खोलूँ कुंठित मन को
हृदय दिखाओं चीर




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चक्रेश सिंह

1 comment:

संजय भास्कर said...

कुछ देर से ठहर गया हूँ
गया हूँ चलना भूल
जाने क्या सहता रहा है हृदय
चुभा कौन सा शूल

किस कुरुक्षेत्र का अर्जुन हूँ मैं
लेने हैं किनके प्राण
कौन सी गीता गूँज रही कानों मनी
सिद्ध करना है आखिर कौन सा संधान ?

DHARDAR PANKTIYAA.........

चल दोबारा ज़िन्दगी से प्यार कर

तू किसी शोख़ का सिंगार कर रख भी दे ये ख़ामोशी उतार कर तीरगी ये पल में टूट जायेगी  चल दोबारा ज़िन्दगी से प्यार कर एक ही नहीं कई शिकायतें ...