Posts

Showing posts from April, 2010

‘People’, ‘society’ and ‘need’

‘People’, ‘society’ and ‘need’ were some of the words that I found difficult to spell in my school days. It’s not that these words were long or difficult to memorize, I was rather scared by their mention. I fond myself so weak. Constantly my conscience kept telling me that I was a unique human being with some great qualities but the real word made me feel my limitations and meaninglessness of my qualities. A poet for instance has no place in the corporate world. A human being with no desires, no passions will be left behind in the competitive world outside. A thinker living below poverty line will never be able to emerge as a great leader and reformer. Well exceptions are always there but that’s also not very encouraging. If I am born in India and I do not belong to Gandhi-Nehru family what are my chances to become the Prime Minister of my country some day? Some of you will start counting the names of Manmohan Singh ji, Atal ji etc. Well I leave this question here and move forward. Th…

उलझनें जीवन की

सुलझाने जो बैठा उलझनें जीवन की
उलझता चला गया
जाने कब गांठें पड़ी जीवन की डोर में
जाने कब दोनों सिरे हाथ से छूट गए


चक्रेश

अंत अनंत का है नहीं फिर

अंत अनंत का है नहीं फिर
डगर का मोल क्या
मृतु मुक्ति है नहीं फिर
उमर* का मोल क्या ....................................................0

कारवां मेरा नहीं ये
मैं तो बस एक राहगीर
मैं किसी का हूँ नहीं फिर
सफ़र का मोल क्या .......................................................1

प्रभु के जिसको कहते हैं सब
पास होकर भी दूर है
धर्म मारने के हो काबिल फिर
ज़हर का मोल क्या.........................................................2


गर्भ सागर का गुहर से हो भरा
पल पल उठता तूफ़ान हो
खाली हाथ आये किनारे फिर
लहर का मोल क्या..........................................................3


टप टप टपकती चाँदनी का
'चक्रेश' एक चातक है तू
चाँद अनजान हो यदि फिर
चाक जिगर को मोल क्या...................................................4

चक्रेश चल अब लौट चल
चाह तुझको किसकी यहाँ पर
भीड़ में भी हो तू अकेला फिर
शहर का मोल क्या...........................................................5

अंतिम दिन जीवन के

अंतिम दिन जीवन के यदि ये
पीर हृदय की रह जाए
के दौड़-धूप में बीत गए पल
प्रियतम से कुछ ना कह पाएँ

प्राण कंठ तक आ पहुंचें हों
भाव मुखरित न होते हों
प्यासा हो मन पाने को प्रिय को
बैरी नयन धुंधला जाएँ

शिथिल पड़ता मेरा शरीर हो
धमनियों में हो मद्धम रक्त प्रवाह
और बीते पल एक एक करके
मस्तिष्क पटल परछा जाएँ

चित्त चिता की राह ताकता
मृत सैया पे लेटा हो
आगे बढ़ कर दाग दे कोई
धुवां राख सब हो जाए

अंतिम दिन जीवन के यदि ये
पीर हृदय की रह जाए
के दौड़-धूप में बीत गए पल
प्रियतम से कुछ ना कह पाएँ

Its never easy for me to translate a poem. I give it a shot.
--------------

On the last day of life, if a guilt sets in the heart
All life got lost in senseless race and I couldn't speak my heart to my beloved..

That life is about to leave the body and I am not able able to express myself
In that moment if the eyes wander to catch a glimpse of the beloved and every sight gets blurred..

That the blood flow in the nerves starts to slow down and each and every moment from the past
starts unfurling in the mind...

for all my batchmates @ISM

chalte tehalte kab aa pahuncha tha
main is anjaan se sheher mein
aur hissa ban gaya ek naye caarvan ka

kab shaam dhali naya din aaya
kuch yaad hi nahi

fir safar par chal diye thein
naye raahgeeron ke saath
haste gaate ek naye sheher ki or

kab shaam dhali naya din aaya
kuch yaad hi nahi

ab alvida kehne ka samay aaya hai
kyun lag raha hai ke
kisi se theek se kuch baat bhi na hui

kab shaam dhali naya din aaya
kuch yaad hi nahi

kaise beet gaye ye din raat
hum to dheere dheere chal rahe thein
ye antim padaav kab aaya


kab shaam dhali naya din aaya
kuch yaad hi nahi

haath hilata hun hanskar alvida kehta hun
par hridey ko to bas udaasiyon ne ghera hai
antim padaav par antim bhnet ye tumko saathi
antim kavya ye mera hai

ये जिंदगी by Sanjay Bhaskar

ये जिंदगी भी न जाने कितने मोड़ लेती है
हर मोड़ पर नया सवाल दे देती है
ढूंढते रहते है हम जवाब जिंदगी भर
जवाब मिल जाते है तो
जिंदगी सवाल बदल देती है |




http://sanjaybhaskar.blogspot.com/

सृष्टी एक अनंत रचना

सृष्टी एक अनंत रचना
विधाता की दैवीय रचना

पात्र जिसके तुम हो हम हैं
विवरण में जिसके शब्द कम हैं
विधाता के कर कमलों की महिमा
काल पृष्टों पर अंकित ये रचना

नदी की लय ताल देखो
व्योम वो ये पाताल देखो
जीवन का संचार जिसमे
ऐसी अद्भुत विस्तृत ये रचना

कुछ पन्ने थें अधूरे दिल की किताब के

कुछ पन्ने थें अधूरे दिल की किताब के
कुछ लिखा मिटा गए ये छीटे शराब के

सब-ऐ-फुरकत गुजारी मैकदे में कुछ ऐसे
चर्चे सारी रात चलें उन्ही के शबाब के

सिलवट नहीं चेहरे पर कोई शिकन न थी
रात दाग भी न था हुस्न पर माहताब के

फिर सय्याद दिन का तीर आँखों में चुभ गया
तनहाइयों से घिर गए सिलसिले टूटे खाब के

टुकड़ों से खाबों के कोई शिकवा नहीं लेकिन
चुभने लगे हैं ताने अब जहाँ-ने-खराब के

तारीफ़ करता था शेरों की जो अपने नहीं थें

तारीफ़ करता था शेरों की जो अपने नहीं थें
लिखता था जुमले जो कभी छपने नहीं थें

करता था बागबानी अरमानों के बागों में
लगये वो फूल जो खिजाओं में पनपने नहीं थें

जुदा हुआ मुझसे ज़ालिम साया भी मेरा
मेरे पते के ख़त भी अब मेरे अपने नहीं थें

इन आखों में चुभते हैं हर पल ये तुकडे
टूटे जो पलकों पे, फकत सपने नहीं थें

खूब रोया लिपट कर जिनसे मैं पहरों
होश आया तो जाना वो अपने नहीं थें

एक तस्वीर

एक तस्वीर..
..अनभिज्ञ..
दर्शक की आँखों से
आज्ञाकारी, सुशील पुत्री सी
कलाकार पिता की तुलिका का मान रखती
एक संस्कृति को अपने आप के संजोये
मानो किसी आदेश का पालन करती
या किसी कपिल मुनि के शाप
से पत्थर बनी अहिल्या सी
राम के पद कमलों के स्पर्श की प्रतीक्षा में
सदियों से
चिपकी हुई है इन गुफाओं की पथरीली कठोर छाती पर

My pursuit to know LIFE

Sitting in the side upper birth of a train, I realise how similar is this journey and my journey of life are. For many days I was having some questions about life and I was unable to comprehend the purpose of life. I read Shreemad Bhagwad Geeta but still I could understand very little. If I believed that there was a supreme power called God, and that He created the Universe and life and everything we can perceive or can’t, then also I could not understand His purpose of creating everything. If He is so great He won’t just go on showing off His power just to see His followers, worshippers and to see how a man becomes weak and finally kneels down to Him and asks for help. I found the whole philosophy presented in Bhagwad Geeta lacking one critical point which I give utmost importance and that is PURPOSE. I talked to many wise men, and ended up finding myself even more puzzled. Throughout my life I have believed that a theory, a fact or an answer to a question can be taken as correct if …

आज होठों पे हैं दिलबर अफसाना तेरा

आज होठों पे हैं दिलबर अफसाना तेरा
रुख से पर्दा हटा तू कहता दीवाना तेरा

रात भर जागना, चाँद से बतियाना
फिर वही गीत हंसकर गुनगुनाना तेरा

अकेले में सजना, गज़रे लगाना
आइना देखना, खुद ही शर्माना तेरा

मेरी राह तकना, आने पे कहना
ऐसे आने से बेहतर था न आना तेरा

नाराज़ हो जाना, रूठ जाना मानना
लड़ना झगड़ना फिर मुस्काना तेरा