उलझनें जीवन की

सुलझाने जो बैठा उलझनें जीवन की
उलझता चला गया
जाने कब गांठें पड़ी जीवन की डोर में
जाने कब दोनों सिरे हाथ से छूट गए


चक्रेश

Comments

बहुत खूब, लाजबाब !
psingh said…
bahut sundar bhav badhai
अरुण मिश्र said…
सच कहा आपने और
ख़ूब कहा

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