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Showing posts from May, 2010

Building a new India..India of our dreams

I just finished reading an article by a leading French journalist (based in India), Francois Gautier, India’s self denial. In his article he has praised the tolerance of the Indians and he says that he has noticed a striking similarity in the Indian people, their tolerance. He has praised our nation for it’s glorious past and the ancient wisdom. But according to him (and as it is quite visible today to us too) our people (we Indians) lack a sense of pride and we tend to feel belittled when we compare our country’s present situation with the developed western nations. We have started feeling that the system here is rotten, corrupt and incompetent.
I do not disagree with the author for most of what he has written. I feel he is quite right when he says that Indians keep judging themselves by the western standards and western wisdom. The main reason, as he too points out, is our poverty. We are a poor nation (now don’t tell me that the GDP is 7.4 today), and we feel this is because of our…

जीवन एक कविता ही तो है ....( एक और प्रयास )

(मैंने एक ही कविता को चार अलग अलग तरह से लिखने का प्रयास किया है....)




जीवन एक कविता ही तो है
हूँ किसी पंक्ति का एक शब्द मात्र मैं
इन मात्राओं का उन मात्राओं से मेल है जीवन
कुछ छंदों की लय ताल का खेल है जीवन
मैं न होता पर्याय भी कोई मेरा यदि कविता में होता
तो भी अर्थ कविता का शायद लेश मात्र भी न खोता
पर मैं हूँ इन छंदों में क्यूंकि
उन छंदों में साथी तुम हो
लय ताल कविता की हमसे
फिर क्यूँ आज तुम गुमसुम हो ?
जीवन एक कविता ही तो है

जीवन एक कविता ही तो है
है भावों का एक पावन मेला

कल कल करता निर्मल जल हो
या हो कोयल का मीठा गीत
मंदिर से आता स्वर घंटी का
या हो गीता का चिर संगीत
जीवन एक कविता ही तो है


जीवन एक कविता ही तो है
रंगों छंदों का सुन्दर संगम

भीनी गंध गीली मिट्टी की
हैं खेतों में फसलें लहरातीं
तितलियाँ उड़ती पंक पसार
कैसे कलि कलि मंडरातीं
जीवन एक कविता ही तो है


जीवन एक कविता ही तो है
रिश्ते नातों का ताना बाना

माँ बेटे का प्यार कहीं है
पिता का कहीं है लाड-दुलार
बहन-भाई का एक धागे का रिश्ता
कहीं पति में पत्नी का पूरा संसार
जीवन एक कविता ही तो है

जीवन एक कविता ही तो ह

जीवन एक कविता ही तो है
और हूँ किसी पंक्ति का एक शब्द मात्र मैं
इन मात्राओं का उन मात्राओं से मेल है जीवन
कुछ छंदों की लय ताल का खेल है जीवन
मैं न होता पर्याय भी कोई मेरा यदि कविता में होता
तो भी अर्थ कविता का शायद लेश मात्र भी न खोता
पर मैं हूँ इन छंदों में क्यूंकि
उन छंदों में साथी तुम हो
लय ताल कविता की हमसे
फिर क्यूँ आज तुम गुमसुम हो ?
जीवन एक कविता ही तो है

adhoori kavita

मैंने हर इक पहलू को उलट पलट कर देखा है
जीवन मेरा और कुछ नहीं हाथ की अविरल रेखा है

कौन कहता है समय ये चलता है चलता जाता है
....................kuch samajh nahi aata hai .........hahahahha

NOthiNGneSS

A glass top shinning table in front of me on which my laptop is resting right now and cool air from the new Samsung air conditioner has chilled the air around me. I am sitting on this cosy couch with my legs stretched and I’m looking at the books arranged so well in front of me in those wooden shelves. Yes, this is it! This is the room I always dreamt of. I have seen a life where I used to live with my parents in small rented rooms. I have seen tough days and now we have this big house of our own. What else do I want I have a job in hand, I have graduated from a top engineering institute of India. How do I feel? Do you want to hear? I feel NOTHING. See I didn’t put an exclamatory mark after the one word answer. It’s not that the feeling of nothingness came to me like a sudden shock, but it’s there for a long time now. I live with this feeling and I am now so much accustomed to it that I do not even notice it’s presence. I am with my family today, after such a long time and I do not fe…

क्या देखा है तुमने कभी

शाखों से गिरते पत्तों को क्या देखा है तुमने कभी,
एक गिरता है फिर अक और भी
एकदम वैसे ही...
बारिश में बींगते बच्चों को क्या देखा है तुमने कभी
माँ दौड़ती है उनके पीछे
और भींगती है एकदम वैसे ही
प्याली में राखी चाय को ठंडी होते क्या देखा है तुमने कभी
भाप उठती है और खो जाती है हवा में
एकदम उठते है
मेरी प्याली खाली क्यूँ है अब तक
माँ नहीं दौड़ती मेरे पीछे क्यूँ
क्यूँ बारिश की बूँदें नहीं भिंगोतीं मुझको अब
किस पत्ते के गिरने की राह देख रहा हूँ मैं

एक चलती आकृति

भावनाओं का अनुसरण करती मेरी समझ
आ पहुचती है बार बार इक पड़ाव पे
जहाँ धुंधले आसमान में
एक चलती आकृति
स्वेत साडी में लिपटी ,
आँचल लहराती
जाने कबसे क्या दूंढ रही है
हाथ आगे बड़ा कर चाहता हूँ छूना उसको मैं
चाहता हूँ साथ बिठा कर पूछना,
उसकी अनवरत यायावरी का उद्देश्य
पर न जाने क्यूँ वो दूर भागती है मुझसे
एक शून्य में,
एक अँधेरी काली भयावह गुफा की ओर