Saturday, May 8, 2010

एक चलती आकृति

भावनाओं का अनुसरण करती मेरी समझ
आ पहुचती है बार बार इक पड़ाव पे
जहाँ धुंधले आसमान में
एक चलती आकृति
स्वेत साडी में लिपटी ,
आँचल लहराती
जाने कबसे क्या दूंढ रही है
हाथ आगे बड़ा कर चाहता हूँ छूना उसको मैं
चाहता हूँ साथ बिठा कर पूछना,
उसकी अनवरत यायावरी का उद्देश्य
पर न जाने क्यूँ वो दूर भागती है मुझसे
एक शून्य में,
एक अँधेरी काली भयावह गुफा की ओर

4 comments:

अरुण 'मिसिर' said...

वह हमारी आत्मा है,
हमारा सर्वस्व, हमारी
पूर्ण अभिव्यक्ति है।

बहुत ही मार्मिक रचना

Chakresh Singh said...

bahut bahut dhanyavaad Arun sir aap ka ..kavita padne aur protsaahit karne ke liye

Chakresh Singh said...

bahut bahut dhanyavaad Arun sir aap ka ..kavita padne aur protsaahit karne ke liye

संजय भास्कर said...

काफी सुन्दर शब्दों का प्रयोग किया है आपने अपनी कविताओ में सुन्दर अति सुन्दर

चल दोबारा ज़िन्दगी से प्यार कर

तू किसी शोख़ का सिंगार कर रख भी दे ये ख़ामोशी उतार कर तीरगी ये पल में टूट जायेगी  चल दोबारा ज़िन्दगी से प्यार कर एक ही नहीं कई शिकायतें ...