एक चलती आकृति

भावनाओं का अनुसरण करती मेरी समझ
आ पहुचती है बार बार इक पड़ाव पे
जहाँ धुंधले आसमान में
एक चलती आकृति
स्वेत साडी में लिपटी ,
आँचल लहराती
जाने कबसे क्या दूंढ रही है
हाथ आगे बड़ा कर चाहता हूँ छूना उसको मैं
चाहता हूँ साथ बिठा कर पूछना,
उसकी अनवरत यायावरी का उद्देश्य
पर न जाने क्यूँ वो दूर भागती है मुझसे
एक शून्य में,
एक अँधेरी काली भयावह गुफा की ओर

Comments

अरुण 'मिसिर' said…
वह हमारी आत्मा है,
हमारा सर्वस्व, हमारी
पूर्ण अभिव्यक्ति है।

बहुत ही मार्मिक रचना
Chakresh Singh said…
bahut bahut dhanyavaad Arun sir aap ka ..kavita padne aur protsaahit karne ke liye
Chakresh Singh said…
bahut bahut dhanyavaad Arun sir aap ka ..kavita padne aur protsaahit karne ke liye
काफी सुन्दर शब्दों का प्रयोग किया है आपने अपनी कविताओ में सुन्दर अति सुन्दर

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