Monday, May 31, 2010

जीवन एक कविता ही तो है ....( एक और प्रयास )

(मैंने एक ही कविता को चार अलग अलग तरह से लिखने का प्रयास किया है....)




जीवन एक कविता ही तो है
हूँ किसी पंक्ति का एक शब्द मात्र मैं
इन मात्राओं का उन मात्राओं से मेल है जीवन
कुछ छंदों की लय ताल का खेल है जीवन
मैं न होता पर्याय भी कोई मेरा यदि कविता में होता
तो भी अर्थ कविता का शायद लेश मात्र भी न खोता
पर मैं हूँ इन छंदों में क्यूंकि
उन छंदों में साथी तुम हो
लय ताल कविता की हमसे
फिर क्यूँ आज तुम गुमसुम हो ?
जीवन एक कविता ही तो है

जीवन एक कविता ही तो है
है भावों का एक पावन मेला

कल कल करता निर्मल जल हो
या हो कोयल का मीठा गीत
मंदिर से आता स्वर घंटी का
या हो गीता का चिर संगीत
जीवन एक कविता ही तो है


जीवन एक कविता ही तो है
रंगों छंदों का सुन्दर संगम

भीनी गंध गीली मिट्टी की
हैं खेतों में फसलें लहरातीं
तितलियाँ उड़ती पंक पसार
कैसे कलि कलि मंडरातीं
जीवन एक कविता ही तो है


जीवन एक कविता ही तो है
रिश्ते नातों का ताना बाना

माँ बेटे का प्यार कहीं है
पिता का कहीं है लाड-दुलार
बहन-भाई का एक धागे का रिश्ता
कहीं पति में पत्नी का पूरा संसार
जीवन एक कविता ही तो है

चल दोबारा ज़िन्दगी से प्यार कर

तू किसी शोख़ का सिंगार कर रख भी दे ये ख़ामोशी उतार कर तीरगी ये पल में टूट जायेगी  चल दोबारा ज़िन्दगी से प्यार कर एक ही नहीं कई शिकायतें ...