Monday, September 27, 2010

शाम रिन्दों ने हमको पिलाया बहुत


शाम रिन्दों ने हमको पिलाया बहुत
हौसला टूटे दिल को दिलाया बहुत

हम भी पीते रहे,
घाव सीते रहे
भूल हम ना सके फिर भी उनको कभी
देखो होता है वो
होना होता है जो
मिल ना पाये दो दिल मिलाया बहुत

सजती दुल्धन कहीं
खूबसूरत कोई
जैसे अम्बर से उतरी हो कमसिन परी
आखों में है उसकी
बस मूरत यही
ना टूटे ये मूरत हिलाया बहुत

ऐसे देखो कभी
ऐसा होता है भी
फूल गुलशन में खिलता बिखर जाता है
फिर भी दुखता है मन,
क्यूँ उस फूल प़र
खिल पाया ना जिसको खिलाया बहुत



जाम छलका किये
रात कटती रही
खुद को खोने का हमको गुमाँ हो गया
जाने किस सख्स से
हमने दिल की कही
होश आया जब उसने हिलाया बहुत

शाम रिन्दों ने हमको पिलाया बहुत.....................

2 comments:

lalit said...

nice one Chak,keep it up....

मिसिर said...

अच्छी रचना ,अच्छी तरह लिखी हुई
बहुत बधाई !

चल दोबारा ज़िन्दगी से प्यार कर

तू किसी शोख़ का सिंगार कर रख भी दे ये ख़ामोशी उतार कर तीरगी ये पल में टूट जायेगी  चल दोबारा ज़िन्दगी से प्यार कर एक ही नहीं कई शिकायतें ...