Sunday, October 31, 2010

एक ख़त आखिरी

शबनमी लिबाज में जो आगयी शाम फिर
एक नज़्म लिख चले लो आप के नाम फिर

जो हम बार-बार चाँद देखने लगे
तारों के पार संसार देखने लगे
उफ़! कहाँ रह गया करने को कोई काम फिर

सोचते थें लिख चलें रूह की पुकार को
एक ख़त आखिरी खोये हुए प्यार को
क्या पता हो न हो आपसे कभी सलाम फिर

आप तो सो गए चैन से हम मगर
रात जागते रहे और हो गयी सेहर
चर्चे अपने प्यार के शेहेर में हुये आम फिर


दाग न लग सके आपके दामन पे कहीं
लोग आप को न कहदें हाय! बेवफा कहीं
सोच के ले लिए हमने सब इल्जाम फिर

Saturday, October 30, 2010

हे माँ सरस्वती ज्ञान दे

हे माँ सरस्वती ज्ञान दे
अंतर की निद्रा तोड़ सकूं
तू आज मुझे वरदान दे
चिंता सकल मैं छोड़ सकूं

एक नया उत्साह हो
एक नया उजियाला हो
अपने गीतों से मैं माँ
बिखरे समाज को जोड़ सकूं

भ्रष्ट हुआ संसार ये कह कर
अपना जीवन न बिसराऊँ
औरों से आगे मैं बढ़ कर मैं
ये उलटी धरा मोड़ सकूं

हे माँ सरस्वती ज्ञान दे
वरदान दे

हम को नहीं था ये पता के हम यहाँ मेहमान थें

हम को नहीं था ये पता के हम यहाँ मेहमान थें
सब में रहें कल तक मगर सबसे यहाँ अनजान थें

हमसे सभी कहते रहे करना न तू कभी दिल लगी
रहता मगर कब होश था हम भी बड़े नादान थें

पलकें न भीं/गे यार का दामन सदा महका करे
सबसे अलग हो इक जहाँ अपने अजब अरमान थें

जिनसे कभी कुछ न गिला वो भी रंज जताने लगे
राहें न थीं सीधी कभी हर बात पे फरमान थें


==.=/==.=/==.=
jeena yahan, marna yahan....

Thursday, October 28, 2010

bachpan

बंद वहाँ उस कमरे में भरी दुपहरी मेरा bachpan
हाय! कब तक शाम के इंतज़ार में रह पता
लू क्या होती मैं क्या जानू
डर तो बस दादी की फटकार का रहता था

दूर से आतीं सायें सायें की आवाजें
बागीचे मुझको बुलाते थें
और मैं दबे पाँव
किवाड़ खोल के धीरे से
चौखट तक आ जाता

छज्जे के नीचे,
पकड़ खम्भे को
जैसे मैं ये कहता हूँ -
"थाम ले तू हाथ मेरे नहीं तो मैं भाग जाऊंगा
और शाम फिर फटकार दादी की मजबूरन मैं खाऊंगा"

पर खम्भा जो न सुनता बात मेरी
मैं मन के बहकावे में आये
धीरे धीरे पाँव बड़ा
बागीचे की ओर निकल जाता

मेड़-मेड़ से होते होते खेतों-खेतों
चलता जाता
याद आती फिर कहानी बंसवार में रहने वाली चुडेल की
और मैं सहमा सहमा सा रह जाता
फिर पलट कर धीरे धीरे अपने घर को मैं आता
और धीरे से दादी के बगल में आकर सो जाता

रंज बन के जब धुवाँ आँखों पे यूँ ही छा गया

रंज बन के जब धुवाँ आँखों पे यूँ ही छा गया
तब उसे भी पागलों सा खुद पे हँसना आ गया

हार के रोया न होता दिन सारा पर वो रो पड़ा
खुद खुदा आ ख़्वाबों में सजदा करना सिखा गया

आयतों में पीर कहता तो सही सब बात है
वो यहाँ लगता है लेकिन काफी कुछ छुपा गया

आज तू हँसता क्यूँ काफिर हाल पे उसके बता
सोचता हूँ वो क्या हारा, और तू क्या पा गया ?

तू न समझा उम्र के पहलू कभी ऐ नासमझ
और नासमझी में अपनी तू बस सवाल उठा गया

Tuesday, October 26, 2010

जीवन का ये आजीवन कारावास


जीवन का ये आजीवन कारावास
कैद में जिसकी हैं अंसंख्य,
स्वछन्द विचरने की अभिलाषा लिए
विवशता में बंधी आत्मायें
किसी विधाता की सोच का परिणाम कैसे हो सकता है भला ?
जंगलों में मार कर-छीन कर
एक दूसरों से जुदा रहने वाले जानवरों में रह कर
जब उसने ये समझा होगा
के जरूरी बहुत है
धर्म में बांधना इन स्वार्थी दरिंदों को
तब कहीं जा कर के उसने ये स्वांग रचा होगा
वेद पुराण गीता कुरान का सृजन कर
मोक्ष का लोभ दिया होगा
और तभी से कैद-कैद सी हो पायी
वर्ना तो वीराने होते
खंजर हर सिरहाने होते
जीवन का ये आजीवन कारावास
कैद में जिसकी मैं हूँ तुम हो
दे रहा है रह रह कर
आज न जाने क्यूँ दर्द बड़ा
क्या क्यूँ कौन ये प्रश्नों से मैं आगे
राहो में अकेला यहाँ
सोच रहा हूँ जन्म निरर्थक ही था शायद
मौत के आगे भी कुछ न होगा

Monday, October 25, 2010

उन दिनों तुम न थे


जिन दिनों उम्र पर तन्हाई का बुखार था
टूटता शरीर और ह्रदय तार-तार था
चिलचिलाती धुप में छाँव ढूंढ रहा था मैं
वीरानी पड़ी बस्तियों में गाँव ढूंढ रहा था मैं
मेरे हर इक स्वप्न पर वक़्त का प्रहार था
उन दिनों तुम न थे
उन दिनों तुम न थे

रक्त-लेप भाल पर
मैं समय की ताल पर
गर्त नापता गया
अंतर झाँकता गया
समाज रुष्ट जब हुआ मेरे हर सवाल पर
उन दिनों तुम न थे
उन दिनों तुम न थे

स्वाभिमान हार कर असहाय था जब पड़ा
जागता था रात-रात, शोक था जब बड़ा
साँस-साँस में एक बस ही पुकार थी
हार स्वीकार थी, मौत की गुहार थी
निर्वस्त्र बीच बाज़ार में सर झुका था मैं खड़ा
उन दिनों तुम न थे
हाय! तब तुम न थे

दोष शास्त्र ने मढा जब हाथ की लकीर पर
कुंडली भी हंस पड़ी जब भाग्य के फ़कीर पर
न कोई जब विकल्प था
चला लिए संकल्प था
जब हँसा वो योद्धा मेरे खाली तुनीर पर
हाय! तब तुम न थे
उन दिनों तुम न थे

Wednesday, October 20, 2010

सिन्दूरी आँचल शाम के बादल


सिन्दूरी आँचल शाम के बादल

चंदा का यूँ शर्माना
कितनी मधुर है प्रेम की बेला
कितना मधुर तेरा आना


इन साँसों की तुम सरगम हो
धड़कन की तुम हो शेहनाई
पल भर जो आकर मिलती हो
मिट जाती है सब तन्हाई
क्या मांगे अब वो इश्वर से
सोच में तेरा दीवाना

मन की गलियों में झंकृत हो
बन कर के पायल की धुन
वीणा की जैसे तान कोई हो
मीठा सा इक स्वर रुनझुन
लायी हो इंतना संगीत कहाँ से
मुझको ज़रा ये बतलाना



विधाता की कोई रचना हो तुम
क्या लिखे कहो तुमपे ये कवी
शब्दों में उतारे कोई तुमको
ऐसी कहाँ बोलो है ये छवि
रूप में जल के क्या हाल हुआ है
कैसे कहे ये परवाना





क्या होठों पे तुम रखती हो
हर शब्द कलि बनके ढल्कें
ये नयन दो मद से हैं भरे
मुस्काई जो तुम ये छलकें
सीख भी लो अब रूप पे अपने
थोड़ा  सा तुम इठलाना


सिंदूरी आँचल ....

Monday, October 18, 2010

धूल से ढंकी कुछ किताबें


आज अनायास ही
घर के पीछे वाल कमरे से आलमारी में रखी
छठी की इतिहास की पुस्तक ऊठा लाया |
धूल से ढंके जिल्द पर
मेरे ही नन्हे कांपते हाथों से लिखा था
मेरा ही बचपन का भोला सा नाम |
एक एक कर के पलटता पन्ने और
सोचता के
समय के साथ
हर रिश्ते की ही तरह
किताबों से मेरा रिश्ता भी कितना बदल चला है
वो भोलापन
वो अपनत्व
वो मिठास अब कहाँ इस रिश्ते में भी ?
जीवन की आपाधापी में
जीवन कहाँ पीछे छूट गया
पता भी न चला
इन पीले पड़ते पन्नों में
इतिहास सा विषय
और भी गंभीर सा दिखा मुझे
हर पन्ने पे पुराने समय की एक नयी कहानी
कहानी वो
ज़मींदारों की विवशता के बीच लोभ की
वो किसानों की पीड़ा की
वो बुख्मरी
और
मेनचेस्टर में भारत के कपास की
बंगाल का वो तरसा देने वाला सूखा
पूना में किसानों की हाहाकार की

फिर न जाने कौन था वो
जो खींच ले आया मुझे दो सौ साल पीछे से
और अगले ही पल मैंने खुद को पाया
TV के सामने आज के समाचारों के बीच
सचिन का दुहरा शतक
CWG पर विश्व समूह की भारत को बधाई
और उसमें हुई धांधली पर लीपा पोती
अयोध्या में राम मंदिर बनाने का किसी नेता का वादा

मेरे घर के पीछे वाले कमरे में रखीं हैं
धूल से ढंकी कुछ किताबें

सोचने कब दिया

जिंदगी ने हमे तो था गम सब दिया
हंसाते रहे तुम सोचने कब दिया

हर नए शेर की तुम पहचान हो
शायरी का है तुमने नया ढब दिया

जिस गली में हारे अपनी खुदी
देने वाले ने हमको वहीं रब दिया

आँचल के कोने में लपेटें वो उंगली
कब साँसें रूकीं गिरेह कब दिया

बाग़ का हर फूल मेहरबान तुम्हारा
खिलने का कलि को तुमने सबब दिया

Wednesday, October 13, 2010

Secret of Blissful life..revealed in The Lotus temple, Delhi

Away from home in college and then away from college in the corporate world, I am going through transitions and amidst these transitions I have seen so many different colors of life. There were times when the desire to go on was no longer there. There were times when the heart was broken the belief system fore shaken and energies lost in contemplation. I never knew where was I headed and was sad to know that I was moving without a heading. There were questions that started with words like ‘what if’ and ‘why should I’. I was weak and constantly looking for help. I had friends but I didn’t want to loose them. I was quiet.
Time kept passing at it’s pace patiently and I kept getting weaker and weaker till one day it so happened that I decided to go to The Lotus temple. The one and half hour metro train journey to the Lotus temple from Gurgaon was no different from the life so far. It was painful, it was full of doubts. I kept asking with every time a gush of passengers filled the train at new stations that why did I decide to go to that temple. But just like life, there is no turning back in a metro. I kept quiet. Sometimes the train would go underground and there would be complete darkness and then it would emerge into light. Life and a metro train are the same I guess.
Finally when I reached Lotus temple and walked bare footed on those stairs leading to the temple hall, something just happened and I felt weightless. The mind was thoughtless. The face could once again experience the wind. The eyes could again notice the birds and the ears could once again hear the chirping of birds. Inside the temple I sat on the marble benches and closed my eyes. I did not sleep. I did not try to meditate. I just went thoughtless! I got the answers to my questions in one single moment and since then my life has become blissful and simple.
Now, let me break then suspense and tell you all good people reading this post patiently, the secret that I mentioned in the title: Stop all inner chattering, your conscience will by itself show you the path and without any effort from your side your body will by itself do what it must do (just like the heart beats to keep you alive. Do not interpret the thoughts that come to your mind. Be quiet and believe in this secret of blissful life for some time and feel the change by yourself. Feel your being. Feel your existence.

शाम होते ही तलास-ऐ-आशियाँ होने लगी


शाम होते ही तलास-ऐ-आशियाँ होने लगी

खुद से बातें छोड़ दीं खामोशियाँ होने लगी
दिल की सब बातें नज़र से बयाँ होने लगी

अब नहीं रोके रुके है
आसूवों का सिलसिला
क्या कहें किनसे है शिकवा
और किनसे था गिला
महफ़िल में आम सब बातें-पिन्हाँ होने लगी...१

रोज़ सोचें हम ठहर कर
और आगे अब कहाँ
दैर हमसे दूर है
दर नहीं कोई यहाँ
शाम होते ही तलास-ऐ-आशियाँ होने लगी...२

इक सदी से छाई रही
वीरानी औ खिजा जहाँ
हम वहीं पर चले सजाने
ख़्वाबों का इक बागबाँ
जिंदगी जीने की फिर हसरत जवाँ होने लगी...३

हमको कब मालूम था
के हम अकेले थें खड़े
वो तमाशाई फकत थें
जिनके खातिर हम लड़े
'चक्रेश' जुदा सब अपनी परछाईयाँ होने लगी...४

यूँ तो तनहा ही सफ़र था
था न कोई कारवाँ
हम किनारों पे कहीं थें
और न था कोई वहां
आज क्यूँ हर हमपे नज़र मेहरबाँ होने लगी...6


Ckh.

Monday, October 11, 2010

ये शाम कहीं फिर मुझसे न


ये शाम कहीं फिर मुझसे न
कोई कविता लिखवा जाए
कहीं अनकही बात कोई फिर
इन पन्नो पे न आ जाए

हाथ बाँध दो कोई मेरे
मुझे कहीं और ले जाओ
शोर मचा दो बस्ती में
मौन मुझे बस दे जाओ
मन के गलियारों में फिर से
भूला बचपन न छा जाए

क्यूँ करती हो अट्हास मुझसे
ऐ डूबती किरणों बोलो
उपहासित करते हो क्यूँ मुझको
शब्द माला के वर्णों बोलो
अंतर मन की पीड़ा का
कोई थाह कहीं न पा जाए

न करो बात मुझसे तुम ऐ मन
भावुकता से मैं दूर सही
नहीं चाह मुझको भावों की
चूर ह्रदय सो चूर सही
कहीं कोई स्नेह भाव से
घाओं को न सहला जाए

ह्रदय का मद्धम साँसों का
रुक रुक कर आना जाना
मंद सुरीली पुरवाई का
कानों में कुछ कह जाना
कहीं पल भर का सुख दे कर
मुझको न रुला जाए

चल दोबारा ज़िन्दगी से प्यार कर

तू किसी शोख़ का सिंगार कर रख भी दे ये ख़ामोशी उतार कर तीरगी ये पल में टूट जायेगी  चल दोबारा ज़िन्दगी से प्यार कर एक ही नहीं कई शिकायतें ...