रंज बन के जब धुवाँ आँखों पे यूँ ही छा गया

रंज बन के जब धुवाँ आँखों पे यूँ ही छा गया
तब उसे भी पागलों सा खुद पे हँसना आ गया

हार के रोया न होता दिन सारा पर वो रो पड़ा
खुद खुदा आ ख़्वाबों में सजदा करना सिखा गया

आयतों में पीर कहता तो सही सब बात है
वो यहाँ लगता है लेकिन काफी कुछ छुपा गया

आज तू हँसता क्यूँ काफिर हाल पे उसके बता
सोचता हूँ वो क्या हारा, और तू क्या पा गया ?

तू न समझा उम्र के पहलू कभी ऐ नासमझ
और नासमझी में अपनी तू बस सवाल उठा गया

Comments

POOJA... said…
behad pyaaree rachna... dard ko shabd mil jaye, isase jyada aur kuchh nahi chahiye...

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