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Showing posts from December, 2010

ये शब्द नहीं आईने हैं

शोर
मज़ाक
ठठोल
झूठ
आडम्बर
स्वार्थ
ये शब्द नहीं आईने हैं
ऐ इतिहास पड़ने वालों
अपना इतिहास क्या ये होगा ?

भूख
शोषण
क्रूरता
कमजोरी
धोखा
ये शब्द नहीं आईने हैं
ऐ कविमन कविवर जानो
अगली कविता में क्या होगा ?

अंधी भीड़
हाथ उठाये नाचते लोग
तेज़ रफ़्तार गाड़ियां
पर्दों पर चमचमाते सितारे
जीवन से दूर काल्पनिक एक दुनिया
पैसे की हवस
ज्ञान का इक दो राहे पे
असमंजस में पड़ जाना
दरत हूँ मैं...
हाँ! डरता हूँ मैं
ऐ धरती के प्यारे बच्चों
की अगली मुठ्ठी में क्या होगा ? (*नन्हे मुन्हे बचों तेरी मुठ्ठी में क्या है...)

बड़ा शहर या कारगर
अपनी जरूरतें या आवारा मन
दासत्व स्वीकार कर चुकी
ठंढी पड़ी धमनियां
डरता हूँ
हाँ! डरता हूँ मैं
ऐ प्यारे मेरे लोगों
के आगे न जाने क्या होगा?

मूक
संवेदनहीन
कीड़े
ये शब्द नहीं आईने हैं
ऐ ज़मीन पर रेंगने वाले
तेरा न जानेक या होगा ?

यूँही मुझको चुप रहने की आदत पड़ी पुरानी है

यूँही मुझको चुप रहने की आदत पड़ी पुरानी है
बात बात पे हंस देता हूँ आँखों में तो पानी है

चुन चुन कर के लाया तिनके पिरो पिरो बुनता रिश्ते
अब के मौसम ऐसा लागे दुनिया मेरी लुट जानी है

माँ का आँचल ऐसा छूटा रूठ गयीं मुझसे नींदें
सारा दिन फिर दुनिया-दारी रोज़ी रोटी कमानी है

रुक रुक करके पीछे देखूं आगे की मैं क्या जाऊं
नए साल में कुछ तो होगा, आस वही पुरानी है

शब्दों की इस माला में मेरी कुछ भावों की डोरी है
दर लगता है साथ में मेरे शायद ये जल जानी है

मैं न जाऊं कब डूबेगी मेरे ख्वाबों की कश्ती
गाल हाथ धरे देख रहा हूँ रात बड़ी तूफानी है








Ckh









आप इसे निदा फाजली जी की लिखी " मुह की बात सुने हर कोई दिल के दर्द को जाने कौन .." की धुन गा के देख सकते हैं...बहर में पूरी तरेह से तो नहीं है ...

याद नहीं कुछ याद नहीं

गो धूलि बेला आई कब थी
याद नहीं कुछ याद नहीं
कब जागा था पहली किरण संग
याद नहीं कुछ याद नहीं

अरसा बीता गौरिया संग
मिट्टी से बिनना दाने वाने
बैठ दुपहरी छाँव में तरु की
सुस्ताना चप्पल रख सिरहाने
कब चालीसा गयी थी मन से
याद नहीं कुछ याद नहीं

भोला सा तो था गाँव मेरा
भोले भाले थें लोग सभी
कब ये मौसम ऐसे बिगाड़ा
गैर हुए कब लोग सभी
कब खुल कर थहाके सुने थें
याद नहीं कुछ याद नहीं

बात उसके समझ न आई कभी

इक सहरांव था मेरे सीने में

पड़ी बंजर इक पथरीली ज़मीन थी जज्बातों की

और था सैलाब अश्कों का मेरी आँखों में

जो न छलका इक भी अश्क मेरी पलकों से

क्यूँ न समझा वो मेरी मजबूरी ....

न करता वो मुझको समझने की जो गलती

तो शायद

बात समझ उसको आजाती

जुगनू कब ख़ुशी स मुट्ठी में बंद हुआ करते हैं

हाथ फैलाकर कभी आँख बंद करके देखो तो

वो तो अक्सर हथेलियाँ दूंदते हैं सुस्ताने को ...

वो न समझा मेरी मजबूरी

बात उसके समझ न आई कभी

मई तो जुगनू हूँ

अन्धीरे से है पहचान मेरी

वो खामोखां उजाले करता था

का मिला हूँ मैं उजालों में

बात उसको कोई समझाए ज़रा

क्यूँ भागूं

इक मीठी सी नींद सुला जा
ऐसी के अब ना जाऊं
जिन सपनों का अर्थ नहीं कुछ
उनके पीछे क्यूँ भागूं

इक उम्मीद

मेरी कलम से निकले हर्फ़
तेरे होटों पे जो आयें
इक उम्मीद बंधी दिल में
के शायद अब मैं जी जाऊं

निकलता था कुशाँ से मैं
झुकाकर सर को कुछ ऐसे
के कोई रोककर मुझको
कहीं ये पूछ न बैठे
बताओ नाम क्या और
किधर निकले हो तुम घर से

बड़ी कमजोर तबीयत थी
बड़ा नाजुक था दिल मेरा
मगर कल रात महफ़िल में
जो तुमने गीत मेरे गाये
इक उम्मीद बंधी दिल में
के शायद अब मैं जी जाऊं

और नया भी क्या होगा

नया साल, पुराने ख़त, तेरी यादें

और नया भी क्या होगा
और नया भी क्या होगा

वही ठंढी, फिजा बरहम, वही सौतन, अँधेरी रात

और नया भी क्या होगा
और नया भी क्या होगा

दबी आवाज़ में कहता हूँ
मैं खुद से ही चुप रहने को
मिटा देंगे ये सुनने वाले

और नया भी क्या होगा

दीवाना मैं हूँ ख़्वाबों का
हकीकत में कब रखा कुछ था
वही बातें दुनिया दारी की
वही जिद-ओ-जहद जिन्दा रहने की

और नया भी क्या होगा
और नया भी क्या होगा

चुभा है शूल सीने में मगर तुम मुस्कराते हो

चुभा है शूल सीने में मगर तुम मुस्कराते हो

बड़े नाजुक हैं ये रिश्ते, इन्हें कैसे निभाते हो



कहो न यार ऐसे भी संजीदा तो नहीं थे तुम

हमी से रोज़ की बातें, हमी से बात छुपाते हो



कहाँ ढूँढूं मैं जाकर के तेरे हिस्से की खुशियाँ अब

मरीज़-ऐ-दिल की हालत भी कहाँ खुलकर बताते हो



पहले दरिया किनारे तुम लिखा करते थे ग़ज़लों को

मगर अब वहां बैठे कागज़ की नावें बहाते हो



कभी तुमने न देखा दर मालिक का लड़कपन में

उम्र गुजरी तो याद आया अब मस्जिद रोज़ जाते हो

कभी कोई नही मेरा, कभी कायनात मेरी है

कभी कोई नही मेरा, कभी कायनात मेरी है
अजब हालत हैं अपने , अलग ही बात मेरी है

अजब है खेल ये यारा दो चार मुहरों का
उधर गर शय कहीं तेरी, इधर फिर मात मेरी है

सुबो से शाम तक मैंने फकत मेहमाँ नवाजी की
करूँ अब खुद से कुछ बातें, ये सारी रात मेरी है

सफीनों को समंदर में है इक दिन समां जाना
यहाँ है आज मेरी बारी, बड़ी खुश बारात मेरी है

सऊबत का असर ऐसा हुआ अंदाज़ पर मेरे
हर शख्स कहे शायर, ग़ज़ल हर बात मेरी है

साथ जिनका मिला एक पल के लिए

साथ जिनका मिला एक पल के लिए

दे गए वो निशानियाँ कल के लिए



पास मेरे है तू आज है ye यकीन

ae खुदा शुक्रिया हर कँवल के लिए



यूँ तो तैयार है ताज ख़्वाबों की ईंट पर

मुमताज चाहिए बस इस महल के लिए



हमको कब थी खबर आप यूँ याद आयेंगे

आपका शुक्रिया इस गज़ल के लिए

आज की रात

लिख चल दिल की बात

खुल कर मेरे यार

आज की रात

क्यूँ न खो जाऊं कहीं

श्याही संग

बन कर जज़्बात

आज की रात



ऐसे तो मुझको nahi

होता कभी

आज हुआ जाने क्यूँ

ढल जा शब्दों में

बन कर कोई बात

आज की रात



कलि कलि गाये तेरा

गीत नया

मुस्का कर यार

ले आ

भावों की बारात

आज की रात

भोले लोग

मारो!मारो! नहीं तो काट लेगा
अरे वो सांप है!
जहरीला है काट लेगा!
पताक! चटाक ! धाड़ धुम !
और यूँ
मारा गया एक और सांप...
मेरे शहर के लोगों को
जहर से सख्त नफरत है
और जहरीले जीवों को
फूटी आँख नहीं देखते ये समझदार लोग
बजबजाती भिनभिनाती
गन्दी नालियां
सरकार साफ नहीं करतीं
वरना इस शहर में तो गन्दगी का नामों निशाँ न होता
वो तो ठेकेदार चोर था
और नेता बिमान
वरना सूरत ही कुछ और होती इस शहर की

आज मुझे कुछ याद आई

इक छुई मुई सी नज़्म लिखी
और लिख मैं भूल गया
आज मुझे कुछ याद आई
आज मुझे कुछ याद आई

कुछ था जीवन पर शायद
या प्रेम की थीं कुछ बातें
आंचन रेशम की साडी का
हर डोर जीवन के नाते
आज मुझे कुछ याद आई

डर था उसको गली में बैठे
कुछ आवारा लड़कों का
उसके घर तक जाती वो
सुनसान अँधेरी सडकों का
आज मुझे कुछ याद आई

पैदल पैदल धीरे धीरे
चुप-चाप चली वो जाती थी
कुछ कम कम होने का मुझको
अहसास पल पल कराती थी
आज मुझे कुछ याद आई