Friday, December 31, 2010

ये शब्द नहीं आईने हैं

शोर
मज़ाक
ठठोल
झूठ
आडम्बर
स्वार्थ
ये शब्द नहीं आईने हैं
ऐ इतिहास पड़ने वालों
अपना इतिहास क्या ये होगा ?

भूख
शोषण
क्रूरता
कमजोरी
धोखा
ये शब्द नहीं आईने हैं
ऐ कविमन कविवर जानो
अगली कविता में क्या होगा ?

अंधी भीड़
हाथ उठाये नाचते लोग
तेज़ रफ़्तार गाड़ियां
पर्दों पर चमचमाते सितारे
जीवन से दूर काल्पनिक एक दुनिया
पैसे की हवस
ज्ञान का इक दो राहे पे
असमंजस में पड़ जाना
दरत हूँ मैं...
हाँ! डरता हूँ मैं
ऐ धरती के प्यारे बच्चों
की अगली मुठ्ठी में क्या होगा ? (*नन्हे मुन्हे बचों तेरी मुठ्ठी में क्या है...)

बड़ा शहर या कारगर
अपनी जरूरतें या आवारा मन
दासत्व स्वीकार कर चुकी
ठंढी पड़ी धमनियां
डरता हूँ
हाँ! डरता हूँ मैं
ऐ प्यारे मेरे लोगों
के आगे न जाने क्या होगा?

मूक
संवेदनहीन
कीड़े
ये शब्द नहीं आईने हैं
ऐ ज़मीन पर रेंगने वाले
तेरा न जानेक या होगा ?

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तू किसी शोख़ का सिंगार कर रख भी दे ये ख़ामोशी उतार कर तीरगी ये पल में टूट जायेगी  चल दोबारा ज़िन्दगी से प्यार कर एक ही नहीं कई शिकायतें ...