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Showing posts from 2011

निष्कंटक पथ

निष्कंटक पथ, पुष्प वाटिका ,
ना है ना थी चाह कभी ,
योग का जीवन, तपता तन मन ,
कभी भी रुकती राह नही

अश्रू संचित करते दो नयन ,
नित दिन ताका करते हैं ,
ओस में घुली शीतल किरणों से,
नित दिन माँगा करते,
एक नया दिन उज्वल हिम सा,
जिसमे हो निशा की श्याह नहीं

Sketch - 001

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-Medium: Charcoal-

चुभती हैं मुझे शहर-ऐ-समझदार की बातें

चुभती हैं मुझे शहर-ऐ-समझदार की बातें
दिल ऊब चुका सुन कर बेकार की बातें
कहते हैं के काफी थी मेरे हिस्से की हँसी अब वक़्त है के समझूं  is संसार बातें 
मुझसे जुदा खड़े हैं मुझे सब जानने वाले  इनको न रास आयीं मेरी प्यार की बातें  
मेरे ख्वाब में परी थी, बाहों में फैले बादल कितनी अजीब हैं पर, ये कारोबार की बातें
टुकड़ों में जी रहा हूँ, क्यूँ ज़िन्दगी तुझे कब हो गयीं ज़रूरी, कुछ दो-चार की बातें

नाम ३

तखल्लुस ढूँढने निकला था
फिर शाम, साहिल की गीली रेतों पर
और फिर वही बेनामी लेकर
लौट आया घर को मैं...

नाम २

सोच रहा था के होने वाले बेटे का नाम 'जुनैद सिंह' रखूंगा...

फिर याद आया के मैं तो हिन्दू हूँ ...

नाम १

जाने क्या शिकायत है लहरों को
जाने क्या बेचैनी है
नाम है मेरा मैं थोड़ी हूँ
फिर भी इतनी नाराजी!!!
सौ बार लिखा गीली रेतों पर
सौ बार मिटा कर चली गयीं
शायद इनको साहिलों पर
शोर शराबा पसंद नहीं
मुझको ये सागर कुछ ऐसा,
अनजान दिखाई पड़ता है
जैसे के हो कर भी न हो
होने न होने में
कुछ होने न होने का चक्कर..
मैं न जानूं क्या है पर
अदाज जुदा सा है इसका
सोचता हूँ शायर ही कह दूं
कुछ नाम तो देना होगा आखिर
वर्ना होना न होना सा होगा
कम से कम मेरी दुनिया में..
इसकी शिद्दत में ये लहरें
अपने होने को भूल चुकीं
और बेतुकी बातों से आगे
चलकर जीती जाती हैं
क्यूँ न फिर नाम ये मेरा
बेमतलब बेजान लगे
क्यूँ न मेरे होने को ये
दरकिनार कर के बढ़ आयें ...
और इस सब के होते होते
दूर थका सूरज ठंडा पढ़ सा जाता है
शाम गुलाबी साड़ी में लिपटी
मफलूस आईने के आगे बैठी
नयी दुल्हन सी दिखती है
बादल, हवा, रंगों को लेकर
सजती पल भर के मिलने को मुझसे
पति समंदर की खामोशी पर शर्मिंदा
कुछ मेहमान नवाजी करने को
कुछ परिंदे शाख ढूँढते
फिरते देखा करता हूँ
हर शाम अंधेरों से निकल कर
मैं दिन को देखा करता हूँ
अपने होने न होने पर
लहरों से बातें करता हूँ
और शाम को अपने आगे बिठ…

साहिल मेरी जुबाँ

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साहिल मेरी जुबाँ, दरिया है मेरा दिल
दाइम सुबहो-से-शाम, बहता है मेरा दिल



हर्फ़-ऐ-गुहर अक्सर आते हैं लबों तक यादों की सीपियाँ, रखता है मेरा दिल

मुझसे न पूछिए, सफीनों का डूबना
नाखुदा न जान पाए के क्या है मेरा दिल

उसे आना होगा

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रोज जिसे देखकर जीते आये
वो आज नहीं आया तो दम घुट सा गया
वक्त की चाल बेतुकी सी लगी
हर आह में धुवाँ सुलगने सा लगा
हर सू मेरी आँखें प्यासी ही रहीं
कोई आवाज़ दिल-ओ-जाँ तक उतर न सकी
और नब्ज़ डूबने सी लगी
वो आता होगा..
उसे आना होगा...
वो मेरी जिंदगी का मालिक है
मेरे दिल तक उतरता दरिया-ऐ-हयात
मेरे होने का मतलब उससे
मेरी साँसों का वो ही रखवाला
जुबाँ झूठ का सहारा लेकर
मुझे मुझमें कभी समाँ देगी
मगर मैं आज भी समझता हूँ
उस पर्दा-नशीं से आगे
मेरा कोई वजूद नहीं
असल बात तो बस इतनी सी
के उसकी दो निगाहों में
जल रहे नर्म चरागों का
मैं एक तड़पता दीवाना





फ़क़त उस लौ से मेरा मतलब है
फ़क़त इक बार ही मैं जीने आया
उन नर्म सुर्ख होठों पर
धुवाँ- धुवाँ होने के लिए
अपना वजूद खोने के लिए
वो आजा नहीं आया और... दम, घुट सा गया
उसे आना होगा
मेरी साँसों की रवानी के लिए
मेरी ग़ज़लों की जवानी के लिए
उसे आना होगा
इस तपते रेत के समंदर में
दरिया बनकर
उसे आना होगा
मेरी हर आह की खातिर
मेरे जिस्म में चुभते तन्हाई के काँटों की कसक
भी भुलंद हो के कह रही है यही
उसे आना होगा
उसे आना होगा

वर्त्तमान के आईने में

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वर्त्तमान के आईने में भूत, भविष्य ही देखता है
संवरता है
सजता है
किसी अनजान से मिलने की उत्सुकता लिए
प्रतीक्षा करता है
और समय आने पर
नए नए रूपों में
नए नए चेहरों से मिलता है
पर हर यात्रा के थके राहगीर ही की तरेह
हर नया राही भी अपने हिस्से के वर्त्तमान को झटक कर दूर करने की भूल कर बैठता है
किसी अनजान की चाह में  चलते चले जाता है 
वर्तमान के आईने में
अक्सर चीजें उलटी-पुलटी सी दिखने लगती हैं
थके चहरे अक्सर अपनी सूरत से नफरत कर बैठते हैं
ये भूल ही है शायद
हास्यास्पद भी
और इसीलिए शायद एक विडम्बना भी
झूठ सच के दोगले चेहरे वाली समझ
कई बार एक दोराहे पर लाकर खड़ा कर जाती है मुझको
और सारा दिन हंसने के बाद
रात बैठ कर रोता हूँ
कब जगता हूँ
कब सोता हूँ
गीता के श्लोकों में उलझा,
उलझा हुआ सा होता हूँ
वर्त्तमान के आईने में
एक बिम्भ सा ... एक दूर जाकर बन रहे बिम्भ सा
कुछ देख रहा हूँ
वर्तमान के आईने में आगे देखता हुआ मैं, भूत ही देख रहा हूँ मैं शायद

भूल गए और ...

शाम ढली, आप आए, मुस्कराए और
हाथ मिले, दोस्त बने, गीत गाये और
धूप खिली, राह मिली, रात कटी और
पत्ते हिले, साँस आई, धुंध घटी और
खूब हँसे, नाँच उठे, भूल गए और
आसमाँ में, बादलों में, झूल गए और
प्यास नही, आस नही, चाह नही और
क्लेश नही, शोक नही, आह नही और
नन्हे कदम, नाँच उठे, धूल उठी और
भीनी भीनी, खुशबू में सब भूल गए और ...

बात नज़रों की जुबानी होगी

=.== . /.=.==
बात नज़रों की/ जुबानी होगी,
आपतक कब ये कहानी होगी

जो खुदा आज तलक रूठा है
कोई देवी ही/// मनानी होगी

आरज़ू क्या है न जानूँ मैं भी
दिल तुझी को बतानी होगी

छू गया आप का तस्सवुर जो
अब हँसी भी तो छुपानी होगी,

हाय!!! 'चक्रेश' ये कलम तेरी
जाने किस रोज़ रूमानी होगी

ऐसी कोई शाम नहीं

====/ =./ .=
ऐसी कोई शाम नहीं
जिसपर तेरा नाम नहीं

जाने क्यूँ मदहोश रहूँ
हाथों में तो जाम नहीं

नामाबर तो आते रहें
आते हैं पैगाम नहीं

शाखों को ऐसा झटका
पत्तों को आराम नहीं

चुभता होतो क्यूँ न कहे
ऐ दिल दिल को थाम नहीं

बेमतलब 'चक्रेश' यहाँ
उनको कर बदनाम नहीं

ये कैसा पहिया है जीवन

ये कैसा पहिया है जीवन
जिसको हम अपना कहते हो
वो पास में रहकर भी हमसे
कितना अनजाना होता है

जब बात पुरानी याद आये
और दिल को अपने छू जाए
तो दीवारों पर रखकर के
सर अपना दिल कितना रोता है

हम कौन के सफ़र राही हैं
है कौन सी मंजिल अपनी आखिर
हर राहगुजर पर बैठा पाया
एक नया समझौता है

कोई गैर अगर अपना है यहाँ
तो खैर सफ़र का क्या कहना
हर शख्स मिला अपने जैसा
मेरे सा भार ही ढोता है

दिल की तन्हाई इस कदर क्यूँ है

दिल की तन्हाई इस कदर क्यूँ है
मुझसे बेगाना आज घर क्यूँ है ?

याद आता नही मुझे कुछ भी
जाने भीगी सी ये नज़र क्यूँ है

लौट जाना नसीब है इसका
हो रही बावली लहर क्यूँ है

आसमाँ पूछता सितारों से
उनसे महरूम दोपहर क्यूँ है

Gandhi – A trump card for India

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To India,
The way the world has been and continues to be, it is now very well accepted that History repeats itself. “All the world's a stage, And all the men and women merely players: They have their exits and their entrances” is what Shakespeare said quiet rightly. We have been acting on the stage under the light of the same Sun under which Mahabharata was fought, under the light of which Plassey and Buxar happened. We tend to forget the lessons soon and plunge into the same situations that were there at some point in the past. Nature gave us a volatile memory, and there lies the seed from which the sense of humor of the nature blooms. The current affairs in the Nation and abroad made me trifled and annoyed to foresee the chaos that is inevitable on the soil of my country. From theism to atheism, from Vedanta to antagonism, from physical to meta physical I forced my conscience to travel a long and painful tavern of conflicting ideologies, in my bid to understand my purpose of my…

आप करके हौसला

=.==/=.==/=.==/=.=
आप करके हौसला इक बार आगे तो बढें
जिंदगी इंसान की है डर से इतना क्यूँ डरें

जब जवानी मांगती है बाजुओं में आसमाँ
तो हकीमों की दुकानों में गुलामी क्यूँ करें

आज सीने को जलाती हो अगर हर आह तो
आस कल पर छोड़कर बेनाम ऐसे क्यूँ जियें

धडकनों में जो उबलता हो महाभारत कहीं
तो प्रतिज्ञा करके अर्जुन सी यहाँ आकर लड़ें

वक़्त अपनी मौत का फ़र्मान लेकर आएगा
जब हक़ीकत जानते हैं जीतेजी तब क्यूँ मरें

कुछ असर हो या न हो चक्रेश तेरी बात का
तू चला चल इस शहर में हम गुजारा क्यूँ करें

फिर से दरिया...

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=.=/ .== /.==/===
फिर से दरिया, यहाँ क्यूँ आया है?
छाई शाम है या, ग़मों का साया है?


खुल के लूटा था, जिन हवाओं ने
उनसे पूछो, ज़रा क्या पाया है?

कौन कातिल था, मेरे ख़्वाबों का
क्यूँ फरिश्तों ने, सर झुकाया है?

मैं हंसी मांगता था जिनके लिए
उनको हर साँस, क्यूँ रुलाया है?

सबके हाथों में, क्यूँ यहाँ खंजर
आखिर किसने, इन्हें बनाया है?

Shifting Pain

Lofty dreams and heavy heart

all their laughter kept apart

women 'n men are chasing dreams

some like me are yet to start...



what I see are prison walls

master of puppets n walking dolls

war rooms, meeting rooms, IT hubs

priceless vases in empty halls..



caught in the darkness I fail to see

vision of a man, erect and free

centuries passed ‘n nothing changed

with me still wondering: 'to be or not to be'?

मेरा सपनों सा जीवन

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सुबह-सुबह सोंधी सी खुशबू
दादी के पूजा के घर से
मीठी-मीठी मिश्री जिव्हा पे
हाय! लिए वो मेरा बचपन
ढुलक-ढुलक कर गिरता पड़ता
आँखें मलता बाहर जाता
बाबा की खटिया पे बैठा
बड़ों सा माँ को आवाज़ लगता
'भूखा हूँ कुछ दो खाने को'
घर की बहु मेरी चाची तब
आँचल को सर पर रख कर के
हस्ती हुई द्वार तक आतीं
मुझे बंसवार में रहने वाले
भूतों के किस्से सुनाती
फिर भी जब मैं तकिन न डरता
मेरी माँ तब अन्दर से
डांट भरी आवाज़ लगाती
'पी ले बेटा दूध नहीं तो
मैं कान पकड़ पिलाऊंगी
फिर रोता हुवा न जाना
पापा के चुगली करने को'
मैं झट से एक घूँट में
सारा दूध फिर पी जाता
सफ़ेद मूछ माँ को दिखलाने
रसोईं घर में अन्दर जाता
'राजा बेटा' कहके माँ फिर
अपने कामों में लग जाती
हस्ता-गाता चंचल सा वो
हाय! मेरा सपनों सा जीवन

तुमसे फुर्सत में बात कर लेंगे

तुमसे फुर्सत में बात कर लेंगे
अभी जिंदा हैं तो सो लेने दो
अभी से चाँद को क्यूँ तकते हो
ज़रा शाम भी तो हो लेने दो

अफसुर्दा दिलों को नवा क्या है

अफसुर्दा दिलों को नवा क्या है ?
ज़हर बदलो के दवा क्या है ?

सुवैदा दामन मेरा मगर वाइज़
हुकूमत-ऐ-खुदा को हुआ क्या है ?

जो मैं आखिरी नींद प्यासी सोऊँ
तो उम्र बयाबाँ के सिवा क्या है ?

तमाम शहर से रस्म-ओ-राह नहीं
इक वो रूठें तो गिला क्या है ?

चंद लोगों को जो था अपना माना
सिवाए चोट के हमको मिला क्या है ?

किताब-ऐ-शौख में

किताब-ऐ-शौख में चोट खाना लिखा है
के तंग गलियों से आना-जाना लिखा है



मत पूछिये क्यूँ दैर-ओ-हरम हर सू याँ हैं
हमने अपने हिस्से में सर झुकाना लिखा है

कसाई घर - मेरा दिल

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मेरी निगाहों की कैद से
इक ख्वाब जान छुड़ा के भागा है...
जाने कब जेहन मेरा मुर्गी खाना बना
जाने कब तकदीर ने खंजर थाम लिया

न कहीं तुम्हे कभी भी चक्रेश ही मिलेगा

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ये नमी ही क्या कुछ कम थी
जो रुलाया मुझको ऐसे
इक हंसी मेरे लबों की
क्यूँ तुमको न रास आई .

मैं मुन्तजिर उस शब् का
जो ऐसा मुझे सुलाए
के कातिलों तुम्हे फिर
ता -उम्र नींद ना आये

कभी खार बन के आये
कभी ज़हर ज़िन्दगी का
कहूँ कैसे तुमको अपना
तुम मुझे न जान पाए


इक झूठ मुझको देखर
मेरे हौसले बढाये
फिर हाथ काट करके
मुझे रोकने चले हो

मैं ही बना निशाना
तुम सबके बदगुमाँ का
मैं कबसे सोचता था
मेरा क़त्ल कैसे होगा

न कभी इधर फिर आना
लेकर के चाक दामन
मैं नजर फेर लूँगा
अभी से तुम्हे बता दूँ

न कभी तुमको कोई
अपना कभी कहेगा
न कहीं तुम्हे कभी भी
चक्रेश ही मिलेगा

अधूरापन

तन्हा-तन्हा इस मेले में कब तक यूँही चलना होगा
चल अब चलता हूँ मैं सूरज तुझको भी तो ढलना होगा

तो क्या करिए

कितने ही ख्वाब अधूरे देखे
कितने ही वादे टूट गए
जब खुद से खुद को शिकायत हो
तो झूठी बातें क्या करिए

पुर जोर चली पुरवाई जब
हम तन्हा तन्हा जागे
जब दीवारों से बातें होने लगीं
तो रिश्ते नाते क्या करिए

सब कुछ भुला कर चल दिए

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इक साल बीता और हम
इक नए सफ़र की पुकार पर
फिर से नयी तलाश में
सब कुछ भुला कर चल दिए


कुछ यार छूटे गम हुआ
कुछ ख्वाब टूटे गम हुआ
इक बेतुके से दाव पर
सब कुछ लुटा कर चल दिए




बुन्तर की पुरानी तांत पर
शतरंज की शेह और मात पर
इक ख्वाब बुना इक जंग लड़ी
और गुन गुना कर चल दिए



इक कारवां जो मिल गया
ये सफ़र शुरू हुआ नया
जैकारों के उठते शोर पर
हाँथ उठा कर चल दिए

कभी बादलों में खो गए
कभी घाटियों में सो गए
लहरों की पृष्ठ भूमि पर
लिख कर मिटा कर चल दिए

A myth that lived forever

The greatest fear of the mankind has been the thought that their existence has no meaning and that they might be living a life just like any other form of life in front of them – meaningless and painful. Man, thus, created myths and myths proved to be powerful enough to be able to echo till eternity. He wanted to be fooled. That’s what we have watched in The Prestige. We knowingly choose not to watch too closely. Why could only few people come up with intricacies of nature and its laws? Because, the ability to question the well established beliefs has never been a privilege of the majority. As if by some law of nature, time and again circumstances around a person grow such that he becomes ardent in his perception about life and gets drawn towards free thinking rather than following the crowd. I do not intend to come up with any sort of criticism for those whom I group into ‘the majority’. I have just tried to figure out what we actually are and why do we act in a certain way.



There ar…

आगे बढ़कर देखेंगे

जब जीवन को ललकार दिया तो आगे बढ़कर देखेंगे
बरसों पले पर्वत के नीचे अब ऊपर चढ़कर देखेंगे

इतना न सोचो के देखा सोचा स्वप्न अधूरा रह जाए
कुछ करना है सो करना है जीवन व्यर्थ न पूरा रह जाए
हाँ! होंगे जरूर हमसे ज्यादा अनुभवी जीवन समझने वाले
होंगे मंजिल तक रस्ते चार,और उनपर भी कुछ चलने वाले
जब पाँचवा रास्ता ढूंढ लिया तो उसपर चलकर देखेंगे

निज जीवन से ज्यादा क्या देंगे हम इस महान आवर्तन को
इक विषय चलो हम पीछे छोडें अगले कवियों के दर्शन को
जो खून खौल रहा क्षत्रिय सा, और युद्ध भूमि ललकार रही
तो ऐसे में हमको कायर सा, क्रंदन और भय स्वीकार नहीं
व्यास कथन जो सत्य हुआ तो सब देव उतर कर देखेंगे

मैं क्या लिखूंगा

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मुझे हमनफस अब शायर न कहिये
आँखों के प्यालों को मैं क्या लिखूंगा

घनी शाम जुल्फें घटा या के बादाल
लटों और बालों को मैं क्या लिखूंगा

क्यूँ करिए जमाने में रुसवा हमे अब
लबों और गालों को मैं क्या लिखूंगा

बहुत खुश है मिलकर 'चक्रेश' लेकिन
कदमों के छालों को मैं क्या लिखूंगा

बाबरी

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वो मर मिटें मेरी मजार से उठे सवाल पर
फ़रियाद है के बक्ष दो मुझको मेरे हाल पर

इक चाह थी के चैन से चुप चाप मैं सो जाऊंगा
के रख दिया तकदीर ने थप्पड़ मेरे गाल पर

अपने ही वादों के, कर्ज़दार हो गए

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अपने ही वादों के, कर्ज़दार हो गए

बैठे थें किनारों पे, मजधार हो गए



फसलों के संग आए, खानाबदोश परिंदे

भी

और हमारी मचानों के, दावेदार हो गए



हमने जला डालीं, लिखकर कई गज़लें

वो बेंच राखों को, फनकार हो गए




हम ढूँढते फिरते, खोयी हुई हस्ती

जो भूल गए खुद को, वो पार हो गए



इक दौर गुजरा है, हम थें अजीजों में

इक दौर ये आया, हम लाचार हो गए
Everyone is acting under the influence of same forces. Some accept the flow and go on without attaching any passion to the trajectory and the path of the stream. Some try to defy nature and thus themselves, at some levels, and try to carve separate tracks for themselves. There are few who don't realise that they are flowing

वो लिख जो कहना न आसान हो

वो लिख जो कहना न आसान हो
जो साँसों के ही हो बस दरमियाँ

ऐ दिल जो परदे खिड़कियों से तेरी
ख़्वाबों के झोंकों से रहे हैं लिपट
उनसे छनती किरणों को लिख
तू वो लिख जो कहना न आसान हो

इन किस्सों कसीदों कहकशों में है क्या
ये न होंगे न होंगे इनके निशाँ
तू वो लिख जो कहना न आसान हो

मंजिलों तक पहुंचती रहगुज़र को भी सुन
सांस लेती समंदर की लहेरों को लिख
तू वो लिख जो कहना सा आसान हो

मेरे माजी से जुडी डोरें

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मेरे माजी से जुडी डोरें
मुझे अब वापस बुलातीं हैं....



ये हाल-ऐ-दिल अगर मेरी
यहाँ पर जान लेले तो
मेरे यारों रहम करना
मेरी तुम राख ले कर के
पुराने डाक खाने की
चौखट पर बिछा देना...
किसी कासिद के कदमों संग
किसी ख़त के बहाने मैं
कभी उस चार-दिवारी तक
पहुँच ही जाऊंगा..
जहाँ बैठा मेरा बचपन
फकत इस नाज़ पे दिल के
के गिनना सीख चूका है वो
अब भी अंधेरों में
तारे गिन रहा होगा
जब टूट के डालों से
गिरती होंगी पंखुड़ियां
वो दिल-ओ-दीवार की दस्तख पे
गिनना भूलता होगा
वो दिल-ओ-दीवार की दस्तख पे
नना भूलता होगा

अपने ही वादों के, कर्ज़दार हो गए

अपने ही वादों के क़र्ज़दार हो गए
बैठे थे किनारों पे मझधार हो गए

हम ढूंढ रहे अबतक खोयी हुयी हस्ती
जो भूल गए खुद को वो पार हो गए

मेरी जान लेके देखो

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मेरी जान लेके देखो, मेरा भूत कैसा होगा
मैं अभी से जानता हूँ, वो तुम्हारे जैसा होगा

वही खोखली निगाहें, वही भूख हर अदम सी
वही नामुराद चेहरा, कातिल के जैसा होगा

मेरी बाजुओं में कीलें, सूली पे दिन गिनूंगा
सजदे करेंगे ज़ालिम, इक दिन तो ऐसा होगा

वो न मिलें हम क्या करें

हमने पते पर ख़त लिखा,वो न मिलें हम क्या करें;
उनका नहीं है कुछ पता, ये मंजिलें हम क्या करें...

यहाँ कौन जाने अपने गम,कहने को सब अपने ही हैं;
इक वो नहीं जो दरमियाँ,ये महफिलें हम क्या करें...

वो सच ही कहते होंगे के, मौसम बहारों के हैं ये;
कई फूल बगिया में यहाँ, ये न खिलें हम क्या करें...

कुछ भी नहीं ये कुछ भी नहीं

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कोई होता मुझसे कहने को
के कुछ भी नहीं ये कुछ भी नहीं
अभी और भी मंजिलें बाकी हैं
ये कुछ भी नहीं ये कुछ भी नहीं

हर शाम मैं ढलता सूरज सा
और रात विचरता चंदा संग
कोई साथ तो चलता चार कदम
और हंस कर कहता कुछ भी नहीं

इस पार ह्रदय दुःख पाकर भी
हंस लेता जी भर गा लेता
जो सुनता कोई हर कविता को
और अर्थ पूछता कुछ भी नहीं

मैं पूछ रहा हर चहरे से
चिंता कैसी किसका जीवन ?
एक मौन मिला बस उत्तर में
और कुछ भी नहीं कभी कुछ भी नहीं

इक उम्र पड़ी अभी जीने को
इक उम्र देख कर आया हूँ
बड़ी जोर-जोर से बातें की
और दे मैं सका अभी कुछ भी नहीं

कोलाहल चीत्कार शहर की
door धकेले है मुझको
भाग रहा मैं अपनी छाया से,
ढूंढ रहा मैं कुछ भी नहीं, हाँ कुछ भी नहीं

अखबार बेंच कर आया हूँ

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अखबार बेंच कर आया हूँ
हथियार बेंच कर आया हूँ
आग उबलती खबरों का मैं
बाज़ार बेंच कर आया हूँ




किसने कैसे कितना खाया
किस मंत्री ने कितना पाया
अगले मुख्य चुनावों का मैं
दावेदार बेंच कर आया हूँ




फ़िल्मी जगत की ताज़ी बातें
IPL की जागी रातें
छोटे-बड़े पूंजीपतियों के
कारोबार बेंच कर आया हूँ




गली मुहल्लों के फर्जी कॉलेज
नन्हों को A+ की knowledge
अधनंगी तस्वीरों का मैं
भण्डार बेंच कर आया हूँ




चालीस पन्नों की चालीसा
स्थान सत्य का छोड़ा खाली सा
Real estates, car-agency, flights के
प्रचार बेंच कर आया हूँ

देखेंगे बहारें जाने दो, कब तक रुकते हैं दीवाने

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देखेंगे बहारें जाने दो, कब तक रुकते हैं दीवाने............
कुछ देर यहाँ पर महफ़िल है, फिर तो होने हैं वीराने

हैं शोख नज़र के चर्चे आम, गज़लें सारी हैं साकी पर
साकी ही शायर की पूजा, जब तक खुलते हैं मैखाने

कुछ नाम जो होता तो शायद, बगिया-ऐ-मुहब्बत तक जातें
जिन गुंचा-ओ-फिजा में हीर बसे, वहाँ कौन हमे अब पहचाने?

हमसे है शिकायत यारों को, मिलना-जुलना सब बंद हुआ
कुछ वक़्त ही ऐसा है शायद, कैसा है क्यूँ है रब जाने ....


क्या नहीं खबर हमे ऐ लोगों, जो रात मचाया हंगामा
इक बूँद न पी थी ये कहने को, आये हो हमको समझाने...

वो मैं था

वो मैं था
वो मैं था
जो कहता था उस दिन
के सब कुछ यहाँ का
यहीं पर रहेगा
जो सुनते हो तुम ये
आज मेरी जुबानी
ये कविता कोई और
कल फिर कहेगा

Without any title

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The hardest part in writing this blog post was to decide the topic of it. Having realized that it does not matters, I decided to keep it without any title. There has been a lot of upheaval in my head for about past fifteen years. I could sense one thing very early in my life, and that was: I am all that matters to me. I could see a grand meaninglessness in everything and anything around me. Now, when I have completed my graduation and I am having job, some new dimensions of understanding have come up from within.
Being a good observer of nature and surrounding, I could observe few things more closely and by the grace of God (who in my case is not a Hindu or a Muslim), I could write down some poems which I cherish as my children. There had been questions though, which were disturbing. The questions were mainly about what I was doing and why. Logic is what we run after all the time. The chase can be painful but the fulfillment of it is equally pleasant and rewarding. I ended up with …

होता है जो अच्छे के लिए होता होगा

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होता है जो अच्छे के लिए होता होगा

तो क्या हुआ जो कोई कहीं रोता होगा



दिन के उजालों में हों टूटते जिसके सपने

ख्व़ाब चाँदनी-तले वो सारे संजोता होगा



वो जो बच्चों से दिल का मालिक है

कस्तियाँ कागजों की अब भी डुबोता होगा



भूल जाना कहाँ सीख पाया 'चक्रेश'

पुराने खारों से रूह अब भी चुभोता होगा

मोमिन न मैं फ़िराक न ग़ालिब न मीर हूँ

मोमिन न मैं फ़िराक न ग़ालिब न मीर हूँ
इक आग का गोला हूँ मैं अर्जुन का तीर हूँ

जुज़ नाम बिना काम मैं फिरता हूँ शहर में
बस्ती में बड़ा नाम है दिल का अमीर हूँ

इक लफ्ज़ नहीं बोलता वाइज़ की बात पर
गीता हूँ मैं कुरान हूँ इक जलता शरीर हूँ

तेरा नाम लिख कर मिटाते मिटाते

तेरा नाम लिख कर मिटाते मिटाते
तेरे हर इक ख़त को जलाते जलाते
यूँ लगता है खुद को भुला हम हैं बैठे
तुझे जेहन-ओ-दिल से भुलाते भुलाते

कभी कभी मेरे दिल में ये ख़याल आता है

कभी कभी मेरे दिल में ये ख़याल आता है
के इस एक उम्र के तमाम लम्हे ख़ुशी के हो भी सकते थें
पर ये हो न सका
जिंदगी हर एक राह हर एक मंजिल एक नया सफहा खोलती गयी अलिफ़ लैला की दास्तानों सी
और हर एक हर्फ़ एक नए सफ़र के इशारे लेकर
आता रहा ..... जाता रहा
कभी कभी मेरे दिल में ये ख़याल आता है

मेरी कविताओं

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कभी समय के साथ जो चलकर

भूल गया मैं मुस्काना

मेरी कविताओं फिर तुम भी

धू-धू कर के जल जाना



बहुत देर से चलता आया

बिन सिसकी बिन आहों के

आज अगर मैं फूट के रो दूं

तुम बिलकुल ना घबराना



मैं तो इक चन्दन की लकड़ी

यज्ञ-हवन में जलता हूँ

तुम हर मंत्र के अंतिम स्वाहा पर

बन आहूति जल जाना



द्वेष ना करना पढने वालों से

जो तुम्हे मामूली कहते हैं

बन जीवन का अंतर्नाद तुम

रोम रोम में बस जाना



भूत की खिड़की बंद कर चूका

मैं वर्त्तमान में लिखता हूँ

तुम भविष्य की निधि हो मेरी

आगे चल कर बढ़ जाना



ह्रदय कोशिकाओं में मेरी

शब्द घुल रहें बरसों से

लहू लाल से श्वेत हो चूका

तुमको अब क्या समझाना



अर्थ ढूढने जो मैं निकलूँ

मार्ग सभी थम जाते हैं

दूर दूर तक घास-फूंस है

मृग-तृष्णाओं पे पीछे क्या जाना



नदी के कल कल निर्मल जल सी

बहती रहो रुक जाना ना

झूठ सच यहीं पे रख दो

सागर में जाके मिल जाना

फलसफा

किस गली किस शहर की ख्वाहिश में हम
बिक गए, लुट गए, खो गए क्या पता
क्या था जो रहा रूह के इतना करीब
के खुद से पराये हो गए क्या पता

चल रहे हैं के चलते रहे हैं कदम
रुक के देखा नहीं है हमने कभी
ख्वाब हो या हकीकत एक ही फलसफा
जागते थें हम कब सो गए क्या पता

सुगंध - ३

मैं कब जन्मी थी जीने को,

कब मौत हुई मेरी सोचूँ

मैं तो युग युग से इसी सृष्टि की

एक निरंतर कविता हूँ

कर्म धर्म सुख दुःख की गाथा

बैठ पथिक सुनाता है

मेरी रूचि कब थी इन बातों में

इश्वर के धुन क्यूँ गाता है

जो फूल खिल गया बिन बातों से

उसकी सुगंध की प्यासी मैं

स्वयं पंक्ति जुड़ जाती मुझमें

उसके खिलने की जब सोचूँ

होंठ बंद कर पढ़ लो मुझको

हंस लेना जब उर तक पहुंचूं

यहाँ उतरते शब्दों से मैं

वहां फैलाते मद तक सोचूँ

सुगंध २

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पात पात
पुष्प पुष्प
इक सुगंध उठ रही
शब्द शब्द

सांस सांस
आह है बस वही
स्याह मध्य रात्री
रूप पृष्ठ पर उतर
काव्य काव्य
बन चला
अंश वंश कुछ नहीं

मूक मूक मैं इधर
दहक दहक वो उधर
मचल मचल जल रही
महक महक कह रही

वेद ग्रन्थ
सार सब
धर्म काण्ड
व्यापार सब
झूठ सच खुल रहे
बातचीत कुछ नहीं

थोड़ा धैर धरो कुछ देर सुनो

क्यूँ रूठ गए मेरे यार
थोड़ा धैर धरो कुछ देर सुनो
कुछ बातें हैं दो-चार
थोड़ा धैर धरो कुछ देर सुनो

भोला सा भोला भाला सा
नन्हा सा वो मतवाला सा
खोया बचपन का प्यार
थोड़ा धैर धरो कुछ देर सुनो

देखो तो शायद मिल जाए
अंतर में झांको मुस्काये
हाँ वही वो राज कुमार
थोड़ा धैर धरो कुछ देर सुनो

behane को नदियाँ बहती हैं
सब अपनी अपनी कहती हैं
सुन सको तो सुन लो यार
थोड़ा धैर धरो कुछ देर सुनो

सागर की उमंगें बन जाओ
हंस सको न सको पर मुस्काओ
जीवन बच्चों का व्योपार
थोड़ा धैर धरो कुछ देर सुनो

उठा कलम कविता लिख दो
खोल ह्रदय आखर सरिता लिख दो
मृगनयनी से कर लो आँखें चार
थोड़ा धैर धरो कुछ देर सुनो


बोतल की बूंदों को मतलब को

प्यालों को सब का सब दे दो

दुःख का मत लो भार

थोड़ा धैर धरो कुछ देर सुनो

सुगंध

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प्रथम अनुभूति

-सुगंध-

पथ भ्रांत पथिक पूछ बैठा मुझसे
फिर वही पुराना हास्यास्पद इक सवाल
अपनी हंसी दबाये, उसकी भावना को ध्यान में रख
गंभीर मुद्रा बना एक सोच में डूब गया मैं
और फिर कह दिया कि,
"मुझे नहीं पता"
इन कहाँ से आया, कहाँ चला के प्रश्नों को
एक पोटली में रख कर
मैं बहता आया हूँ जीवन - मरण, जड़- चेतन,भूत भविष्य के इस अविराम बहती रहने वाली गंगा में
ये मान लिया है के कहीं आगे कोई विशाल सागर होगा
जहाँ पोटली लहरों के ठन्डे थपेड़ों से टूट जायेगी
और समय के साथ राख बन चुके सब सवाल
धीरे धीरे ऊपर कि उथल पुथल से कहीं नीचे जाकर
कहाँ से आया, क्यूँ आया, कहाँ चला के हास्यास्पद सवालों पर आंसू बरसाते
समां जायेंगे ज्ञान के अथाह सागर में ....
प्रकृति के रहस्यमय सूत्र सभी
एक एक कर के खुलते जायेगे
सभी सवाल अश्रू संग घुलते जायेंगे
घुलते जायेंगे
घुलते जायेंगे
और फ़ैल जायेगी एक लम्बे चक्र के महान समापन पर
एक दिव्य भीनी सी सुगंध



ckh

रात की चादर ओढ़ खड़ी राहें

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रात की चादर ओढ़ खड़ी राहें
सुस्ताती देखता हूँ
वही चार-छे छोटे-बड़े पेड़ सभी
फूल-पाती देखता हूँ

शेष नहीं अब कुछ,
शून्य हुआ सब कुछ,
शब्द सब मौन धरे हैं
उजियाला फूट रहा,
अन्धकार टूट रहा
नैन अश्रू से भरे हैं
कौन जान पाया भेद, जीवन लहर का
आती जाती देखता हूँ

मीत कई प्रेम नहीं,
भीड़ में भटकता,
चहरे मैं पढ़ रहा हूँ
स्वेत पद्मासिनी आशीष देवें
कविता मैं गढ़ रहा हूँ
क्या जानो अर्थ मैं, पत्थर की मूरत
मुस्काती देखता हूँ

चलो हार जाएँ सवालों से अब हम

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चलो हार जाएँ सवालों से अब हम

के लड़ने से इनके हौसले बढ हैं



जो अपने नहीं थें उनके हुए हम

जो अपने थें उनसे फासले बढ़ हैं



चलो झूठ का इक चोला पहन लें

सच टूटने के सिलसिले बढ़ रहे हैं



कहीं रह ना जाएँ अकेले सफ़र में

यहाँ हर नज़र काफिले बढ़ रहे हैं



.....what it takes to convert a thought to poem is still not known to me...all I know by now, is that there's something in the way you hold your pen....

अपने ही आज दिल में खंजर उतारते हैं

अपने ही आज दिल में खंजर उतारते हैं

बिखरा पड़ा वतन है सब घर सँवारते हैं



रखूँ क्यूँ मुह पे परदे झुका के सर मैं चलूँ क्यूँ

यहाँ लोग संसदों में कुरसी से मारते हैं



किया कुछ तो होगा मैंने सजा कौन देगा लेकिन ,

इतिहास कुल वधू के कपड़े उतारते हैं ..



लो मर गया परिंदा फडफडाता हुआ परों को ,

भूखे खड़े दरिन्दे छूल्हे निहारते हैं

ye mulk lut raha hai hum ghar savarate hain ,

ye mulk lut raha hai hum ghar savarate hain ,
apne hi aaj dil mein khanjar utaarate hain;


rakho kyun muh pe parde jhuka ke sir main chaloon kyun,
yahan log sansadon mein kursi se maarate hain ;

kiya kuch to hoga maine saza kaun dega lekin,
itihaas kul vadhoo ke kapade utaarate hain ;

lo mar gaya parinda phadphadaata huwa paron ko
bhookhe khade darinde choolhe nihaarate hain ;


15th March'2011

कोई काव्य अधूरा रह जाए, ये बात मुझे मंजूर नहीं

कोई काव्य अधूरा रह जाए, ये बात मुझे मंजूर नहीं
इस शोर में मूक मैं हो जाऊं, ऐसा भी तो मजबूर नहीं

कितनी ही बूँदें देखो तो, रेतों में फँसी हैं साहिल की
सब सत्य से अपने वंचित हैं, सागर जबके है दूर नहीं

मेरे रोम रोम झंकृत है, इक संगीत विधाता की रचना
ये कलम आत्मा की वीणा, कोई साज़ कोई संतूर नहीं

antim satya

Ganga-ghat Manikanika par

kab lapate dam leti hain

ek bhuji to raakh bani fir

duji dhoo dhoo karti hain



antim satya yahi jeevan ka

sab raakh raakh ho jaayega

kya lekar tu aaya tha aur

kya lekar tu jaayega ?



rishate naate tere banaye

tune sajaaya ghar sansaar

kinkartavya vimood hua kyun

bhool gaya kya Geeta saar ?



aisa kya tha daav pe tere

jo paason se haar gaya

chausar teri daav bhi tera

kaun tujhe fir maar gaya??



jis din raahi dekh sakega

antar mein sab paa lega

ashroo nahi honge aankhon mein

hans lega tu gaa lega



chalata ja ke chalana jeevan

jeevan ka tu hissa hai

ek adhoori kavita ka tu

chota sa ik kissa hai



jod tod ginati gadna mein

samay vyarth na kar raahi

chalata ja tu aage aage

ginata hai sab eeswar raahi

मेरी परछाइयाँ

मेरी परछाइयाँ
मेरी आवाजें
मेरा वजूद
मेरे किस्से
मेरी बातें
बताओ कब तक मेरे होकर रह पाओगे
बताओ कब तक प्यार मुझे कर पाओगे
मेरे गम
मेरे दर्द
मेरी सोच
मेरी समझ
मेरी रातें
बताओ कब तक साथ मेरे चल पाओगे
बताओ कब किस मोड़ पर मुद जाओगे
हंसू कैसे
कहूं अब क्या
कोई कविता
कोई किस्सा
नहीं हैं कोई गज़लें
बताओ तुम ये खामोशी क्या कभी सुन पाओगे
बिना मेरे कहे कुछ भी क्या तुम समझ सब जाओगे

कभी यूँही किसी मोड़ पर

कभी यूँही किसी मोड़ पर
रुक कर हंस देना फ़कीर
जिंदगी इतनी भी गम जदा तो नहीं
कम नसीबी है लाचारी है
नाउम्मीदी नाकामी है मगर
हार कर रो देना जीने की कोई हसीं अदा तो नहीं

एक चोट

फिर एक शून्य रख गया, जाता पल मेरी हथेली पर

एक सवाल

एक अनुभव

एक व्योम ...

नसों से रिस रिस कर कुछ खून

जमता गया समझ ki सफ़ेद परत पर

और धीरे धीरे

ह्रदय के कोने पथरीले होना शुरू हो गए ........

फिर एक शून्य रख गया,

जाता पल मेरी हथेली पर

एक सोच

एक मौन

एक चोट

जैसे खींच लिया हो झटके से किसीने

कोई बाल त्वचा का

एक tees के बाद सम्भलते रोम में

रह गयी है वेदना ki तरंग कोई

मेरी रुसवाई होने वाली है

मेरी रुसवाई होने वाली है
हर नज़र हुई सवाली है

हो न हो आज ही मरूंगा मैं
ये सिआह रात बड़ी काली है

सब राज़-ओ-परिंदे उड़ गए देखो
पिंजरा-ऐ-दिल अब तो खाली है

वो फिर भी तुहमत लगाता ही गया
मेरा यार अब भी सवाली है

चली है इश्क पर कलम जब भी
'चक्रेस' मुलजिम हुआ बवाली है

जमा मस्जिद

जमा मस्जिद के सामने देखा एक
बूड़े बाबा को ठेले पर बेकरी बिस्किट बनाते हुए
कैसे चुप चाप भीड़ से अनजान बने
उम्र के सभी पड़ाव और उनतक साथ चले अनुभवों को
अपने चहरे की सिलवटों में समेटे
मैदे सूजी घी और चीने से बने चूरे को
अंगीठी में तपा मीठे स्वाद से भरे बिस्किट बनाते हैं ...
रोज़ मर्रा की वही खबरें,
दो - चार आने पर आग उबलते चाँदनी chauk के बाज़ार
और नव जवाने के वही बिगड़े तेवर, आग उबलते सवाल
कैसे इन सब में रह कर
इन सब से दूर यहाँ खुदा के दर पर ही
पा लिए है इन बूड़े बाबा ने
ज़िन्दगी जीने का एक हसीं मकसद
उल्गलिया अंगीठी की राख से भले ही काली हो जाती हैं
मगर हर एक बिस्किट सोने के सिक्कों सा चमकदार बन निकलता है
समय के साथ हिन्दू मुसल्ल्मानों में दरार दे गए सियासत वाले
और उन्छुवा नहीं हूँ मैं shaayad
शायद इस लिए एक बार मस्जिद तक जाती ऊंची सीढ़ियों
से दर gaya tha मैं
पर जाने इन बाबा की आँखों में तैरते जीवन के सभी मंजरों में कहाँ
खुद को देख लिया मैंने...
प्यार से रचे एक एक बिस्किट कह गए मुझसे
खुदा के सभी तलिस्माई किस्से
और मिटा गए ह्रदय की सतेह से सभी निरर्थक रेखाएं

My vision for my nation and its people

I can think of 10 points as of 9th Feb'2011. I know that the points are not new to us, but I feel we are a generation a lot different than that of our forefathers. I have a dying hope to see India as it was (and is) meant to be.

10 point:

1. Agricultural reforms (improvement in farmers' standard of living)

2. Educational reform (let no Indian student look west for higher education)

3. Energy Self Sufficiency (use of wind energy and minimization of power theft)

4. Ecological balance and environment awareness in general public.

5. Internal security (one sixth of India lives in regions having constant conflicts)

6. Women equality

7. Reservation to be on the basis of financial constraints rather than on caste/creed.

8. Politics to be made a desirable profession for those who deserve.

9. Revival of ancient art and culture to save the cultural heritage

10. Reforms in judiciary to make it faster and more efficient.



(above all an understanding of Kartavya in every soul)



Let not just negativity se…

ऐ मेरे दर्द-ऐ सुखन

ऐ मेरे दर्द-ऐ सुखन
तू न बे-बेहर न बेवज़न
एक ही तू है तमाम दुनिया में
जो जानता मेरी साँसों की बेहर
औ मेरे अश्कों का वज़न
ऐ मेरे दर्द-ऐ-सुखन

कई बार समझ की सीमा पर

कई बार समझ की सीमा पर
अवाक खड़ा रह जाता हूँ
देख क्षितिज तक फैले तम को
अघात खड़ा रह जाता हूँ

पीछे की तू तू मैं मैं से आगे
छोड़ वर्त्तमान के कोमल धागे
इधर उधर जो मन भागे
हाथ पकड़ बिठाता हूँ
कई बार समझ की सीमा पर

मन उपवन में फूल फूल
लिपटें संग इनके शूल शूल
बाहर देखूं तो बस धूल धूल 
अंतरमन की नीरसता को
ताक खड़ा रह जाता हूँ
कई बार समझ की सीमा पर

व्योम धरा का विस्तार कहीं
निःसार सगर संसार कहीं
इस भव सागर के पार कहीं
जाना है चलता जाता हूँ
कई बार समझ की सीमा पर

विधि के पहिये खटर-पटर
कर चिंताओं को तितर-बितर
कुछ कहते हैं अंतर में उतर-उतर
हर कविता में खुद को मैं फिर भी,
ठगा हुआ सा पाता हूँ
कई बार समझ की सीमा पर

-ckh

ढाई सौ ग्राम सपने

ढाई सौ ग्राम सपने

आधा दर्जन सवालों के साथ

दीवार पर गड़ी खूँटी से लटका गया था कल

आज जा कर देखा तो

मीठे सपनों में चींटियाँ लगी हुई थीं

और सवालों में घुन |

बड़ी देर से हम लिए हाथ में दिल, जिन्हें ढूँढते थे वो आयें तो ऐसे

बड़ी देर से हम लिए हाथ में दिल, जिन्हें ढूँढते थे वो आयें तो ऐसे

शरमसार होकर निगाहें चुरा लीं, उन्हें हाल-ऐ-दिल अब सुनायें तो कैसे



दुपट्टे के कोने में उनगली लपेटे, गज़रे की खुशबू से भर दीं फिजायें

इज़हार-ऐ-मुहब्बत निगाहों में लेकिन, लरज़ते लबों को शिकायत हो जैसे



नहीं होता दिल पर काबू किसी का, दबे पाँव आकर घर कर गए वो

कोई और चेहरा अब जी को न भाये, कहीं और दिल को लगायें तो कैसे

तो सोचा जाए उनसे मिलने की

जख्म भरे तो सोचा जाए उनसे मिलने की
सांस थमे तो सोचा जाए उनसे मिलने की

धागे सारे रिश्तों के मैं उलझा बैठा हूँ
गाँठ खुले तो सोचा जाए उनसे मिलने की

जीवन रुका पड़ा है कबसे उन्ही सवालों पर
बात बढ़े तो सोचा जाए उनसे मिलने की

अब पालनें बाँझन आंखों के सूने रहते हैं
ख्वाब पले तो सोचा जाए उनसे मिलने की

बगिया सूनी है बिन माली फूल नहीं कोई
कँवल खिले तो सोचा जाए उनसे मिलने की

अब गिरनी है तब गिरनी है

टप टप करके गिरती बूदें
चिटक चिटक झड़ती दीवारें
धूल धूल हुआ हर पर्दा
खोखली पड़ गयीं मीनारें

गाँव की वो मज़ार पुरानी
सदियों से जानी पहचानी
अब गिरनी है तब गिरनी है
दीवारें हैं सब ढेह जानी

हरी काई स्याह हो गयी
गुम्बज़ की वो चमक धो गयी
चौखट पड़ी रह गयी अकेली
मेलों का वो बोझ सह गयी



अब गिरनी है तब गिरनी है
यादें भी हैं सब खो जानी

अपराध बोध

भिखारन रात मांगती रही मेरी आँखों से
एक नए स्वप्न की भीख
मैं अकिंचन पलक बंद कर
दे गया फिर वही दो बूँद अश्रू के

रात चौखट पर भूखी बैठी रही बिलखती
फिर चौकीदार सवेरा लात मार
खदेड़ आया बिचारी को
कहीं किसी और गली में जा भटकने की खातिर...

अपराध बोध रह गया इक मन में
हाथ में लिए निवाला सच का
सोच रहा हूँ कैसे निगलूँ ?

झूट मूठ का कोई सपना
माटी के पुतले सा भी होता
टूट जाए तो भी क्या गम है....

सच,
.....कितना भारी होता है ऐसे
हर रोज़ रात अभागन को
भूखे पेट सुला देना ..........

एक शून्य

फिर एक शून्य रख गया, जाता पल मेरी हथेली पर

एक सवाल

एक अनुभव

एक व्योम ...

नसों से रिस रिस कर कुछ खून

जमता गया समझ ki सफ़ेद परत पर

और धीरे धीरे

ह्रदय के कोने पथरीले होना शुरू हो गए ........

फिर एक शून्य रख गया,

जाता पल मेरी हथेली पर

एक सोच

एक मौन

एक चोट

जैसे खींच लिया हो झटके से किसीने

कोई बाल त्वचा का

एक तीस के बाद सम्भलते रोम में

रह गयी है वेदना ki तरंग कोई

जाने क्या-क्या भुला के बैठें हैं

जाने क्या-क्या भुला के बैठें हैं
घर ख़्वाबों का जला के बैठे हैं

कोई रोता है क्यूँ घर के लुटने पर
लोग यहाँ जिंदगी लुटा के बैठे हैं

रह न जाए इक भी ख्वाब जिन्दा
रात को जेहर पिला के बैठे हैं

खींच ले दिन तू चाँदनी की रिदा
दर्द की गर्म रजाई भरा के बैठे हैं


हौसला है चीखे बिना मर जाने का
अपने मुह को हम दबा के बैठे हैं

सुहाने पल की ढेरों यादें

सुना था जिन दीवारों से चिपककर चलती हैं कुछ पुरानी यादें
और मिलता है जहाँ से मिर्जा असद उल्लाह खाँ 'ग़ालिब' का पता ..
मैं आज उन्ही चूड़ी वालन की गलियों से होकर आया हूँ
लाल किला जामा मस्जिद पुरानी दिल्ली के दिल से चुरा लाया हूँ
पुरे जीवन काल के लिए एक सुहाने पल की ढेरों यादें ....