अब गिरनी है तब गिरनी है

टप टप करके गिरती बूदें
चिटक चिटक झड़ती दीवारें
धूल धूल हुआ हर पर्दा
खोखली पड़ गयीं मीनारें

गाँव की वो मज़ार पुरानी
सदियों से जानी पहचानी
अब गिरनी है तब गिरनी है
दीवारें हैं सब ढेह जानी

हरी काई स्याह हो गयी
गुम्बज़ की वो चमक धो गयी
चौखट पड़ी रह गयी अकेली
मेलों का वो बोझ सह गयी



अब गिरनी है तब गिरनी है
यादें भी हैं सब खो जानी

Comments

nilesh mathur said…
बहुत सुन्दर!
भावपूर्ण रचना अभिव्यक्ति ... आप इतना अच्छा लिखती है.. की पढ़कर मैं भी भावों की दुनिया में खो जाता हूँ .... आभार

Popular posts from this blog

Sochata hun ke wo (Nusrat Fateh Ali Khan) Translation

The Indian Civilization (A Sequel)

KATHPUTALI(Hindi poem)