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Showing posts from February, 2011

antim satya

Ganga-ghat Manikanika par

kab lapate dam leti hain

ek bhuji to raakh bani fir

duji dhoo dhoo karti hain



antim satya yahi jeevan ka

sab raakh raakh ho jaayega

kya lekar tu aaya tha aur

kya lekar tu jaayega ?



rishate naate tere banaye

tune sajaaya ghar sansaar

kinkartavya vimood hua kyun

bhool gaya kya Geeta saar ?



aisa kya tha daav pe tere

jo paason se haar gaya

chausar teri daav bhi tera

kaun tujhe fir maar gaya??



jis din raahi dekh sakega

antar mein sab paa lega

ashroo nahi honge aankhon mein

hans lega tu gaa lega



chalata ja ke chalana jeevan

jeevan ka tu hissa hai

ek adhoori kavita ka tu

chota sa ik kissa hai



jod tod ginati gadna mein

samay vyarth na kar raahi

chalata ja tu aage aage

ginata hai sab eeswar raahi

मेरी परछाइयाँ

मेरी परछाइयाँ
मेरी आवाजें
मेरा वजूद
मेरे किस्से
मेरी बातें
बताओ कब तक मेरे होकर रह पाओगे
बताओ कब तक प्यार मुझे कर पाओगे
मेरे गम
मेरे दर्द
मेरी सोच
मेरी समझ
मेरी रातें
बताओ कब तक साथ मेरे चल पाओगे
बताओ कब किस मोड़ पर मुद जाओगे
हंसू कैसे
कहूं अब क्या
कोई कविता
कोई किस्सा
नहीं हैं कोई गज़लें
बताओ तुम ये खामोशी क्या कभी सुन पाओगे
बिना मेरे कहे कुछ भी क्या तुम समझ सब जाओगे

कभी यूँही किसी मोड़ पर

कभी यूँही किसी मोड़ पर
रुक कर हंस देना फ़कीर
जिंदगी इतनी भी गम जदा तो नहीं
कम नसीबी है लाचारी है
नाउम्मीदी नाकामी है मगर
हार कर रो देना जीने की कोई हसीं अदा तो नहीं

एक चोट

फिर एक शून्य रख गया, जाता पल मेरी हथेली पर

एक सवाल

एक अनुभव

एक व्योम ...

नसों से रिस रिस कर कुछ खून

जमता गया समझ ki सफ़ेद परत पर

और धीरे धीरे

ह्रदय के कोने पथरीले होना शुरू हो गए ........

फिर एक शून्य रख गया,

जाता पल मेरी हथेली पर

एक सोच

एक मौन

एक चोट

जैसे खींच लिया हो झटके से किसीने

कोई बाल त्वचा का

एक tees के बाद सम्भलते रोम में

रह गयी है वेदना ki तरंग कोई

मेरी रुसवाई होने वाली है

मेरी रुसवाई होने वाली है
हर नज़र हुई सवाली है

हो न हो आज ही मरूंगा मैं
ये सिआह रात बड़ी काली है

सब राज़-ओ-परिंदे उड़ गए देखो
पिंजरा-ऐ-दिल अब तो खाली है

वो फिर भी तुहमत लगाता ही गया
मेरा यार अब भी सवाली है

चली है इश्क पर कलम जब भी
'चक्रेस' मुलजिम हुआ बवाली है

जमा मस्जिद

जमा मस्जिद के सामने देखा एक
बूड़े बाबा को ठेले पर बेकरी बिस्किट बनाते हुए
कैसे चुप चाप भीड़ से अनजान बने
उम्र के सभी पड़ाव और उनतक साथ चले अनुभवों को
अपने चहरे की सिलवटों में समेटे
मैदे सूजी घी और चीने से बने चूरे को
अंगीठी में तपा मीठे स्वाद से भरे बिस्किट बनाते हैं ...
रोज़ मर्रा की वही खबरें,
दो - चार आने पर आग उबलते चाँदनी chauk के बाज़ार
और नव जवाने के वही बिगड़े तेवर, आग उबलते सवाल
कैसे इन सब में रह कर
इन सब से दूर यहाँ खुदा के दर पर ही
पा लिए है इन बूड़े बाबा ने
ज़िन्दगी जीने का एक हसीं मकसद
उल्गलिया अंगीठी की राख से भले ही काली हो जाती हैं
मगर हर एक बिस्किट सोने के सिक्कों सा चमकदार बन निकलता है
समय के साथ हिन्दू मुसल्ल्मानों में दरार दे गए सियासत वाले
और उन्छुवा नहीं हूँ मैं shaayad
शायद इस लिए एक बार मस्जिद तक जाती ऊंची सीढ़ियों
से दर gaya tha मैं
पर जाने इन बाबा की आँखों में तैरते जीवन के सभी मंजरों में कहाँ
खुद को देख लिया मैंने...
प्यार से रचे एक एक बिस्किट कह गए मुझसे
खुदा के सभी तलिस्माई किस्से
और मिटा गए ह्रदय की सतेह से सभी निरर्थक रेखाएं

My vision for my nation and its people

I can think of 10 points as of 9th Feb'2011. I know that the points are not new to us, but I feel we are a generation a lot different than that of our forefathers. I have a dying hope to see India as it was (and is) meant to be.

10 point:

1. Agricultural reforms (improvement in farmers' standard of living)

2. Educational reform (let no Indian student look west for higher education)

3. Energy Self Sufficiency (use of wind energy and minimization of power theft)

4. Ecological balance and environment awareness in general public.

5. Internal security (one sixth of India lives in regions having constant conflicts)

6. Women equality

7. Reservation to be on the basis of financial constraints rather than on caste/creed.

8. Politics to be made a desirable profession for those who deserve.

9. Revival of ancient art and culture to save the cultural heritage

10. Reforms in judiciary to make it faster and more efficient.



(above all an understanding of Kartavya in every soul)



Let not just negativity se…

ऐ मेरे दर्द-ऐ सुखन

ऐ मेरे दर्द-ऐ सुखन
तू न बे-बेहर न बेवज़न
एक ही तू है तमाम दुनिया में
जो जानता मेरी साँसों की बेहर
औ मेरे अश्कों का वज़न
ऐ मेरे दर्द-ऐ-सुखन

कई बार समझ की सीमा पर

कई बार समझ की सीमा पर
अवाक खड़ा रह जाता हूँ
देख क्षितिज तक फैले तम को
अघात खड़ा रह जाता हूँ

पीछे की तू तू मैं मैं से आगे
छोड़ वर्त्तमान के कोमल धागे
इधर उधर जो मन भागे
हाथ पकड़ बिठाता हूँ
कई बार समझ की सीमा पर

मन उपवन में फूल फूल
लिपटें संग इनके शूल शूल
बाहर देखूं तो बस धूल धूल 
अंतरमन की नीरसता को
ताक खड़ा रह जाता हूँ
कई बार समझ की सीमा पर

व्योम धरा का विस्तार कहीं
निःसार सगर संसार कहीं
इस भव सागर के पार कहीं
जाना है चलता जाता हूँ
कई बार समझ की सीमा पर

विधि के पहिये खटर-पटर
कर चिंताओं को तितर-बितर
कुछ कहते हैं अंतर में उतर-उतर
हर कविता में खुद को मैं फिर भी,
ठगा हुआ सा पाता हूँ
कई बार समझ की सीमा पर

-ckh