Saturday, February 26, 2011

मेरी परछाइयाँ

मेरी परछाइयाँ
मेरी आवाजें
मेरा वजूद
मेरे किस्से
मेरी बातें
बताओ कब तक मेरे होकर रह पाओगे
बताओ कब तक प्यार मुझे कर पाओगे
मेरे गम
मेरे दर्द
मेरी सोच
मेरी समझ
मेरी रातें
बताओ कब तक साथ मेरे चल पाओगे
बताओ कब किस मोड़ पर मुद जाओगे
हंसू कैसे
कहूं अब क्या
कोई कविता
कोई किस्सा
नहीं हैं कोई गज़लें
बताओ तुम ये खामोशी क्या कभी सुन पाओगे
बिना मेरे कहे कुछ भी क्या तुम समझ सब जाओगे

1 comment:

संजय भास्कर said...

बहुत ही सुंदर .... एक एक पंक्तियों ने मन को छू लिया ...

चल दोबारा ज़िन्दगी से प्यार कर

तू किसी शोख़ का सिंगार कर रख भी दे ये ख़ामोशी उतार कर तीरगी ये पल में टूट जायेगी  चल दोबारा ज़िन्दगी से प्यार कर एक ही नहीं कई शिकायतें ...