Monday, March 28, 2011

सुगंध


प्रथम अनुभूति

-सुगंध-

पथ भ्रांत पथिक पूछ बैठा मुझसे
फिर वही पुराना हास्यास्पद इक सवाल
अपनी हंसी दबाये, उसकी भावना को ध्यान में रख
गंभीर मुद्रा बना एक सोच में डूब गया मैं
और फिर कह दिया कि,
"मुझे नहीं पता"
इन कहाँ से आया, कहाँ चला के प्रश्नों को
एक पोटली में रख कर
मैं बहता आया हूँ जीवन - मरण, जड़- चेतन,भूत भविष्य के इस अविराम बहती रहने वाली गंगा में
ये मान लिया है के कहीं आगे कोई विशाल सागर होगा
जहाँ पोटली लहरों के ठन्डे थपेड़ों से टूट जायेगी
और समय के साथ राख बन चुके सब सवाल
धीरे धीरे ऊपर कि उथल पुथल से कहीं नीचे जाकर
कहाँ से आया, क्यूँ आया, कहाँ चला के हास्यास्पद सवालों पर आंसू बरसाते
समां जायेंगे ज्ञान के अथाह सागर में ....
प्रकृति के रहस्यमय सूत्र सभी
एक एक कर के खुलते जायेगे
सभी सवाल अश्रू संग घुलते जायेंगे
घुलते जायेंगे
घुलते जायेंगे
और फ़ैल जायेगी एक लम्बे चक्र के महान समापन पर
एक दिव्य भीनी सी सुगंध



ckh

Friday, March 25, 2011

रात की चादर ओढ़ खड़ी राहें


रात की चादर ओढ़ खड़ी राहें
सुस्ताती देखता हूँ
वही चार-छे छोटे-बड़े पेड़ सभी
फूल-पाती देखता हूँ

शेष नहीं अब कुछ,
शून्य हुआ सब कुछ,
शब्द सब मौन धरे हैं
उजियाला फूट रहा,
अन्धकार टूट रहा
नैन अश्रू से भरे हैं
कौन जान पाया भेद, जीवन लहर का
आती जाती देखता हूँ

मीत कई प्रेम नहीं,
भीड़ में भटकता,
चहरे मैं पढ़ रहा हूँ
स्वेत पद्मासिनी आशीष देवें
कविता मैं गढ़ रहा हूँ
क्या जानो अर्थ मैं, पत्थर की मूरत
मुस्काती देखता हूँ

Wednesday, March 23, 2011

चलो हार जाएँ सवालों से अब हम


चलो हार जाएँ सवालों से अब हम

के लड़ने से इनके हौसले बढ हैं



जो अपने नहीं थें उनके हुए हम

जो अपने थें उनसे फासले बढ़ हैं



चलो झूठ का इक चोला पहन लें

सच टूटने के सिलसिले बढ़ रहे हैं



कहीं रह ना जाएँ अकेले सफ़र में

यहाँ हर नज़र काफिले बढ़ रहे हैं



.....what it takes to convert a thought to poem is still not known to me...all I know by now, is that there's something in the way you hold your pen....

Saturday, March 19, 2011

अपने ही आज दिल में खंजर उतारते हैं

अपने ही आज दिल में खंजर उतारते हैं

बिखरा पड़ा वतन है सब घर सँवारते हैं



रखूँ क्यूँ मुह पे परदे झुका के सर मैं चलूँ क्यूँ

यहाँ लोग संसदों में कुरसी से मारते हैं



किया कुछ तो होगा मैंने सजा कौन देगा लेकिन ,

इतिहास कुल वधू के कपड़े उतारते हैं ..



लो मर गया परिंदा फडफडाता हुआ परों को ,

भूखे खड़े दरिन्दे छूल्हे निहारते हैं

Tuesday, March 15, 2011

ye mulk lut raha hai hum ghar savarate hain ,

ye mulk lut raha hai hum ghar savarate hain ,
apne hi aaj dil mein khanjar utaarate hain;


rakho kyun muh pe parde jhuka ke sir main chaloon kyun,
yahan log sansadon mein kursi se maarate hain ;

kiya kuch to hoga maine saza kaun dega lekin,
itihaas kul vadhoo ke kapade utaarate hain ;

lo mar gaya parinda phadphadaata huwa paron ko
bhookhe khade darinde choolhe nihaarate hain ;


15th March'2011

Sunday, March 6, 2011

कोई काव्य अधूरा रह जाए, ये बात मुझे मंजूर नहीं

कोई काव्य अधूरा रह जाए, ये बात मुझे मंजूर नहीं
इस शोर में मूक मैं हो जाऊं, ऐसा भी तो मजबूर नहीं

कितनी ही बूँदें देखो तो, रेतों में फँसी हैं साहिल की
सब सत्य से अपने वंचित हैं, सागर जबके है दूर नहीं

मेरे रोम रोम झंकृत है, इक संगीत विधाता की रचना
ये कलम आत्मा की वीणा, कोई साज़ कोई संतूर नहीं

चल दोबारा ज़िन्दगी से प्यार कर

तू किसी शोख़ का सिंगार कर रख भी दे ये ख़ामोशी उतार कर तीरगी ये पल में टूट जायेगी  चल दोबारा ज़िन्दगी से प्यार कर एक ही नहीं कई शिकायतें ...