अपने ही आज दिल में खंजर उतारते हैं

अपने ही आज दिल में खंजर उतारते हैं

बिखरा पड़ा वतन है सब घर सँवारते हैं



रखूँ क्यूँ मुह पे परदे झुका के सर मैं चलूँ क्यूँ

यहाँ लोग संसदों में कुरसी से मारते हैं



किया कुछ तो होगा मैंने सजा कौन देगा लेकिन ,

इतिहास कुल वधू के कपड़े उतारते हैं ..



लो मर गया परिंदा फडफडाता हुआ परों को ,

भूखे खड़े दरिन्दे छूल्हे निहारते हैं

Comments

रंगों का त्यौहार बहुत मुबारक हो आपको और आपके परिवार को|
shephali said…
achi prastuti
satik shabd

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