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Showing posts from April, 2011

मेरी कविताओं

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कभी समय के साथ जो चलकर

भूल गया मैं मुस्काना

मेरी कविताओं फिर तुम भी

धू-धू कर के जल जाना



बहुत देर से चलता आया

बिन सिसकी बिन आहों के

आज अगर मैं फूट के रो दूं

तुम बिलकुल ना घबराना



मैं तो इक चन्दन की लकड़ी

यज्ञ-हवन में जलता हूँ

तुम हर मंत्र के अंतिम स्वाहा पर

बन आहूति जल जाना



द्वेष ना करना पढने वालों से

जो तुम्हे मामूली कहते हैं

बन जीवन का अंतर्नाद तुम

रोम रोम में बस जाना



भूत की खिड़की बंद कर चूका

मैं वर्त्तमान में लिखता हूँ

तुम भविष्य की निधि हो मेरी

आगे चल कर बढ़ जाना



ह्रदय कोशिकाओं में मेरी

शब्द घुल रहें बरसों से

लहू लाल से श्वेत हो चूका

तुमको अब क्या समझाना



अर्थ ढूढने जो मैं निकलूँ

मार्ग सभी थम जाते हैं

दूर दूर तक घास-फूंस है

मृग-तृष्णाओं पे पीछे क्या जाना



नदी के कल कल निर्मल जल सी

बहती रहो रुक जाना ना

झूठ सच यहीं पे रख दो

सागर में जाके मिल जाना

फलसफा

किस गली किस शहर की ख्वाहिश में हम
बिक गए, लुट गए, खो गए क्या पता
क्या था जो रहा रूह के इतना करीब
के खुद से पराये हो गए क्या पता

चल रहे हैं के चलते रहे हैं कदम
रुक के देखा नहीं है हमने कभी
ख्वाब हो या हकीकत एक ही फलसफा
जागते थें हम कब सो गए क्या पता

सुगंध - ३

मैं कब जन्मी थी जीने को,

कब मौत हुई मेरी सोचूँ

मैं तो युग युग से इसी सृष्टि की

एक निरंतर कविता हूँ

कर्म धर्म सुख दुःख की गाथा

बैठ पथिक सुनाता है

मेरी रूचि कब थी इन बातों में

इश्वर के धुन क्यूँ गाता है

जो फूल खिल गया बिन बातों से

उसकी सुगंध की प्यासी मैं

स्वयं पंक्ति जुड़ जाती मुझमें

उसके खिलने की जब सोचूँ

होंठ बंद कर पढ़ लो मुझको

हंस लेना जब उर तक पहुंचूं

यहाँ उतरते शब्दों से मैं

वहां फैलाते मद तक सोचूँ

सुगंध २

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पात पात
पुष्प पुष्प
इक सुगंध उठ रही
शब्द शब्द

सांस सांस
आह है बस वही
स्याह मध्य रात्री
रूप पृष्ठ पर उतर
काव्य काव्य
बन चला
अंश वंश कुछ नहीं

मूक मूक मैं इधर
दहक दहक वो उधर
मचल मचल जल रही
महक महक कह रही

वेद ग्रन्थ
सार सब
धर्म काण्ड
व्यापार सब
झूठ सच खुल रहे
बातचीत कुछ नहीं

थोड़ा धैर धरो कुछ देर सुनो

क्यूँ रूठ गए मेरे यार
थोड़ा धैर धरो कुछ देर सुनो
कुछ बातें हैं दो-चार
थोड़ा धैर धरो कुछ देर सुनो

भोला सा भोला भाला सा
नन्हा सा वो मतवाला सा
खोया बचपन का प्यार
थोड़ा धैर धरो कुछ देर सुनो

देखो तो शायद मिल जाए
अंतर में झांको मुस्काये
हाँ वही वो राज कुमार
थोड़ा धैर धरो कुछ देर सुनो

behane को नदियाँ बहती हैं
सब अपनी अपनी कहती हैं
सुन सको तो सुन लो यार
थोड़ा धैर धरो कुछ देर सुनो

सागर की उमंगें बन जाओ
हंस सको न सको पर मुस्काओ
जीवन बच्चों का व्योपार
थोड़ा धैर धरो कुछ देर सुनो

उठा कलम कविता लिख दो
खोल ह्रदय आखर सरिता लिख दो
मृगनयनी से कर लो आँखें चार
थोड़ा धैर धरो कुछ देर सुनो


बोतल की बूंदों को मतलब को

प्यालों को सब का सब दे दो

दुःख का मत लो भार

थोड़ा धैर धरो कुछ देर सुनो