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Showing posts from June, 2011

मेरी जान लेके देखो

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मेरी जान लेके देखो, मेरा भूत कैसा होगा
मैं अभी से जानता हूँ, वो तुम्हारे जैसा होगा

वही खोखली निगाहें, वही भूख हर अदम सी
वही नामुराद चेहरा, कातिल के जैसा होगा

मेरी बाजुओं में कीलें, सूली पे दिन गिनूंगा
सजदे करेंगे ज़ालिम, इक दिन तो ऐसा होगा

वो न मिलें हम क्या करें

हमने पते पर ख़त लिखा,वो न मिलें हम क्या करें;
उनका नहीं है कुछ पता, ये मंजिलें हम क्या करें...

यहाँ कौन जाने अपने गम,कहने को सब अपने ही हैं;
इक वो नहीं जो दरमियाँ,ये महफिलें हम क्या करें...

वो सच ही कहते होंगे के, मौसम बहारों के हैं ये;
कई फूल बगिया में यहाँ, ये न खिलें हम क्या करें...

कुछ भी नहीं ये कुछ भी नहीं

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कोई होता मुझसे कहने को
के कुछ भी नहीं ये कुछ भी नहीं
अभी और भी मंजिलें बाकी हैं
ये कुछ भी नहीं ये कुछ भी नहीं

हर शाम मैं ढलता सूरज सा
और रात विचरता चंदा संग
कोई साथ तो चलता चार कदम
और हंस कर कहता कुछ भी नहीं

इस पार ह्रदय दुःख पाकर भी
हंस लेता जी भर गा लेता
जो सुनता कोई हर कविता को
और अर्थ पूछता कुछ भी नहीं

मैं पूछ रहा हर चहरे से
चिंता कैसी किसका जीवन ?
एक मौन मिला बस उत्तर में
और कुछ भी नहीं कभी कुछ भी नहीं

इक उम्र पड़ी अभी जीने को
इक उम्र देख कर आया हूँ
बड़ी जोर-जोर से बातें की
और दे मैं सका अभी कुछ भी नहीं

कोलाहल चीत्कार शहर की
door धकेले है मुझको
भाग रहा मैं अपनी छाया से,
ढूंढ रहा मैं कुछ भी नहीं, हाँ कुछ भी नहीं

अखबार बेंच कर आया हूँ

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अखबार बेंच कर आया हूँ
हथियार बेंच कर आया हूँ
आग उबलती खबरों का मैं
बाज़ार बेंच कर आया हूँ




किसने कैसे कितना खाया
किस मंत्री ने कितना पाया
अगले मुख्य चुनावों का मैं
दावेदार बेंच कर आया हूँ




फ़िल्मी जगत की ताज़ी बातें
IPL की जागी रातें
छोटे-बड़े पूंजीपतियों के
कारोबार बेंच कर आया हूँ




गली मुहल्लों के फर्जी कॉलेज
नन्हों को A+ की knowledge
अधनंगी तस्वीरों का मैं
भण्डार बेंच कर आया हूँ




चालीस पन्नों की चालीसा
स्थान सत्य का छोड़ा खाली सा
Real estates, car-agency, flights के
प्रचार बेंच कर आया हूँ

देखेंगे बहारें जाने दो, कब तक रुकते हैं दीवाने

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देखेंगे बहारें जाने दो, कब तक रुकते हैं दीवाने............
कुछ देर यहाँ पर महफ़िल है, फिर तो होने हैं वीराने

हैं शोख नज़र के चर्चे आम, गज़लें सारी हैं साकी पर
साकी ही शायर की पूजा, जब तक खुलते हैं मैखाने

कुछ नाम जो होता तो शायद, बगिया-ऐ-मुहब्बत तक जातें
जिन गुंचा-ओ-फिजा में हीर बसे, वहाँ कौन हमे अब पहचाने?

हमसे है शिकायत यारों को, मिलना-जुलना सब बंद हुआ
कुछ वक़्त ही ऐसा है शायद, कैसा है क्यूँ है रब जाने ....


क्या नहीं खबर हमे ऐ लोगों, जो रात मचाया हंगामा
इक बूँद न पी थी ये कहने को, आये हो हमको समझाने...