वो न मिलें हम क्या करें

हमने पते पर ख़त लिखा,वो न मिलें हम क्या करें;
उनका नहीं है कुछ पता, ये मंजिलें हम क्या करें...

यहाँ कौन जाने अपने गम,कहने को सब अपने ही हैं;
इक वो नहीं जो दरमियाँ,ये महफिलें हम क्या करें...

वो सच ही कहते होंगे के, मौसम बहारों के हैं ये;
कई फूल बगिया में यहाँ, ये न खिलें हम क्या करें...

Comments

आपकी रचना यहां भ्रमण पर है आप भी घूमते हुए आइये स्‍वागत है
http://tetalaa.blogspot.com/
बस इंतज़ार कीजिये ...अच्छी प्रस्तुति
shephali said…
देखा था हमने उनकी आँखों में आंसू का एक कतरा
मेरी नज़र का धोखा था, वो कह गए हम क्या करें

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