Sunday, July 24, 2011

मेरे माजी से जुडी डोरें

मेरे माजी से जुडी डोरें
मुझे अब वापस बुलातीं हैं....



ये हाल-ऐ-दिल अगर मेरी
यहाँ पर जान लेले तो
मेरे यारों रहम करना
मेरी तुम राख ले कर के
पुराने डाक खाने की
चौखट पर बिछा देना...
किसी कासिद के कदमों संग
किसी ख़त के बहाने मैं
कभी उस चार-दिवारी तक
पहुँच ही जाऊंगा..
जहाँ बैठा मेरा बचपन
फकत इस नाज़ पे दिल के
के गिनना सीख चूका है वो
अब भी अंधेरों में
तारे गिन रहा होगा
जब टूट के डालों से
गिरती होंगी पंखुड़ियां
वो दिल-ओ-दीवार की दस्तख पे
गिनना भूलता होगा
वो दिल-ओ-दीवार की दस्तख पे
नना भूलता होगा

1 comment:

kumar said...

kamaal ka likha hai aapne....
dil chhu gayi rachna...

चल दोबारा ज़िन्दगी से प्यार कर

तू किसी शोख़ का सिंगार कर रख भी दे ये ख़ामोशी उतार कर तीरगी ये पल में टूट जायेगी  चल दोबारा ज़िन्दगी से प्यार कर एक ही नहीं कई शिकायतें ...