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Showing posts from September, 2011

कसाई घर - मेरा दिल

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मेरी निगाहों की कैद से
इक ख्वाब जान छुड़ा के भागा है...
जाने कब जेहन मेरा मुर्गी खाना बना
जाने कब तकदीर ने खंजर थाम लिया

न कहीं तुम्हे कभी भी चक्रेश ही मिलेगा

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ये नमी ही क्या कुछ कम थी
जो रुलाया मुझको ऐसे
इक हंसी मेरे लबों की
क्यूँ तुमको न रास आई .

मैं मुन्तजिर उस शब् का
जो ऐसा मुझे सुलाए
के कातिलों तुम्हे फिर
ता -उम्र नींद ना आये

कभी खार बन के आये
कभी ज़हर ज़िन्दगी का
कहूँ कैसे तुमको अपना
तुम मुझे न जान पाए


इक झूठ मुझको देखर
मेरे हौसले बढाये
फिर हाथ काट करके
मुझे रोकने चले हो

मैं ही बना निशाना
तुम सबके बदगुमाँ का
मैं कबसे सोचता था
मेरा क़त्ल कैसे होगा

न कभी इधर फिर आना
लेकर के चाक दामन
मैं नजर फेर लूँगा
अभी से तुम्हे बता दूँ

न कभी तुमको कोई
अपना कभी कहेगा
न कहीं तुम्हे कभी भी
चक्रेश ही मिलेगा

अधूरापन

तन्हा-तन्हा इस मेले में कब तक यूँही चलना होगा
चल अब चलता हूँ मैं सूरज तुझको भी तो ढलना होगा

तो क्या करिए

कितने ही ख्वाब अधूरे देखे
कितने ही वादे टूट गए
जब खुद से खुद को शिकायत हो
तो झूठी बातें क्या करिए

पुर जोर चली पुरवाई जब
हम तन्हा तन्हा जागे
जब दीवारों से बातें होने लगीं
तो रिश्ते नाते क्या करिए

सब कुछ भुला कर चल दिए

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इक साल बीता और हम
इक नए सफ़र की पुकार पर
फिर से नयी तलाश में
सब कुछ भुला कर चल दिए


कुछ यार छूटे गम हुआ
कुछ ख्वाब टूटे गम हुआ
इक बेतुके से दाव पर
सब कुछ लुटा कर चल दिए




बुन्तर की पुरानी तांत पर
शतरंज की शेह और मात पर
इक ख्वाब बुना इक जंग लड़ी
और गुन गुना कर चल दिए



इक कारवां जो मिल गया
ये सफ़र शुरू हुआ नया
जैकारों के उठते शोर पर
हाँथ उठा कर चल दिए

कभी बादलों में खो गए
कभी घाटियों में सो गए
लहरों की पृष्ठ भूमि पर
लिख कर मिटा कर चल दिए

A myth that lived forever

The greatest fear of the mankind has been the thought that their existence has no meaning and that they might be living a life just like any other form of life in front of them – meaningless and painful. Man, thus, created myths and myths proved to be powerful enough to be able to echo till eternity. He wanted to be fooled. That’s what we have watched in The Prestige. We knowingly choose not to watch too closely. Why could only few people come up with intricacies of nature and its laws? Because, the ability to question the well established beliefs has never been a privilege of the majority. As if by some law of nature, time and again circumstances around a person grow such that he becomes ardent in his perception about life and gets drawn towards free thinking rather than following the crowd. I do not intend to come up with any sort of criticism for those whom I group into ‘the majority’. I have just tried to figure out what we actually are and why do we act in a certain way.



There ar…

आगे बढ़कर देखेंगे

जब जीवन को ललकार दिया तो आगे बढ़कर देखेंगे
बरसों पले पर्वत के नीचे अब ऊपर चढ़कर देखेंगे

इतना न सोचो के देखा सोचा स्वप्न अधूरा रह जाए
कुछ करना है सो करना है जीवन व्यर्थ न पूरा रह जाए
हाँ! होंगे जरूर हमसे ज्यादा अनुभवी जीवन समझने वाले
होंगे मंजिल तक रस्ते चार,और उनपर भी कुछ चलने वाले
जब पाँचवा रास्ता ढूंढ लिया तो उसपर चलकर देखेंगे

निज जीवन से ज्यादा क्या देंगे हम इस महान आवर्तन को
इक विषय चलो हम पीछे छोडें अगले कवियों के दर्शन को
जो खून खौल रहा क्षत्रिय सा, और युद्ध भूमि ललकार रही
तो ऐसे में हमको कायर सा, क्रंदन और भय स्वीकार नहीं
व्यास कथन जो सत्य हुआ तो सब देव उतर कर देखेंगे

मैं क्या लिखूंगा

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मुझे हमनफस अब शायर न कहिये
आँखों के प्यालों को मैं क्या लिखूंगा

घनी शाम जुल्फें घटा या के बादाल
लटों और बालों को मैं क्या लिखूंगा

क्यूँ करिए जमाने में रुसवा हमे अब
लबों और गालों को मैं क्या लिखूंगा

बहुत खुश है मिलकर 'चक्रेश' लेकिन
कदमों के छालों को मैं क्या लिखूंगा

बाबरी

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वो मर मिटें मेरी मजार से उठे सवाल पर
फ़रियाद है के बक्ष दो मुझको मेरे हाल पर

इक चाह थी के चैन से चुप चाप मैं सो जाऊंगा
के रख दिया तकदीर ने थप्पड़ मेरे गाल पर