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Showing posts from October, 2011

बात नज़रों की जुबानी होगी

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बात नज़रों की/ जुबानी होगी,
आपतक कब ये कहानी होगी

जो खुदा आज तलक रूठा है
कोई देवी ही/// मनानी होगी

आरज़ू क्या है न जानूँ मैं भी
दिल तुझी को बतानी होगी

छू गया आप का तस्सवुर जो
अब हँसी भी तो छुपानी होगी,

हाय!!! 'चक्रेश' ये कलम तेरी
जाने किस रोज़ रूमानी होगी

ऐसी कोई शाम नहीं

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ऐसी कोई शाम नहीं
जिसपर तेरा नाम नहीं

जाने क्यूँ मदहोश रहूँ
हाथों में तो जाम नहीं

नामाबर तो आते रहें
आते हैं पैगाम नहीं

शाखों को ऐसा झटका
पत्तों को आराम नहीं

चुभता होतो क्यूँ न कहे
ऐ दिल दिल को थाम नहीं

बेमतलब 'चक्रेश' यहाँ
उनको कर बदनाम नहीं

ये कैसा पहिया है जीवन

ये कैसा पहिया है जीवन
जिसको हम अपना कहते हो
वो पास में रहकर भी हमसे
कितना अनजाना होता है

जब बात पुरानी याद आये
और दिल को अपने छू जाए
तो दीवारों पर रखकर के
सर अपना दिल कितना रोता है

हम कौन के सफ़र राही हैं
है कौन सी मंजिल अपनी आखिर
हर राहगुजर पर बैठा पाया
एक नया समझौता है

कोई गैर अगर अपना है यहाँ
तो खैर सफ़र का क्या कहना
हर शख्स मिला अपने जैसा
मेरे सा भार ही ढोता है

दिल की तन्हाई इस कदर क्यूँ है

दिल की तन्हाई इस कदर क्यूँ है
मुझसे बेगाना आज घर क्यूँ है ?

याद आता नही मुझे कुछ भी
जाने भीगी सी ये नज़र क्यूँ है

लौट जाना नसीब है इसका
हो रही बावली लहर क्यूँ है

आसमाँ पूछता सितारों से
उनसे महरूम दोपहर क्यूँ है

Gandhi – A trump card for India

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To India,
The way the world has been and continues to be, it is now very well accepted that History repeats itself. “All the world's a stage, And all the men and women merely players: They have their exits and their entrances” is what Shakespeare said quiet rightly. We have been acting on the stage under the light of the same Sun under which Mahabharata was fought, under the light of which Plassey and Buxar happened. We tend to forget the lessons soon and plunge into the same situations that were there at some point in the past. Nature gave us a volatile memory, and there lies the seed from which the sense of humor of the nature blooms. The current affairs in the Nation and abroad made me trifled and annoyed to foresee the chaos that is inevitable on the soil of my country. From theism to atheism, from Vedanta to antagonism, from physical to meta physical I forced my conscience to travel a long and painful tavern of conflicting ideologies, in my bid to understand my purpose of my…

आप करके हौसला

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आप करके हौसला इक बार आगे तो बढें
जिंदगी इंसान की है डर से इतना क्यूँ डरें

जब जवानी मांगती है बाजुओं में आसमाँ
तो हकीमों की दुकानों में गुलामी क्यूँ करें

आज सीने को जलाती हो अगर हर आह तो
आस कल पर छोड़कर बेनाम ऐसे क्यूँ जियें

धडकनों में जो उबलता हो महाभारत कहीं
तो प्रतिज्ञा करके अर्जुन सी यहाँ आकर लड़ें

वक़्त अपनी मौत का फ़र्मान लेकर आएगा
जब हक़ीकत जानते हैं जीतेजी तब क्यूँ मरें

कुछ असर हो या न हो चक्रेश तेरी बात का
तू चला चल इस शहर में हम गुजारा क्यूँ करें

फिर से दरिया...

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फिर से दरिया, यहाँ क्यूँ आया है?
छाई शाम है या, ग़मों का साया है?


खुल के लूटा था, जिन हवाओं ने
उनसे पूछो, ज़रा क्या पाया है?

कौन कातिल था, मेरे ख़्वाबों का
क्यूँ फरिश्तों ने, सर झुकाया है?

मैं हंसी मांगता था जिनके लिए
उनको हर साँस, क्यूँ रुलाया है?

सबके हाथों में, क्यूँ यहाँ खंजर
आखिर किसने, इन्हें बनाया है?

Shifting Pain

Lofty dreams and heavy heart

all their laughter kept apart

women 'n men are chasing dreams

some like me are yet to start...



what I see are prison walls

master of puppets n walking dolls

war rooms, meeting rooms, IT hubs

priceless vases in empty halls..



caught in the darkness I fail to see

vision of a man, erect and free

centuries passed ‘n nothing changed

with me still wondering: 'to be or not to be'?

मेरा सपनों सा जीवन

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सुबह-सुबह सोंधी सी खुशबू
दादी के पूजा के घर से
मीठी-मीठी मिश्री जिव्हा पे
हाय! लिए वो मेरा बचपन
ढुलक-ढुलक कर गिरता पड़ता
आँखें मलता बाहर जाता
बाबा की खटिया पे बैठा
बड़ों सा माँ को आवाज़ लगता
'भूखा हूँ कुछ दो खाने को'
घर की बहु मेरी चाची तब
आँचल को सर पर रख कर के
हस्ती हुई द्वार तक आतीं
मुझे बंसवार में रहने वाले
भूतों के किस्से सुनाती
फिर भी जब मैं तकिन न डरता
मेरी माँ तब अन्दर से
डांट भरी आवाज़ लगाती
'पी ले बेटा दूध नहीं तो
मैं कान पकड़ पिलाऊंगी
फिर रोता हुवा न जाना
पापा के चुगली करने को'
मैं झट से एक घूँट में
सारा दूध फिर पी जाता
सफ़ेद मूछ माँ को दिखलाने
रसोईं घर में अन्दर जाता
'राजा बेटा' कहके माँ फिर
अपने कामों में लग जाती
हस्ता-गाता चंचल सा वो
हाय! मेरा सपनों सा जीवन

तुमसे फुर्सत में बात कर लेंगे

तुमसे फुर्सत में बात कर लेंगे
अभी जिंदा हैं तो सो लेने दो
अभी से चाँद को क्यूँ तकते हो
ज़रा शाम भी तो हो लेने दो

अफसुर्दा दिलों को नवा क्या है

अफसुर्दा दिलों को नवा क्या है ?
ज़हर बदलो के दवा क्या है ?

सुवैदा दामन मेरा मगर वाइज़
हुकूमत-ऐ-खुदा को हुआ क्या है ?

जो मैं आखिरी नींद प्यासी सोऊँ
तो उम्र बयाबाँ के सिवा क्या है ?

तमाम शहर से रस्म-ओ-राह नहीं
इक वो रूठें तो गिला क्या है ?

चंद लोगों को जो था अपना माना
सिवाए चोट के हमको मिला क्या है ?

किताब-ऐ-शौख में

किताब-ऐ-शौख में चोट खाना लिखा है
के तंग गलियों से आना-जाना लिखा है



मत पूछिये क्यूँ दैर-ओ-हरम हर सू याँ हैं
हमने अपने हिस्से में सर झुकाना लिखा है