Thursday, October 6, 2011

मेरा सपनों सा जीवन





सुबह-सुबह सोंधी सी खुशबू
दादी के पूजा के घर से
मीठी-मीठी मिश्री जिव्हा पे
हाय! लिए वो मेरा बचपन
ढुलक-ढुलक कर गिरता पड़ता
आँखें मलता बाहर जाता
बाबा की खटिया पे बैठा
बड़ों सा माँ को आवाज़ लगता
'भूखा हूँ कुछ दो खाने को'
घर की बहु मेरी चाची तब
आँचल को सर पर रख कर के
हस्ती हुई द्वार तक आतीं
मुझे बंसवार में रहने वाले
भूतों के किस्से सुनाती
फिर भी जब मैं तकिन न डरता
मेरी माँ तब अन्दर से
डांट भरी आवाज़ लगाती
'पी ले बेटा दूध नहीं तो
मैं कान पकड़ पिलाऊंगी
फिर रोता हुवा न जाना
पापा के चुगली करने को'
मैं झट से एक घूँट में
सारा दूध फिर पी जाता
सफ़ेद मूछ माँ को दिखलाने
रसोईं घर में अन्दर जाता
'राजा बेटा' कहके माँ फिर
अपने कामों में लग जाती
हस्ता-गाता चंचल सा वो
हाय! मेरा सपनों सा जीवन

3 comments:

Dev said...

Bahut khoob,
bachpan ki yade taza ho gayi

अरुण कुमार निगम (mitanigoth2.blogspot.com) said...

मूँछे आने के बाद दूध की मूँछे जीवन भर गुदगुदाती रहेंगी.यही है जीवन.सुंदर रचना.

Anonymous said...

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तू किसी शोख़ का सिंगार कर रख भी दे ये ख़ामोशी उतार कर तीरगी ये पल में टूट जायेगी  चल दोबारा ज़िन्दगी से प्यार कर एक ही नहीं कई शिकायतें ...