Monday, November 14, 2011

उसे आना होगा

रोज जिसे देखकर जीते आये

वो आज नहीं आया तो दम घुट सा गया

वक्त की चाल बेतुकी सी लगी

हर आह में धुवाँ सुलगने सा लगा

हर सू मेरी आँखें प्यासी ही रहीं

कोई आवाज़ दिल-ओ-जाँ तक उतर न सकी

और नब्ज़ डूबने सी लगी

वो आता होगा..

उसे आना होगा...

वो मेरी जिंदगी का मालिक है

मेरे दिल तक उतरता दरिया-ऐ-हयात

मेरे होने का मतलब उससे

मेरी साँसों का वो ही रखवाला

जुबाँ झूठ का सहारा लेकर

मुझे मुझमें कभी समाँ देगी

मगर मैं आज भी समझता हूँ

उस पर्दा-नशीं से आगे

मेरा कोई वजूद नहीं

असल बात तो बस इतनी सी

के उसकी दो निगाहों में

जल रहे नर्म चरागों का

मैं एक तड़पता दीवाना






फ़क़त उस लौ से मेरा मतलब है

फ़क़त इक बार ही मैं जीने आया

उन नर्म सुर्ख होठों पर

धुवाँ- धुवाँ होने के लिए

अपना वजूद खोने के लिए

वो आजा नहीं आया और... दम, घुट सा गया

उसे आना होगा

मेरी साँसों की रवानी के लिए

मेरी ग़ज़लों की जवानी के लिए

उसे आना होगा

इस तपते रेत के समंदर में

दरिया बनकर

उसे आना होगा

मेरी हर आह की खातिर

मेरे जिस्म में चुभते तन्हाई के काँटों की कसक

भी भुलंद हो के कह रही है यही

उसे आना होगा

उसे आना होगा

3 comments:

shephali said...

बहुत सुन्दर

Anonymous said...

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Anonymous said...

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