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Showing posts from 2012

ठहरा कहाँ हूँ मैं

ठहरा कहाँ हूँ मैं मौज-ओ- हवा हूँ  मुझे रोज़ मिलती हैं ढेरों विदायें 
हर देश में मेरे अपने कई हैं  मौसम बदलते ही मुझे भूल जायें 
गाँवों की निबिया गुडिया की शादी   शहरों के सर्चस क्या क्या बतायें ?
मंदिर की घंटी गिरिजा का लंगर  मस्जिद की सीड़ी सब याद आयें 
हिन्दू कोई है, कोई है मुसलिम  क्या जाने बुत ये किसने बनायें ?

-ckh

सीधी रेखाएं

एक शतरंज की बिसात 

एक  बहुत ही बड़ी शतरंज की बिसात  इतनी बड़ी और इतने ऊंचे तख़्त पे रखी,  के उसके एक कोने पे खड़ा एक छोटा बच्चा बाकी बाकी बचे तीन कोने देख ही नहीं पाता  अपने असंख्य प्यांदों, हाथी, घोड़े, ऊंटों, वजीरों और राजाओं को कतार में खड़ा देखता रहा  बच्चे ने  का  मन बना लिया और उचक उचक के बिसात देखने लगा  अपनी तरफ के काले लकड़ी के प्यान्दों को धीरे धीरे आगे बढाने लगा 
सामने दूर कहीं - बहुत दूर - बैठा खिलाड़ी अपनी हर चाल पर केवल एक प्यांदा आगे बढाता रहा  बच्चा  ये जानते हुए भी अपने कोने के मुहरों में मग्न रहा  देखते देखते एक सफ़ेद प्यांदा - बहुत बड़ा प्यांदा - बच्चे की काले रंग की सेना के सामने आ खड़ा हुआ 
फिर एक बहुत बड़ा आदमी आया  बच्चा केवल उसके पैर देख पाया  वो आदमी बच्चे की तरफ से खेलने लगा और उसकी सेना को सुरक्षित करने लगा 
बच्चा गुस्से से तमतमा गया  अपने दोनों हाथों की मुठ्ठियाँ कसने लगा  दांत पीसने लगा  और अपने हाथों को बिसात पे ऐसा फेरा के एक झटके में सारे मुहरें ज़मीन पे आ गिरे 
काले-सफ़ेद मुहरे  आठ सफ़ेद प्यांदे  आठ काले प्यांदे  एक ही आकार के प्यांदे  और  उनके साथ बाक…

India – Where are you headed

Mirror mirror on the wall, what thou shall be if the wall hath a fall                 Democracy they say is to the people by the people for the people. We the people of India must take a break from our fast lives and halt for a while just to look back and forward asking few questions. Where are the people who were with us at the start of the walk that we set forward for after the tryst with destiny? Have we not walked these 65 years systematically leaving a lot many brethren behind, limping their way forward seeking help? Trends                 Certain scholars today study intergeneration occupational mobility and try to see how amidst the phenomenal economic growth of our country, things have changed for the newer generations. Are they living in a better or different India? Are their occupations different from their fathers’ and fore-fathers’? Though there is a lack of data also making such studies for the women is difficult as in our society after marriage women start to live with the …

फिर से वही कहानी

ये नया नया तजुर्बाये नयी नयी निशानी मेरी जिंदगी सुनाये फिर से वही कहानी
तन्हाइयों ने घेरा आकर के उसघड़ी में जब ढूढती थी आँखें यारों की निगेहबानी

मैं जानता हूँ इक दिन बदलेंगे सब नज़ारे महफ़िल में जल उठेंगी गज़लें मेरी पुरानी
जिनको नहीं ख़बर थीहालात की शहर के वो पूछते थे मुझसे आँखों में क्यूँ था पानी
उठकर चला था जब मैं दुनिया को ही बदलने उस पलसे ही हुयी हैं गलियाँ सभी बेगानी




के शायद जिंदगी है यही

इश्क ऐ दिल तुझे न रास आएगा  तू फकत धड़कनें सुनाता चल गैर बनते हैं सब रफीक अपने  तू मुसलसल उन्हें भुलाता चल 
माँ के आंसूं जो दर्द देते हों  सिसकियाँ घर की गर न जीने दें  आँख में गर्मिए-लहू हो अगर  ज़िन्दगी जख्म को न सीने दे  ऐ मेरे दिल तो तू ये कर लेना  मुसकरा कर के दर्द भर लेना  दौड़ के छू लेना आसमानों को  सारी कायनात अपनी कर लेना 
पर न रोना एक भी कतरा आंसू  न कहना किसी से क्या गुज़री है  जप्त कर लेना गेम-ऐ-हस्ती  ठोकरों में रख तमाम बातों को  कह देना के जिंदगी हसीं सी है  और इस जैसा कुछ भी तो नहीं 
न कहना ऐ दिल के क्यूँ जिन्दा हो  क्यूँ नहीं खुद से तुम शर्मिंदा हो  न कहना के जला लो तुम अपनी हस्ती  और न देखो ख्वाब जन्नत के  न कहना ऐ दिल किसी से ये  के मैं इतना ज़रूर जानता हूँ अभी  के कहीं किसी छोटे से कस्बे  में  एक खूबसूरत सी नन्ही बच्ची है  जो सुन रही तेरी बातों को  जो तुझे खुदा समझती है  सोच उसपर के क्या गुज़रेगी वो जो नेहर को नदी समझती है  उसकी कागजा की नावें डूब जायेंगी  और वो फिर कभी न नांव बनाएगी  जब पतझड़ में सब फूल मुर्झा जायेंगे  वो सावन से रूठ जायेगी  उसकी तब आस छूट जायेगी  …

सहस्त्र अनुभूतियाँ

मैं धीरे धीरे पंख फैलाने लगा मैं आज़ाद हूँ  मैं आज़ाद हूँ  अब फिर से कई बरसों के बाद 
न चाह है के कुछ कहूं - कुछ सोचूँ  न सवाल हैं, न दुःख,  न दर्द  न रही चाह दूर टहलते जाने की दूर अपने सच से कहीं दूर निकल जाने की न चाह रही किसी और से सहमति पाने की सामंजस्य बनाने की
मैं आज़ाद हूँ  अब फिर से कई बरसों के बाद
शांत हूँ, मौन हूँ, खुश हूँ  मैं - मैं में पूरा हूँ  अब मैं अधूरा नहीं 
मुझसे जानना चाहोगे के जिंदगी क्या है ? तुम यहाँ क्यूँ और तुम क्या हो ? 
मैं जानता हूँ तुम नहीं मानोगे  पर मैं बतलाता हूँ  तुम मैं हो  मैं तुम हूँ  यहाँ कुछ भी दो नहीं  केवल एक है 
एक शून्य, एक व्योम, एक दूर तक फैला विस्तृत आकाश
नहीं मानते हो न ? मैं जानता हूँ तुम नहीं मानोगे 
तुम लड़ोगे हर तर्क-वितर्क से  बुद्धि तुम्हे सोचने नहीं देगी  तुम नहीं मानोगे

मैं आज़ाद हूँ  मैं देखता हूँ  एक बाज़ार - दुकानदारों का, खरीदारों  को और भिखारियों का  राजाओं का, रंकों का, सेनापतियों और संतरियों का  खबरों का, चर्चाओं का, सोच का विचार का  एक जंग - अहम् की, एहंकार की, द्वेष की, अपनी - पराई एक निरंतर गोल गोल घूमता पहिया  कोल्हू का…

भागते भागते भागते भागते भागते भागते

जागते जीवन का एक एक पल भागते भागते भागते भागते भागते भागते बीत रहा है
अंतिम घड़ी ये दौड़ तड़पायेगी मैं जानता हूँ

ये सवाल उठाएगी
के क्यूँ भागे

क्यूँ नहीं किसी पहाड़ी पर खड़े होकर
नीचे बहती नदी में कंकड़ फेंकते हुए जिंदगी बिताई

क्यूँ नहीं सागर किनार हर शाम डूबते सूरज
के रंगों से आँखों को जी भर रंग जाने दिया

क्यूँ न शोर से दूर कहीं अकेले निकल सके
इक भागा दौड़ी का हिस्सा तुम क्यूँ बने कहो

मैं जानता हूँ ये दौड़ सवाल उठाएगी
और मैं इतना ही कह सकूंगा के
-
जीवन की आप धापी में कब वक़्त मिला कुछ देर कहीं पर बैठ कभी यह सोच सकूं जो किया कहा माना उसमे क्या बुरा भला

मृत्यु

टूट गयी जीवन की डोरी  मेरे प्रिय एक साथी की मैं प्रतिमा बनकर के देखूं सीमाएं मानव जाती की

एक लैंप पोस्ट दबी ज़ुबान में

सर्द रात सुनसान सड़क पर
घनघोर अंधेरों की थी जब चादर
एक लैंप पोस्ट दबी ज़ुबान में 
अपना अस्तित्व बताता था 

पूर्वा के ठन्डे थप्पड़ से
जब मुरझाईं कलियाँ कपास की 
खेतों में जब मातम था तब
एक लैंप पोस्ट दबी ज़ुबान में 
अपना कुछ दर्द सुनाता था

गाँव को जाती सूनी सड़कों पर
कुछ छीटे थे लाल खून के 
किसी किसान की मजबूरी पर
एक लैंप पोस्ट दबी ज़ुबान में 
कुछ कह कर के चुप हो जाता था

-ckh

मेरी सूरत मेरी तस्वीर में पहले सी क्या होगी

मेरी सूरत मेरी तस्वीर में पहले सी क्या होगी 
दीवारें नम रहीं बरसों तो क्यूँ ना ग़म-ज़दा होगी 

बेहकता है बेहकने दे उदू को कुछ शिकायत है 
जो रोकूँ गर मैं पीने से तो ये भी तो खता होगी 

अभी उस शख्स की यादों को मेरे दिल मुल्तवी कर दे
अगर खूरेज़ हुआ फिर से तो तेरी क्या दावा होगी 

तेरे दर से चला था सोच कर के भूल जाऊंगा
नहीं सोचा था शिकायत भी तुझे से बारहा होगी

चलूँ पीछे मैं राहों पे इसी उम्मीद में "चक्रेश"
कहीं बैठी मेरी किस्मत मुझी से कुछ खफा होगी

-ckh

(not in meter)

आइये, बैठिये, कुछ बात करें

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आइये, बैठिये, कुछ बात करें| 
अक्सर जीवन में ऐसा भी होता के चलते-चलते हम कुछ ऐसे पडावों पे आ पहुंचाते हैं जहाँ कुछ कहना भी दुश्वार सा हो जाता है| जो सोचते हैं वो कह नहीं पाते, जो कहते हैं वो कुछ ऐसा होता है जिसे सुनकर सुनने वाला बिदक जाता है| ऐसा भी होता है के जी करता है कुछ समय के लिए मौन रख लिया जाए|  ग़ालिब का एक ह्रदय-स्पर्शी शेर है - रही न ताकत-ऐ-गुफ्फ्तार और अगर हो भी, तो किस उम्मीद से कहिये के आरजू क्या है| ताकत-ऐ-गुफ्फ्तार का आशय बात करने की ताकत से है|
अभी कुछ दिंनों पहले की ही बात है अपने एक बहुत पुराने मित्र से मैंने भावुक होकर कहा के, 'जीवन समझ में नहीं आता, हम कुछ क्यूँ करते हैं और न करें तो आखिर क्या करें? क्या यह कैद नहीं है, हम सब बंधे हुए हैं प्रकृति के नियमों से? उतना ही देख सकते हैं जितना कि आँखें देखने दें| उतना ही समझ सकते हैं जीतनी दूर हमारी बुद्धि हमें लेकर जा सके'| मैं अभी  मूल भाव तक पहुँचाने कि कोशिश में था के उसने मुझे टोकते हुए कहा के मैं बहुत सोचता हूँ और इन बातों को कोई मतलब नहीं है| दो पल को ऐसा लगा के 'हमजुबां मिले तो मिले कैसे?' किसके कह…

आसमाँ को भी कद अपना दिखायेंगे हम

आसमाँ को भी कद अपना दिखायेंगे हम  दिल का अरमाँ है क्या ये बतायेंगे हम 
पहले जैसी नहीं जिंदगी भी तो क्या दिल में जज्बा तो है जीत जायेंगे हम 
देखते देखते देखो शब् कट गयी  अगली सुबहो तलक गुनगुनायेंगे हम  
कल तो बारिश में डर भीग जाने का था  आज फौलाद हैं भीग जायेंगे हम 
एक नया सा सबक जिंदगी दे गयी  अब तो मरते हुए मुस्कुरायेंगे हम 

The Quiet One

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The Quiet One
by Chakresh Singh

                “You might be thinking why I eat my lunch alone. I wish I could tell. Have you ever seen my lunch box, the white one? On the top of it is a picture of a boy, sitting in the sun under a tree with his back reclined on its trunk. But that is only the half of the picture. In the other half there is some English poem written in a miniature text. One surely can’t read it with naked eyes but it must be a beautify poem I am sure. You wanted to know why I keep quiet, it is because I believe there is a heaven beyond this classroom and there are plenty of trees unlike our school. I believe, there is a place where the day is bright and the shade of trees very thick and dense. I eat alone because I think of such a place my friend and I wish I were there. “
                It is not that anyone thinks like that about my being so aloof in the class, it is just that I talk to myself all the times and I give elaborate speech in my head to the imaginary kids…

गिनती है सांस जिंदगी पल पल उधार है

गिनती है सांस जिंदगी पल पल उधार है  हमपे भी कर-गुजरने की कुछ ज़िद सवार है 
बारिश में भीगते रहे बेरोक टोक हम  उनको तो छींक आ रही हमको बुखार है
दिल में रही खलिश जो था इक तीर-ऐ-नीमकश  अफ़सोस अब यही के वो भी आर पार है

मानव शरीर और जीवन चिंतन

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मानव शरीर में रहते हुए कुछ अनुभूतियाँ स्वतः ही होती रहती हैं| जीवन जीने की कला सीखने और नए अनुभवों को प्रयोग में लाने का क्रम चलता ही रहता है| हर नए साल का सावन जैसे हमें नया कुछ सिखाने को  दाइत्व समझ अत है, उम्र बड़ा जाता है| प्रायः हम सब कुछ जानने वाले होने की भूल कर, अपने आप नको नयी नयी विषमताओं में खड़ा करते रहते हैं| हम कौन हैं और इस शरीर को हमें किस प्रकार से प्रयोग में लाना है, एक बड़ा सवाल है| एक दूसरा बड़ा सवाल ये भी उठता साथ ही साथ उठ खड़ा होता है के जीवन अस्तित्व का प्रयोजन क्या है और किसकी मंशा है हमारे इस स्वरुप में होने के पीछे| इन प्रश्नों की परिधि पर फेरे लगता, आत्मा चिंतन में लीन हर बौधक व्यक्ति कई बार एक ही प्रकार के अंतर द्वंदों से जूझता हुआ जीवन बढ़ता जाता है|
                 मेरा मत है की प्रकृति में विभिन्न प्रकार के तत्त्वों का समागम है| हर तत्त्व प्रकृति को उसका स्वरुप देता है| हर तत्त्व, चाहे वह कोई छोटा सा पत्थर हो या फिर विशाल सी पृथ्वी, प्रकृति के अस्तित्व के लिए बहार का महत्व रखता है| और फिर देखा जाए तो छोटा और विशाल भी तो हम मानवों के मानने भर क…