Posts

Showing posts from January, 2012

ये खलिश पल-चक्रेश- की जेब में (कलम को शुक्रिया)

ये खलिश पल रही लफ़्ज़ों के टुकड़ों पर
वगर्ना दिल तेरी क्या ज़ीस्त थी इस भरी भीड़ में
यहाँ लोग हैराँ हैं देख कर हुस्न को..
यहाँ हुस्न है मुशरूफ़, झूठी तारीफ़ में ..
एक दिल ..सच्चा दिल ...किस काम का यहाँ
यहाँ बिक जाते हैं सैकड़ों भीड़ में
टूट जाते हैं ठंढी सर्द रात में ..
पल रहा तू मगर चक्रेश के
अंदाज़-ऐ-बयाँ और स्याही पे
कोई फ़रिश्ता तुझे पालता भीड़ में
वगर्ना मर जाता तू भी सभी की तरह ..

वक़्त के हौसले भी कोई कम नहीं

वो मुझे छोड़ कर दूर जाने लगा, एक गुज़रा समाँ याद आने लगा; सर्द रातें तूफानी रुलाने लगीं, और दिल ये फ़साने सुनाने लगा; जख्म गहरे थें सारे मगर ऐ खुदा, सोच उनको मैं दामन छुपाने लगा; इतने पर भी मैं जिंदा खड़ा था मगर, मेरा साया आईना दिखाने लगा; खौलता है लहू और उठता धुवाँ, लाल आँखों में अँधेरा छाने लगा; वक़्त के हौसले भी कोई कम नहीं, हर कदम पर मुझे आजमाने लगा;

रब्बा मैनू हीर दिखादे

रब्बा मैनू हीर दिखादे
मैनू प्यार करा दे
मैनू भी कुछ कहना है

इक बार मिलादे
बरसात करादे
मैनू खुल के रोना है

When did we hit the iceberg

Years back when I was watching Titatic, the movie, I was thinking how foolish and complacent humans can be at times. Couldn't they slow down a little and avert such a mishap. The voice of Celine Dion, the look on the face of Kate Winslet, the drowing body of deCaprio, all left such an impression on my tender soul that I decided not to watch that movie again. Love, too could not touch me the way it has a reputation of touching young heart. Though,I suspect the invisible hand behind such discriminatin rather than the innocent Oscar winning movie. With all my wisdom and conscience, I made a resolution quite early in my life - never to overlook the smallest of the smallest hurdle in my path towards happiness. For, who can say how damaging even a weed can be. I became a slow walker, and a silent listener by nature. Thanks to my precausios nature. Added to my anxiety, the teachers at school made me more and more introvert my making me dust the blackboard every now and then, as I used to…

बागीचों में गुल

बागीचों में गुल और निगाहों में सपने;
जहाँ तक खिले थें, वहाँ तक ख़ुशी थी;

मुहल्लों से आगे, छतों से निकल कर;
मगर जिंदगी ये, कुछ भी नहीं थी;

मुझे थाम लेतीं जो माँ की वो बाहें ;
मुझे रोक लेतीं जो घर की वो राहें;

तो दिल क्या कभी तू ये जान पाता;
के तेरे हौसलों में कहाँ पर कमी थी;