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Showing posts from February, 2012

Yes! I have an edge

Yes I have an edge
over the fearful gatherings of cowardly crowds
Yes I have an edge
over the immoral - wrapped in filgthy shrouds
and Yes I have an edge
over all those who live in fear n die in doubts

For I was born to a mother,
who was destined to claim one day
that she gave birth to a son
... who wont give up
till his days are done!

Yes I have an edge
over the mocking miserable bards
Yes I have an edge
Standing in unfair casio yards
Yes I have an edge
In the game of dice in the war of cards

For I was born to a mother,
who was destined to claim one day
that she gave birth to a son
who wont give up
till his days are done!

जत्था

जब लूट मची थी बागों में

अंधड़ और आंधी के बाद

पेड़ों के सारे मीठे फल जब

बिछे हुए थे मीलों तक...

एक जत्था आया था बच्चों का

हँसता गाता चिल्लाता

और पलक झपकते ही आँखों से

लूट गया मीलों का विस्तार...

धूल उठी और जाते जत्थे की

बस गूँज रह गयी कानों में...
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लूट का हिस्सा मैं नहीं लेता के मैं कोई लूटेरा थोड़ी ही हूँ,
मुझको जाने किसने लूटा और ये कह गया के: "क्या लेकर आये थे और क्या लेकर जाओगे ?"

बेखबर वक़्त से चला कोई

बेखबरवक़्तसेचलाकोई
रूहकीआगमेंजलाकोई
(Unknown of the realities, someone has decided to move on. Someone is buring in the fire of his own self.)


सारादिनसाथकोईदेताहै
सायाहैयाकेहै

क्या नहीं जानता हद्द-ऐ-तन्हाई को

क्या नहीं जानता हद्द-ऐ-तन्हाई को
एक रिश्ता मगर फिर भी भारी लगे
कुछ कमी सी रही दिल के बाज़ार में
हर गली - हर शहर कारोबारी लगे

उतारता रह गया जन्म के हर करम
सोचता रह गया मैं यहाँ क्यूँ भला
कौन मुझमें समाया है mere siwa
कौन इतना हैराँ - परेशान है
एक पल को अगर ये भी मैं मान लूं
किसी विधाता का पुत्र हर इंसान है
तोभी कैसे ये गुत्थी khule tum kaho
क्यूँ ये hasti 'असल' से ही अनजान है
किस बड़े काम के ख़त्म होने तलक
यूँही चलता रहेगा ये तनहा सफ़र
'चक्रेश' संजीदगी की तरफ बढ़ रहा
एक प्यारी हंसी भी क्यूँ भारी लगे

और मत पूछना तबीयत को

और मत पूछना तबीयत को, बेवजह नाम याद आयेंगे..
फिर सजाओगे महफ़िलें जब भी, टूटते जाम याद आयेंगे

देखें किस लहजा दगा मिलता है, मेरे पीछे रकीबों तुम्हे
जब कभी जिक्र-ऐ-उल्फत होगा, फ़क़त अंजाम याद आयेंगे

आज दुखती रग पे खंजर रख रहा हूँ

आज दुखती रग पे खंजर रख रहा हूँ फिर कसौटी पर सिकंदर रख रहा हूँ
पूछता था वक़्त वादों के वज़न मैं तराजू पर समंदर रख रहा हूँ
कागजों की हैसियत इतनी नहीं आसुओं के सैलाब अन्दर रख रहा हूँ