Posts

Showing posts from March, 2012

आप के पहलू में दिन गुज़र जाता है

आप के पहलू में दिन गुज़र जाता है
मेरा बिखरा सा दिल भी संवर जाता है

कुछ निगाहों में है आप की ऐ हुज़ूर
देख नश्तर जिगर में उतर जाता है

कैसे छोड़े भला अब मैनोशी कोई ?
आप का ज़िक्र है रिंद जिधर जाता है


The dismal picture - India not shining

Image
The self congratulatory mood of the present day politicians, elites, and more strikingly the youth who see themselves as independent in the lifeless brick jungles of the major corporate centers, is going to push India into a muddled state in near future. 'Super power' is not what we set out to become after getting independence back in 1947 from the exploitatory regime of the imperial British empire. We were determined to uproot poverty and bring about an overall growth which would be such that the poorest of the poor will get the benefits from it. At present all we have is 1. a handful of joyous (and at the same time stressed) employees of the service sector, 2. unconcerned(and sadly in many instances incompetent as well. This may be because the government has failed in making teaching a profitable and lucrative profession) teachers/professors at the major universities (having minimal interest in their own students as education is not needed to get job these days in India, its…

वक़्त की सलाखों से फ़रार जिंदगी

वक़्त की सलाखों से फ़रार जिंदगी
हौसलों के घोड़ों पर सवार जिंदगी


बेड़ियाँ ये पाँव की काट फेंक दो
अब उठो के है बड़ी शर्मसार जिंदगी

आके इक मकाम पे रुका था कारवाँ
चल दिए हैं चलपड़ी है यार जिंदगी

हो नसों में खौलती गर खुदी कहीं
नज़र उठा देखलो आसमाँ के पार ज़िन्दगी

मेरे हाल पे मुझे छोड़ दो

मेरे हाल पे मुझे छोड़ दो
ये दोस्ती भी अब तोड़ दो

न ग़ज़ल बने न खलिश पले
इन उँगलियों को मरोड़ दो

मैं जगह-जगह से टूटा हूँ
गर हो सके मुझे जोड़ दो

मैं क्या बतलाऊँ कौन हो तुम

तुम रागों में
तुम शब्दों में
तुम ज्योति में
तुम जीवन में

तुम भावों में
तुम सरिता में
तुम धड़कन में
तुम कविता में

तुम नाम नहीं
तुम काम नहीं
तुम पूजा हो
तुम कण कण में

तुम फूलों में
तुम कलियों में
तुम मंदिर में
तुम मूरत में

तुम सीपी में
तुम मोती में
तुम सागर में
तुम लहरों में

मैं कौन भला ?
मैं क्या जानूं ?
हो काव्य में तुम
तुम दर्शन में

तुम चंदा में
तुम तारों में
तुम ज्वाला में
अंगारों में

बचपन में तुम
तुम योवन में

ऋतुओं में तुम
तुम सावन में

तुलसी में तुम
रबिदास में तुम
तुम श्लोकों में
हर सांस में तुम

मैं क्या बतलाऊँ कौन हो तुम 




-ckh-
kaise bataaooN main tumhe ....mere liye tum kaun ho .....

यार तुम मिलो तो सही

कुछ कहूं
कुछ सुनूं
कह सकूं
सुन सकूं
दोस्त थे तुम मेरे 
मैं कभी बन सकूं
हो ये सब कुछ मगर
हाथ में हाथ हो
कोई शाम साथ हो 
यार तुम मिलो तो सही !!!

क्या कहा
क्या किया
रात दिन
सुबह शाम
चाँद से
ख्वाब में
कौन सी बात की ?
कब उठा
कब नहीं
जीता क्या 
 हारा कर
यार ये सब हुआ
और मैं ढूँढता हूँ कहीं हो जो तुम
हो गुजर रही यूँही
जिंदगी तुम्हारी भी
पर मगर
क्या करूँ सामने जो तुम नहीं
क्या कहूं
क्या करूँ
जीत में हार में
सांस की हर पुकार में
हो मगर दूर हो
यार तुम मिलो तो सही



हमसे आबाद थी तेरी महफ़िल

हमसे आबाद थी तेरी महफ़िल, खैर तू ये समझता  नहीं है
हर घड़ी आज़माता अदम को, खुद कभी भी उलझता नहीं है

हमने सदिओं से चाहा तुझी को, पर ये वेह्शत बढ़ी जा रही है
तू अगर देखता है ये आलम, बोल फिर क्यूँ बरसता नहीं है ?

सुर्ख होटों पे भी आज गम हैं, नर्म आँखों के कोने भी नम हैं
ऐ खुदा! हाथ उठाये ये बन्दे, बोल क्यूँ तू गरजता नहीं है ?

फिर से जर जर हुयी हैं दीवारें, मेरे गाँव में कोई नहीं है
हँसते बच्चों की आवाज़ को क्या, ऐ खुदा तू तरसता नहीं है ?

फिर से वीराना सा छा  रहा है, और शम्माएं भी बुझ रही हैं
हर शहर आज ईटों का है ढेरा , कोई पंछी क्यूँ दिखता नहीं है ?


(Written in reference to the blood bath going on in Syria)

ऐ ज़िन्दगी तू बिकुल ऐसी ही रह सकेगी क्या

ऐ ज़िन्दगी तू बिकुल ऐसी हीरह सकेगी क्या सारे दोस्त यार बगल के कमरें में बैठे हस्ते रहें उनकी आवाजें मुझतक आती रहे मैं यहाँ खामोश अकेला इस कमरे में यूँही बैठा रहूँ गर्म पलकों की सुस्त झपकी पर कुछ सोछों सोच कर मुस्काऊँ ऐ ज़िन्दगी तू बिलकुल ऐसी ही रह सकेगी क्या ? यूँही रह रह कर कोई आता रहे जाता रहे मेरे कमरे में और मैं यहाँ यूँही लिखता रहूँ सुनाता रहूँ उलझी हुई आवाजें

I jumped

I stood at cliff of a mountain amidst few dry and thorny shrubs. There was a river underneath, flowing in the valley. I looked up and filled my hearth with the vast stretch of the endless skies. With staggering legs, I bent a little to take off my shoes. Tired of thinking and trying to figure out the answers to eternal questions, I smiles and leaped forward a little to hear the sound of the rustling river even more clearly. When the soul felt free of desires and relent, I decided in a split second and jumped into the valley from the cliff, leaving behind my shoes and cloth. A moment of despair and then total loss of control of anything and everything around me. Few moments in the air, and then came the fnal realization - its in loosing it all that one finally finds something worth a life time of pain and anguish. As I got submersed in the river, the body floated a mile or two, before they say, a fisheman found me still alive. Now I am here, all nacked and wet. It must be a…

हमने ठुकराई है पा कर दुनिया

हमने ठुकराई है पा कर दुनिया, आप कहते हैं हम दीवाने हैं
खैर फिर भी गिला नहीं हमको, ये तो लोगों के ढब पुराने हैं

किस गली जा रहे हैं कैसे कहें, क्यूँ यहाँ एक पल गंवारा नहीं
कौन समझा है जो के समझायें, कितने वादे हमें निभाने हैं

बीतते वक़्त से न रखें रिश्ता, कल की सुबह को दुल्हन कह दें
चाँदनी खुद से ही शर्मा जाए, हम तो उस दर्जे के परवाने हैं

आज भी कमरों चंद खिड़कियाँ, कुण्डी तलास कराती हैं
अब निकलते हैं तेरी महफ़िल से, हमें कुछ दरवाज़े खट-खटाने हैं

यूँ तो उनका नहीं है कोई निशाँ, और हमको नहीं है उनकी ख़बर
फिर भी 'चक्रेश' रोज़ कहता है, तुमको कुछ रिश्ते नए बनाने हैं