यार तुम मिलो तो सही

कुछ कहूं
कुछ सुनूं
कह सकूं
सुन सकूं
दोस्त थे तुम मेरे 
मैं कभी बन सकूं
हो ये सब कुछ मगर
हाथ में हाथ हो
कोई शाम साथ हो 
यार तुम मिलो तो सही !!!

क्या कहा
क्या किया
रात दिन
सुबह शाम
चाँद से
ख्वाब में
कौन सी बात की ?
कब उठा
कब नहीं
जीता क्या 
 हारा कर
यार ये सब हुआ
और मैं ढूँढता हूँ कहीं हो जो तुम
हो गुजर रही यूँही
जिंदगी तुम्हारी भी
पर मगर
क्या करूँ सामने जो तुम नहीं
क्या कहूं
क्या करूँ
जीत में हार में
सांस की हर पुकार में
हो मगर दूर हो
यार तुम मिलो तो सही



Comments

रविकर said…
इन्तजार की इन्तिहा, इम्तिहान इतराय ।

मिलो यार अब तो सही, विरह सही न जाय ।।

दिनेश की टिप्पणी : आपका लिंक
dineshkidillagi.blogspot.com
Reena Maurya said…
कुछ कहने ,सुनने के लिए मिलना
तो जरुरी है |||
बहुत ही सुन्दर रचना...:-)
रविकर said…
आप आयें --
मेहनत सफल |

शुक्रवारीय चर्चा मंच
charchamanch.blogspot.com
बहुत खूब.....
Chakresh said…
bahut shukriya ..badi meharbaani...hoozoor aap aaye

I thank everyone a lot for coming and encouraging me.

Thanks
Chakresh said…
This comment has been removed by the author.
avanti singh said…
badhiya rachna,bdhai aap ko
veerubhai said…
जिंदगी तुम्हारी भी
पर मगर
क्या करूँ सामने जो तुम नहीं
क्या कहूं
क्या करूँ
जीत में हार में
सांस की हर पुकार में
हो मगर दूर हो
यार तुम मिलो तो सही
कविता तो कविता दिनेश भाई की टिपण्णी भी लाज़वाब .

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