Tuesday, April 10, 2012

इक रोज़ तेरी जुल्फों की मैं शाम चाहता हूँ

इक रोज़ तेरी जुल्फों की मैं शाम चाहता हूँ

दिल-ऐ - आईने में तेरे मेरा नाम चाहता हूँ



ऐ कासिद-ओ-हवाओं वो मिलें तो उनसे कहना

लिखता रहूँगा लेकिन इक पयाम चाहता हूँ


भले बेखुदी समझलो यही राह अब है मेरी

तेरा साथ हो जहाँ पे वो मकाम चाहता हूँ


बड़ी धूप पड़ रही है बड़ा चाक दिल है मेरा

तेरे गेसोवों के साए मैं तमाम चाहता हूँ



ये संग-दिली हो कबतक भला क्यूँ ये दायरे हों

जहाँ इश्क हो सदाकत वो निजाम चाहता हूँ




-ckh-

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