Monday, May 21, 2012

कैसे कैसे रंग जीवन - my last poem

कैसे कैसे रंग जीवन
देखो दिखलाता है 
एक में भी जीने न दे | 
कभी पास लेके आये
कभी दूर किये जाए 
दोस्तों में रहने न दे ||

रात आधी बीत चली
रात आधी बाकी है
चंदा को तकता रहूँ
ये दो नयना सुबह के
ख्वाब लिए जगते है
ख्वाब मुझे सोने न दे ||

सांस सांस गिनता जाता
खुद से ही बतियाता
घड़ियों के कांटे चुभें
आस पास कौन है जो
दर्द दिल का समझेगा
आईना चुप रहने न दे ||

जाने क्या पहेली है
जीवन है कैसी डोरी
जीते जी सुलझ न सके
कहते हैं के मर के भी
गाँठ नहीं खुलती है
कौन है जो खुलने न दे ||

वेद ग्रथ सार समझा
दो और दो को चार समझा
पर न समझा खुद को अभी
गीत ग़ज़ल काव्य में
'चक्रेश' ही ढूँढता हूँ
कोई क्यूँ दिखाई न दे

-ckh-

No comments:

चल दोबारा ज़िन्दगी से प्यार कर

तू किसी शोख़ का सिंगार कर रख भी दे ये ख़ामोशी उतार कर तीरगी ये पल में टूट जायेगी  चल दोबारा ज़िन्दगी से प्यार कर एक ही नहीं कई शिकायतें ...