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Showing posts from June, 2012

ये शायर मुहब्बत के काबिल नहीं है

ये शायर मुहब्बत के काबिल नहीं है  किसी की ख़ुशी में ये शामिल नहीं है 
मगर गौर देकर खामोशी भी सुनना  ये चुप हो गया है ये संघदिल नहीं है 

सुना है के कहता था धुत हो नशे में  हयात-ऐ-खलिश का कोई हासिल नहीं है 


भला कैसे समझें सबब आंसुओं का  न आशिक ही है ये, ये बिस्मिल नहीं है 

ये दरिया है शायद इसे तुम न समझो  बेगाना मगर इससे साहिल नहीं है 

The idea of truth

The Idea of Truth
The three worded (or some may argue, for it being two worded) mantra from Mundaka Upnisada, ‘Satymeva jayate’, the eternal ‘truth’ is accepted by the mankind with utmost faith and belief. India also hails the sacred mantra with it inscribed in the base of its National emblem. The idea of truth being invincible hides several questions worth pondering upon though. The bold statement says that ‘truth’ is ever victorious. That ‘truth’ shall ultimately win. Why then is it so that falsehood exists? What is the nature of ‘truth’ and what is so intrinsic in its nature that gives it an eternal standing? Can the ‘Idea of truth’ and the ‘Idea of God’ be used interchangeably? Are they one and the same? If so, then a man devoted to God A, and a man devoted to God B should not use same Mathematical, Physical, Medicinal truth for solving their problems, but should look for their ‘truth’ which depends on their respective God. For, that would be wise. If, there cannot be two different…

जीवन - स्वप्न

क्षणभंगुर इक स्वप्न  असीमित आलौकिक उस दिव्य शक्ति का  परम सत्य विज्ञान सिखा  मानव - जीवन से विरक्ति का  अभी अभी दो खुलती पलकों पर  छूमंतर हो भगा है देखो किसी के घर में कोई नन्हा जीवन जागा है!
 -ckh-

घर

अपनी अपनी किस्मत थी,
अपने अपने फैसले .. जिंदगी तो बारहां , दरवाजे खोलती रही ;
अपनी अपनी चाह थी, अपनी अपनी राह थी .. जिंदगी  तो बारहां, सच ही बोलती रही ;
-ckh-

कर्ण - अर्जुन

युद्ध की पुकार पर उठ रही ललकार पर नसों में खौलने लगा लाल लाल खून फिर
अकड़-अकड़ रह गयीं   हाथ  की  उंगलियाँ   भवों  के  मध्य गर्जना  कर उठीं  बिज़लियाँ  
सूत  पुत्र कर्ण   फिर आग उगलने लगा सहस्त्र सूर्यों सा किसी  सेनाएं निगलने लगा 
दूर खड़ा देखता  दोस्त की चढ़ान को  बहुबलि योद्धा की   इस  नयी उड़ान को जोर जोर हंस रहा  दुर्योधन हाथ उठा उठा  और गुरु द्रोण को  सूर वीर दिखा दिखा 
देख क्रिपाचार्य को  जोर से फिर कहा  साक्षात काल कर्ण  कौन है अब बड़ा ?
पर ये आग थम गयी सांस सांस जम गयी  चार चार स्वेत अश्व दैवीय रथ लिए  भीड़ चीरते हुए   सामने आ गए 
दो घड़ी को युद्ध को  विराम सा लग गया  कुरुक्षेत्र मद्ध्य था दृश्य ये कुछ नया 
सारथी कृष्ण और  पार्थ थें साथ साथ सर्वश्रेठ योद्धा  लिए गांडीव हाथ 
सावधान कर्ण!  कह वाण छोड़ने लगा  कर्ण के अभिमान को अर्जुन तोड़ने लगा

















...... to be continued....

मासूम से सवाल में, उलझा रखा है दिल

मासूम से सवाल में, उलझा रखा है दिल ; इक बावले ख़याल में, उलझा रखा है दिल ;
जीते थें जिस निगाह पर, हर शै निसार कर;  उसने ही तो रुमाल में, उलझा रखा है दिल ;
यूँ तो किसी उम्मीद का, हमपर असर नहीं; पर दिन महीने साल में, उलझा रखा है दिल; 
कुछ था न कुछ ले आये थें, महफ़िल में तेरी हम; देखो मगर मलाल में, उलझा रखा है दिल;
ठोकर में रख चले सभी, आराईशों को हम  तुम हो के किस बवाल में, उलझा रखा है दिल 





आराईशों: embellishments.




-ckh-

जिंदगी की नज़र जीते जी हो चले

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जिंदगी की नज़र जीते जी हो चले  क्या पता कब कहाँ खुद  को हम खो चले 
आखिरी नींद क्या सोच कर सोइए  जाने अनजाने में कैद फिर हो चले
चाह कर चैन को चैन ही खो दिया  कर्म फल बांचते कुछ नया बो चले 
भागवद सार फिर घोल कर पी गए हाथ को युद्ध में रक्त से धो चले