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Showing posts from July, 2012

मैं ही हूँ या हर कोई इस रात से हैरान है

मैं ही हूँ या हर कोई इस रात से हैरान है  ये अँधेरे मेरे हैं या अंधेर में इंसान है ?
टेक देता पत्थरों पे सर मगर मैं क्या करूँ जानता हूँ क्या हूँ मैं और कौन वो भगवान् है !
जान लेलोगे मेरी गर सच जुबाँ पर आ गया  कैसे कह दूं क्या है ख्वाहिश क्या मेरा अरमान है 
देखता हूँ उगते सूरज को उठाकर जब नज़र  खौलने लगती हैं सांसें उठता फिर तूफ़ान है 
ऐ विधाता जानता ना मैं अभी के क्या है तू  पर मैं इतना जानता हूँ मुझसे तेरी पहचान है 


मौसम-मौसम बढ़ता जाए

मौसम-मौसम बढ़ता जाए 
जीवन का रंग चढ़ता जाए 

केशव खोलें सारी गाठें
अर्जुन गीता पढ़ता जाए 

कुंडली में रख रहू केतु को 
भाग्य, देवता मढ़ता जाए 

मद्धम-मद्धम गिनता सासें 
कोई कविता गढ़ता जाए

-ckh

जाने ये लोग

जाने ये लोग कैसे गाते हैं
हम तो हर धुन ही भूल जाते हैं

घर की दीवारें या के आईने
जाने क्यूँ मुझपे मुस्कराते हैं

बेसबब तो नहीं ये उनके ग़म
कुछ तो है आज भी सताते हैं

ख़त वो लिखते ज़रूर होगें पर
नामाबर ही इधर न आते हैं

शाम आई कई सवालों संग
फिर से हम घर को लौट जाते हैं

-ckh

काबिल-ऐ-गौर

काबिल-ऐ-गौर हैं मेरी सांसें  मैकदे छूट गयें, ये ना छूटीं आज भी आती हैं ये जाती हैं  ख्वाब तो रूठ गयें, ये ना रूठीं 


चाह कर भी न कह सके उनसे वो मेरी बेबसी पे हँसते थें 
वक़्त खामोश कर गया उनको  जो मेरी दिलगी पे हँसते थें
--saving for future--

Metamorphosis

A life in making. A life in the mid of no where....
‘How many roads must a man walk down
Before they call him a man How many seas must a white dove sail Before she sleeps in the sand’
The eternal questions of mankind about who he is and where he is going, when sung in the folk tenor dampens the heart and renders the mind a unique kind of numbness. Reading about various kings and dynasties that came and went, numerous unknown artisans and workers who worked laboriously in building the forts and grand sculpture, which stand the heat of time speaking to us the history of the mankind, I often ask, ‘how were they different than me?’
The fact that death is inevitable is in itself enlightening. Why to hurt someone? Why speak bad words? Why to fear? Why to be proud about what we have and be sad about what we don’t have? Who are we, if not food for insects and germs of tomorrow? We live as if we are to be forever. And even if it is so, what’s the point?

Questions give rise to more questions. We chase…

आईना तू ही पराया क्यूँ है

आईना तू ही पराया क्यूँ है  दाग चेहरे पे लगाया क्यूँ है 
ऐ शमा तूने उजाले तो किये  पर मेरे घर को जलाया क्यूँ है 
ऐ खुदा ख़ाक ही हो जाना है   फिर मुझे तूने बनाया क्यूँ है 
-ckh-