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Showing posts from August, 2012

आसमाँ को भी कद अपना दिखायेंगे हम

आसमाँ को भी कद अपना दिखायेंगे हम  दिल का अरमाँ है क्या ये बतायेंगे हम 
पहले जैसी नहीं जिंदगी भी तो क्या दिल में जज्बा तो है जीत जायेंगे हम 
देखते देखते देखो शब् कट गयी  अगली सुबहो तलक गुनगुनायेंगे हम  
कल तो बारिश में डर भीग जाने का था  आज फौलाद हैं भीग जायेंगे हम 
एक नया सा सबक जिंदगी दे गयी  अब तो मरते हुए मुस्कुरायेंगे हम 

The Quiet One

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The Quiet One
by Chakresh Singh

                “You might be thinking why I eat my lunch alone. I wish I could tell. Have you ever seen my lunch box, the white one? On the top of it is a picture of a boy, sitting in the sun under a tree with his back reclined on its trunk. But that is only the half of the picture. In the other half there is some English poem written in a miniature text. One surely can’t read it with naked eyes but it must be a beautify poem I am sure. You wanted to know why I keep quiet, it is because I believe there is a heaven beyond this classroom and there are plenty of trees unlike our school. I believe, there is a place where the day is bright and the shade of trees very thick and dense. I eat alone because I think of such a place my friend and I wish I were there. “
                It is not that anyone thinks like that about my being so aloof in the class, it is just that I talk to myself all the times and I give elaborate speech in my head to the imaginary kids…

गिनती है सांस जिंदगी पल पल उधार है

गिनती है सांस जिंदगी पल पल उधार है  हमपे भी कर-गुजरने की कुछ ज़िद सवार है 
बारिश में भीगते रहे बेरोक टोक हम  उनको तो छींक आ रही हमको बुखार है
दिल में रही खलिश जो था इक तीर-ऐ-नीमकश  अफ़सोस अब यही के वो भी आर पार है

मानव शरीर और जीवन चिंतन

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मानव शरीर में रहते हुए कुछ अनुभूतियाँ स्वतः ही होती रहती हैं| जीवन जीने की कला सीखने और नए अनुभवों को प्रयोग में लाने का क्रम चलता ही रहता है| हर नए साल का सावन जैसे हमें नया कुछ सिखाने को  दाइत्व समझ अत है, उम्र बड़ा जाता है| प्रायः हम सब कुछ जानने वाले होने की भूल कर, अपने आप नको नयी नयी विषमताओं में खड़ा करते रहते हैं| हम कौन हैं और इस शरीर को हमें किस प्रकार से प्रयोग में लाना है, एक बड़ा सवाल है| एक दूसरा बड़ा सवाल ये भी उठता साथ ही साथ उठ खड़ा होता है के जीवन अस्तित्व का प्रयोजन क्या है और किसकी मंशा है हमारे इस स्वरुप में होने के पीछे| इन प्रश्नों की परिधि पर फेरे लगता, आत्मा चिंतन में लीन हर बौधक व्यक्ति कई बार एक ही प्रकार के अंतर द्वंदों से जूझता हुआ जीवन बढ़ता जाता है|
                 मेरा मत है की प्रकृति में विभिन्न प्रकार के तत्त्वों का समागम है| हर तत्त्व प्रकृति को उसका स्वरुप देता है| हर तत्त्व, चाहे वह कोई छोटा सा पत्थर हो या फिर विशाल सी पृथ्वी, प्रकृति के अस्तित्व के लिए बहार का महत्व रखता है| और फिर देखा जाए तो छोटा और विशाल भी तो हम मानवों के मानने भर क…

दिल की इस बेकली को क्या कह दूं

दिल की इस बेकली को क्या कह दूं
अपनी सादादिली को क्या कह दूं

मुझको अलफ़ाज़ अब नहीं मिलते
आप की संघ्दिली को क्या कह दूं

मेहरबाँ आप के इशारों पे
खिल रही हर कलि को क्या कह दूं

नाम:बर अब  इधर  नहीं आते
प्यार वाली  गली को क्या कह दूं

उड़के आया है ख़त मेरे अंगने
नज़्म आधी जली को क्या कह दूं

चाह कर देख भूलना उसको
एक नसीहत भली को क्या कह दूं

आज 'चक्रेश' कह रहा दिल की
आज ग़ालिब वली को क्या कह दूं

मेरी उम्र नहीं बढती

चलती रेल की खिड़की से बाहर देखूं

तो आज भी मेरा बचपन
उसी दिलचस्पी के साथ
टकटकी बांधे, गाल हाथ धरे
देख रहा है दूर तक विस्तृत लहलहाते
खेत खलिहान 
हर टूटा फूटा माटी का घर किसी अपने ही ताऊ,
चाचा- चाचीऔर भैया का सा लगता है 
आसमान में पंख फैलाये छोटी छोटी उड़ान भरती हर चिड़िया
हिंदी भाषी लगती है
 ये हिंद देश की सीमाएं हैं
वो दूर मेरे ही बागीचे 
समय के साथ कब उम्र बढ़ी 
कब कवितातें मुझतक आ पहुँचीं 
पता ही नहीं चला
हाँ पर कुछ देर की चुप्पी में 
सारा बचपन उसी खिड़की पर बैठा देखता हूँ 
जाने अंतिम दिन जीवन के कितना बड़ा हो पाऊंगा मैं 

हर रूप में तुमको देख लिया

हर रूप में तुमको देख लिया
हर रूप तुम्हारा प्यारा है
मैं फिर गुस्ताखी कर बैठा
कागज़ पर हुस्न उतारा है

दिल को बहलाकर देख लिया
तुमसे न कह कर देख लिया
मैं भूल गया था पहला प्यार
तुमसे ही प्यार दोबारा है

चाहा था कहना मंदिर में
पर सोच रहा था अपने गम
मेरी नैया मझधार प्रिये
दूर कहीं पे किनारा है

मैं आज भी अक्सर जाता हूँ
उस मंदिर तक, उन झूलों तक
वो मीठी हँसी भोली बातें
यादों में ऐसे संवारा है

कुछ न कहना गर हैराँ हो
मेरे दिल की इस कविता पर
मैं तन्हा तन्हा जी लूँगा
काफी इतना भी सहारा था

जाते जाते इक आखिरी बार
मेरे हमदम मुझसे मिल लो
मैं जानता हूँ इस जीवन में
इतना ही साथ हमारा है

-ckh


ये खलिश और ये जवानी भी

ये खलिश और ये जवानी भी 
ख़त्म होगी मेरी कहानी भी 

आप की चाहतों की बारिश में 
खिल उठी इक ग़ज़ल पुरानी भी 

अपनी मजबूरियाँ ये तकलीफें 
कुछ कही कुछ पड़ी छुपानी भी 

खैर अफ़सोस तो रहेगा ही
खो गयी प्यार की निशानी भी

जो न मिलते कभी भी उनसे तो
यूँ न होता गुहर ये पानी भी

Eyes Set On Kejriwal

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Team Anna called off its fast until death move seeing that the ruling UPA party was in no mood of passing the Lokapal Bill in the coming parliamentary session. The move of calling off the fast was wise as there was no point of blackmailing the government in the first place itself. The government has been hostile towards the movement from the very beginning and had not shown the political will of doing something serious about the issue of corruption from the very beginning.
It was a treat to see the retired army general V.K. Singh sitting besides Anna ji on the Anshan stage. His short speech was energizing and must have made every Indian proud to see a courageous solider, Anna Hazare, and the humble general coming on one stage to raise their voice against the problems of the nation. The heart gets filled with respect when one sees a diabetic Arvind Kejriwal fasting for nine days and then coming on stage to recite one of Dushyant’s poem: ho chuki hai peer parvat si pighalni chahiye, is h…