Thursday, August 16, 2012

मेरी उम्र नहीं बढती


चलती रेल की खिड़की से बाहर देखूं


तो आज भी मेरा बचपन

उसी दिलचस्पी के साथ

टकटकी बांधे, गाल हाथ धरे

देख रहा है दूर तक विस्तृत लहलहाते

खेत खलिहान 

हर टूटा फूटा माटी का घर किसी अपने ही  ताऊ,

चाचा- चाचीऔर भैया का सा लगता है 

आसमान में पंख फैलाये छोटी छोटी उड़ान भरती हर चिड़िया

हिंदी भाषी लगती है

 ये हिंद देश की सीमाएं हैं

वो दूर मेरे ही बागीचे 

समय के साथ कब उम्र बढ़ी 

कब कवितातें मुझतक आ पहुँचीं 

पता ही नहीं चला

हाँ पर कुछ देर की चुप्पी में 

सारा बचपन उसी खिड़की पर बैठा देखता हूँ 

जाने अंतिम दिन जीवन के कितना बड़ा हो पाऊंगा मैं 


6 comments:

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) said...

कल 19/08/2012 को आपकी यह बेहतरीन पोस्ट http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
धन्यवाद!

sushma 'आहुति' said...

बेजोड़ भावाभियक्ति....

chakresh singh said...

बहुत शुक्रिया ....

उपासना सियाग said...

बहुत सुन्दर .....

Reena Maurya said...

बहुत बहुत बढ़िया भाव अभिव्यक्ति...
बहुत सुन्दर...
सहज और सरल....

chakresh singh said...

thanks

चल दोबारा ज़िन्दगी से प्यार कर

तू किसी शोख़ का सिंगार कर रख भी दे ये ख़ामोशी उतार कर तीरगी ये पल में टूट जायेगी  चल दोबारा ज़िन्दगी से प्यार कर एक ही नहीं कई शिकायतें ...