मेरी उम्र नहीं बढती


चलती रेल की खिड़की से बाहर देखूं


तो आज भी मेरा बचपन

उसी दिलचस्पी के साथ

टकटकी बांधे, गाल हाथ धरे

देख रहा है दूर तक विस्तृत लहलहाते

खेत खलिहान 

हर टूटा फूटा माटी का घर किसी अपने ही  ताऊ,

चाचा- चाचीऔर भैया का सा लगता है 

आसमान में पंख फैलाये छोटी छोटी उड़ान भरती हर चिड़िया

हिंदी भाषी लगती है

 ये हिंद देश की सीमाएं हैं

वो दूर मेरे ही बागीचे 

समय के साथ कब उम्र बढ़ी 

कब कवितातें मुझतक आ पहुँचीं 

पता ही नहीं चला

हाँ पर कुछ देर की चुप्पी में 

सारा बचपन उसी खिड़की पर बैठा देखता हूँ 

जाने अंतिम दिन जीवन के कितना बड़ा हो पाऊंगा मैं 


Comments

कल 19/08/2012 को आपकी यह बेहतरीन पोस्ट http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
धन्यवाद!

बेजोड़ भावाभियक्ति....
chakresh singh said…
बहुत शुक्रिया ....
बहुत सुन्दर .....
Reena Maurya said…
बहुत बहुत बढ़िया भाव अभिव्यक्ति...
बहुत सुन्दर...
सहज और सरल....

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