मानव शरीर और जीवन चिंतन


         मानव शरीर में रहते हुए कुछ अनुभूतियाँ स्वतः ही होती रहती हैं| जीवन जीने की कला सीखने और नए अनुभवों को प्रयोग में लाने का क्रम चलता ही रहता है| हर नए साल का सावन जैसे हमें नया कुछ सिखाने को  दाइत्व समझ अत है, उम्र बड़ा जाता है| प्रायः हम सब कुछ जानने वाले होने की भूल कर, अपने आप नको नयी नयी विषमताओं में खड़ा करते रहते हैं| हम कौन हैं और इस शरीर को हमें किस प्रकार से प्रयोग में लाना है, एक बड़ा सवाल है| एक दूसरा बड़ा सवाल ये भी उठता साथ ही साथ उठ खड़ा होता है के जीवन अस्तित्व का प्रयोजन क्या है और किसकी मंशा है हमारे इस स्वरुप में होने के पीछे| इन प्रश्नों की परिधि पर फेरे लगता, आत्मा चिंतन में लीन हर बौधक व्यक्ति कई बार एक ही प्रकार के अंतर द्वंदों से जूझता हुआ जीवन बढ़ता जाता है|

                 मेरा मत है की प्रकृति में विभिन्न प्रकार के तत्त्वों का समागम है| हर तत्त्व प्रकृति को उसका स्वरुप देता है| हर तत्त्व, चाहे वह कोई छोटा सा पत्थर हो या फिर विशाल सी पृथ्वी, प्रकृति के अस्तित्व के लिए बहार का महत्व रखता है| और फिर देखा जाए तो छोटा और विशाल भी तो हम मानवों के मानने भर का फेर है बस| प्रकृति कभी भी अपने आप को स्वरुप देने वाले तत्त्वों में भेद भाव करती नहीं दिखाती| एक छोटी सी चींटी कर्म योग को जिस एकाग्रता से निभाती है, देखते ही बनता है| एक झरना जिस सौम्यता को अपने भीतर दबाये, एक मर्यादा में रह कर झरता है और प्रकृति में एक रंग भरता है, जिसे देख कर हम मानव आनंदमय हो जाते हैं, भी अपने आप में प्रकृति के अनेक नियमों को जीवंत करता है|

             मानव शरीर में रह कर कई बार हम चिंताओं से घिर जाते हैं| चिंता, जिसे जैसंकर प्रसाद जी कामायनी में एक जगह, 'अभाव की चपल भालिका कहते हुए' ये कहते हैं के: 
"मनन करवाएगी तू कितना ?
उस निश्चिन्त जाती का जीव; 
अमर मरेगा क्या? तू 
कितनी गहरी डाल रही है नींव"| 
            चिंता का कई बार असल कारन जान पाना, एक साधारण मनुष्य के लिए असंभव सा हो जाता है| चिंता से दुखों की दूरी ज्यादा नहीं होती| दुःख जीवन को अर्थहीनता की राह पर  धकेल देते  हैं|

           जीवन एक शूक्ष्म डोर है और यदि इसके दोनों सिरों को ध्यान से न पकड़ा जाए तो इसमें गांठें पद जाती हैं| तनाव के साथ ये गांठें और भी मजबूत होती जाती हैं|सही मार्गदर्शन, चाहे वह किसी गुरु से मिले या फिर अपने द्वारा की गयी तपस्या के फल स्वरुप जीवन अनुभव बन कर आये, जीवन को सुन्दर स्वरुप दे सकती है| यदि मानव के दुर्लभ शरीर में रह कर सृष्टि के गुड़ों का बोध  कर पाने में हम असक्षम हैं तो कहीं न कहीं बदलाव की आवश्यकता है|

         जीवन को नए दृष्टिकोण से देखना होगा| शरीर एक प्राकृतिक उपकरण  हो सकता है लेकिन जड़ता का स्वामी नहीं| जो जीवित है वह शरीर अवश्य है, परन्तु की अभिप्राय से यह इस स्वरुप में, इन इन्द्रियों के साथ जीवित है, वह अभ्प्राय किसी आवरण से ढाका हुआ है|इस आवरण को हटा कर साफ़ सुथरी समझ तक पहुँचाना की बुद्ध होना है|

               यह आभास होता है के जीवन का अभिप्राय जीवन आनंद से है|आनंद का अनुभव सतत मनन से संभव है| जितना ही हम बाह्य दुनिया में सम्मिलित होंगे उठाता ही हम अपने आप को बंधनों में बांधते जायेंगे और परिस्थितियों के अधीन होकर हर क्षण स्वयं को एक बेड़ियों से जकडे हुए कैदी सा पायेंगे| कैद में रहने से गुस्सा, निराशा, घृणा, अकर्मता आदि नकारात्मक शक्तियां हमें घेर लेंगी और जीवन-आनंद के अनुभव के दुर्लभ अवसर से हम अपने जीवन काल में वंचित रह जायेंगे| 

               परन्तु समाज में रहकर मोह बंधनों में न बंधने की कला कोई आसान कला नहीं है| हमारा मानव शरीर अपनी शक्ति से ओत-प्रोत होकर कई बार शांत-चित्त मन को उद्द्वेलित करता है और उसके जीवन जानने वाले होने पर ही प्रश्न चिन्ह लगा देता है| वह भला यह कैसे मान ले के जीवन आनंद सही मायनों में वही है जो एक मनन में लीं आत्मा अनुभव करती है? क्यूँ न रिश्ते-नातों से उपझते प्रेम बंधनों में रम कर जीवन-आनंद का अनुभव किया जाए? 

               मन की चंचलता ऐसे ही कई और प्रकार के मतों तक चेतना को भ्रमण पर ले जाती है और विक्रम-बेताल के इस खेल में दृढ निश्चय के साथ चल रहे विक्रम को अपनी बीताली बातें मनवा कर दोबारा उसी अज्ञानता के अरण्य में छोड़ आती है जहाँ से निकल कर वह काफी दूर चला आया था| 

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