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Showing posts from October, 2012

सहस्त्र अनुभूतियाँ

मैं धीरे धीरे पंख फैलाने लगा मैं आज़ाद हूँ  मैं आज़ाद हूँ  अब फिर से कई बरसों के बाद 
न चाह है के कुछ कहूं - कुछ सोचूँ  न सवाल हैं, न दुःख,  न दर्द  न रही चाह दूर टहलते जाने की दूर अपने सच से कहीं दूर निकल जाने की न चाह रही किसी और से सहमति पाने की सामंजस्य बनाने की
मैं आज़ाद हूँ  अब फिर से कई बरसों के बाद
शांत हूँ, मौन हूँ, खुश हूँ  मैं - मैं में पूरा हूँ  अब मैं अधूरा नहीं 
मुझसे जानना चाहोगे के जिंदगी क्या है ? तुम यहाँ क्यूँ और तुम क्या हो ? 
मैं जानता हूँ तुम नहीं मानोगे  पर मैं बतलाता हूँ  तुम मैं हो  मैं तुम हूँ  यहाँ कुछ भी दो नहीं  केवल एक है 
एक शून्य, एक व्योम, एक दूर तक फैला विस्तृत आकाश
नहीं मानते हो न ? मैं जानता हूँ तुम नहीं मानोगे 
तुम लड़ोगे हर तर्क-वितर्क से  बुद्धि तुम्हे सोचने नहीं देगी  तुम नहीं मानोगे

मैं आज़ाद हूँ  मैं देखता हूँ  एक बाज़ार - दुकानदारों का, खरीदारों  को और भिखारियों का  राजाओं का, रंकों का, सेनापतियों और संतरियों का  खबरों का, चर्चाओं का, सोच का विचार का  एक जंग - अहम् की, एहंकार की, द्वेष की, अपनी - पराई एक निरंतर गोल गोल घूमता पहिया  कोल्हू का…

भागते भागते भागते भागते भागते भागते

जागते जीवन का एक एक पल भागते भागते भागते भागते भागते भागते बीत रहा है
अंतिम घड़ी ये दौड़ तड़पायेगी मैं जानता हूँ

ये सवाल उठाएगी
के क्यूँ भागे

क्यूँ नहीं किसी पहाड़ी पर खड़े होकर
नीचे बहती नदी में कंकड़ फेंकते हुए जिंदगी बिताई

क्यूँ नहीं सागर किनार हर शाम डूबते सूरज
के रंगों से आँखों को जी भर रंग जाने दिया

क्यूँ न शोर से दूर कहीं अकेले निकल सके
इक भागा दौड़ी का हिस्सा तुम क्यूँ बने कहो

मैं जानता हूँ ये दौड़ सवाल उठाएगी
और मैं इतना ही कह सकूंगा के
-
जीवन की आप धापी में कब वक़्त मिला कुछ देर कहीं पर बैठ कभी यह सोच सकूं जो किया कहा माना उसमे क्या बुरा भला

मृत्यु

टूट गयी जीवन की डोरी  मेरे प्रिय एक साथी की मैं प्रतिमा बनकर के देखूं सीमाएं मानव जाती की

एक लैंप पोस्ट दबी ज़ुबान में

सर्द रात सुनसान सड़क पर
घनघोर अंधेरों की थी जब चादर
एक लैंप पोस्ट दबी ज़ुबान में 
अपना अस्तित्व बताता था 

पूर्वा के ठन्डे थप्पड़ से
जब मुरझाईं कलियाँ कपास की 
खेतों में जब मातम था तब
एक लैंप पोस्ट दबी ज़ुबान में 
अपना कुछ दर्द सुनाता था

गाँव को जाती सूनी सड़कों पर
कुछ छीटे थे लाल खून के 
किसी किसान की मजबूरी पर
एक लैंप पोस्ट दबी ज़ुबान में 
कुछ कह कर के चुप हो जाता था

-ckh

मेरी सूरत मेरी तस्वीर में पहले सी क्या होगी

मेरी सूरत मेरी तस्वीर में पहले सी क्या होगी 
दीवारें नम रहीं बरसों तो क्यूँ ना ग़म-ज़दा होगी 

बेहकता है बेहकने दे उदू को कुछ शिकायत है 
जो रोकूँ गर मैं पीने से तो ये भी तो खता होगी 

अभी उस शख्स की यादों को मेरे दिल मुल्तवी कर दे
अगर खूरेज़ हुआ फिर से तो तेरी क्या दावा होगी 

तेरे दर से चला था सोच कर के भूल जाऊंगा
नहीं सोचा था शिकायत भी तुझे से बारहा होगी

चलूँ पीछे मैं राहों पे इसी उम्मीद में "चक्रेश"
कहीं बैठी मेरी किस्मत मुझी से कुछ खफा होगी

-ckh

(not in meter)

आइये, बैठिये, कुछ बात करें

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आइये, बैठिये, कुछ बात करें| 
अक्सर जीवन में ऐसा भी होता के चलते-चलते हम कुछ ऐसे पडावों पे आ पहुंचाते हैं जहाँ कुछ कहना भी दुश्वार सा हो जाता है| जो सोचते हैं वो कह नहीं पाते, जो कहते हैं वो कुछ ऐसा होता है जिसे सुनकर सुनने वाला बिदक जाता है| ऐसा भी होता है के जी करता है कुछ समय के लिए मौन रख लिया जाए|  ग़ालिब का एक ह्रदय-स्पर्शी शेर है - रही न ताकत-ऐ-गुफ्फ्तार और अगर हो भी, तो किस उम्मीद से कहिये के आरजू क्या है| ताकत-ऐ-गुफ्फ्तार का आशय बात करने की ताकत से है|
अभी कुछ दिंनों पहले की ही बात है अपने एक बहुत पुराने मित्र से मैंने भावुक होकर कहा के, 'जीवन समझ में नहीं आता, हम कुछ क्यूँ करते हैं और न करें तो आखिर क्या करें? क्या यह कैद नहीं है, हम सब बंधे हुए हैं प्रकृति के नियमों से? उतना ही देख सकते हैं जितना कि आँखें देखने दें| उतना ही समझ सकते हैं जीतनी दूर हमारी बुद्धि हमें लेकर जा सके'| मैं अभी  मूल भाव तक पहुँचाने कि कोशिश में था के उसने मुझे टोकते हुए कहा के मैं बहुत सोचता हूँ और इन बातों को कोई मतलब नहीं है| दो पल को ऐसा लगा के 'हमजुबां मिले तो मिले कैसे?' किसके कह…