Saturday, December 28, 2013

मैं धीरे धीरे पंख फैलाने लगा


मैं धीरे धीरे पंख फैलाने लगा
मैं आज़ाद हूँ 

मैं आज़ाद हूँ 

अब फिर से कई बरसों के बाद 



न चाह है के कुछ कहूं - कुछ सोचूँ 

न सवाल हैं, न दुःख,  न दर्द 

न रही चाह दूर टहलते जाने की

दूर अपने सच से कहीं दूर निकल जाने की

न चाह रही किसी और से सहमति पाने की

सामंजस्य बनाने की



मैं आज़ाद हूँ 

अब फिर से कई बरसों के बाद



शांत हूँ, मौन हूँ, खुश हूँ 

मैं - मैं में पूरा हूँ 

अब मैं अधूरा नहीं 



मुझसे जानना चाहोगे के जिंदगी क्या है ?

तुम यहाँ क्यूँ और तुम क्या हो ? 



मैं जानता हूँ तुम नहीं मानोगे 

पर मैं बतलाता हूँ 

तुम मैं हो 

मैं तुम हूँ 

यहाँ कुछ भी दो नहीं 

केवल एक है 



एक शून्य, एक व्योम, एक दूर तक फैला विस्तृत आकाश



नहीं मानते हो न ?

मैं जानता हूँ तुम नहीं मानोगे 



तुम लड़ोगे हर तर्क-वितर्क से 

बुद्धि तुम्हे सोचने नहीं देगी 

तुम नहीं मानोगे



मैं आज़ाद हूँ 

मैं देखता हूँ 

एक बाज़ार - दुकानदारों का, करीदारों को और भिखारियों का 

राजाओं का, रंकों का, सेनापतियों और संतरियों का 

खबरों का, चर्चाओं का, सोच का विचार का 

एक जंग - अहम् की, एहंकार की, द्वेष की, अपनी - पराई

एक निरंतर गोल गोल घूमता पहिया 

कोल्हू का बैल, अपनी दम को पकड़ता एक कुत्ता 

मैं देखता हूँ 

एक दोस्त, एक दुश्मन, एक दंगा, एक आग, एक चीखता बच्चा 



पर मानोगे मेरी बात

यहाँ दो कुछ भी नहीं 



सब पर्याय है यूँ समझो 

एक ही शब्द के 

एक ही अर्थ है 

एक ही आशय है 



तुम मैं हो

मैं तुम हूँ 

मैं आज़ाद हूँ

मैं देखता हूँ

मैं उलझता नहीं 

इस बाज़ार में 

इस छीटाकशी में 

इक तर्क-वितर्क के घेरों में

इस अहंकार - जनित माया में 



मैं गीता से परे हूँ

मैं केशव वचनों से परे हूँ

अनछुआ हूँ

महाभारत के मैदान में उठती धुल में

श्वेत-वस्त्र में साफ़ सुथरा हूँ

katate गिरते सहीरों के बीच हँसता हूँ

खुश हूँ



तुम नहीं मानते न 

के तुम मैं हो मैं तुम हूँ



चलो यूँ समझो 

के कुछ भी नहीं 

न डरती न सूरज एंड अम्बर अन व्योम न जीवन न मरण न पत्थर न देवता 

न हंसी न ख़ुशी न दुःख न सुख न रिश्ते न नाते न उम्र न समय 



कुछ न होना कुछ होना है क्या ?



बुद्धि को रोक सकते हो इस शून्य में ? नहीं न ..

तारका हैं वितर्क है 

सोच है सब कुछ तो है 

तुम हो तुम्हारा नाम है 

तुम्हारी पहचान है 

फिर कुछ कैसे नहीं ?



संभव कहाँ है तुम्हारे लिए ऐसे शून्य में ठहर पाना ?

तुम तो  बाध्य हो अपनी प्रकृति से सोचने के लिए, बंधने के लिए एक पहचान में, एक नाम में एक स्वरुप में

तुम आज़ाद कैसे होगे कहो ?



नहीं samajhte न 

जब मैं कहता हूँ 

के तुम मैं हो 

और मैं तुम हूँ 



यहाँ कुछ भी दो नहीं 

एक ही अर्थ है 

एक ही आशय है 

एक ही कविता है 

एक ही गीत है 

एक की चित्र है 

एक ही दर्शक है 

एक ही श्रोता है

एक ही चित्रकार है 

एक ही सत्य है 

एक ही असत्य है 

एक की निर्वाण है 

एक ही मोक्ष है 

एक ही aastik है 

एक ही नास्तिक है 

एक ही बागवान है 

एक ही इंसान है

एक ही दैत्य है 

एक ही असुर है 

एक ही पहाड़ है 

एक की नदी है 

एक ही तालाब है 

एक की kankar है 

एक ही लहर है 

एक ही सूरज है 

एक ही शाम है 

एक ही शराब है 

एक ही साकी है 

एक ही हिंदी है

एक ही उर्दू है 

एक ही कवी है 

एक ही शायर है 

एक ही मैं हूँ

एक ही तुम हो



तुम मैं हो

मैं तुम हूँ



कहो कितने बड़े हो तुम अब 

अपने शरीर जितने ?

क्या उम्र है तुम्हारी 

दो तिथियों के बीच ?

कितना जी पाए हो अब तक

कितने जीने की है इक्षा कहो ?



मानते हो मेरी बात ?



समझते हो क्या तुम 

मैं जो कह रहा हूँ?



नहीं न ?



चलो जाने दो...

फिर पढना मुझे 

फिर कभी

किसी और दिन

अभी तुम तुम हो 

तुम मैं नहीं ...



तुम आओगे एक दिन

मैं जानता हूँ

स्वेत वस्त्रों में 

युध भूमि में जय-पराजय को रख कर अपने पीछे

हँसते हुए

तुम्हारे वस्त्रों पर कोई daag नहीं होगा

तुम आज़ाद होगे

तुम मैं होगे

मैं तुम हूँगा



ये होगा मैं देखता हूँ



इतना ही होना है क्यूंकि



इससे ज्यादा कोई अर्थ नहीं है 

आशय नहीं है 

इस काल चक्र का 



यहाँ सब कुछ एक ही है 

और एक में ही सिमट रहा है ...





कितनी पकती की ये कविता कहो ?

खाली पन्ना ही तो है ...

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- ये तुम्हारी कविता है 

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