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आते रहे हो ख़्वाबों में ऐ यार कबसे तुम

आते रहे हो ख़्वाबों में ऐ यार कबसे तुम 
कैसे कहोगे अलविदा अब जाँ-बलब से तुम ? 

चश्म-ओ-चराग़-ऐ-दरमियाँ फैली है तीरगी 
दे दो मुझे भी रौशनी छू कर के लब से तुम 

निस्बत में तेरी साक़िया काफ़िर हुआ के मय  
पीता नहीं था पी रहा हूँ बैठे हो जबसे तुम

घुंघरू न बांधता ख़्वाबों के पाँव में

घुंघरूनबांधताख़्वाबोंकेपाँवमें मैंमरगयाहोताइसधूपछाँवमें
बच्चोंकीटोलियांलोदौड़वोपड़ीं
लॉरीकोईदेखोआईजोगाँवमें

ज़िन्दगी की अज़ब रवायत थी

ज़िन्दगीकीअज़बरवायतथी एकजाँथीबड़ीशिकायतथी
चाहतेतोथेंकरनहींपाये सबकीऐसीहीकुछहिकायतथी
काफ़िरोंकाक़तलभीजायज़था भूलताहूँयेकोईआयतथी
मैंसियासतसेबचकहाँपाता
बेज़ुबाँहोनेसेरिआयतथी

कभी गुमसुम, कभी हैराँ, कभी नाशाद कर देंगी

कभीगुमसुम, कभीहैराँ, कभीनाशादकरदेंगी तेरीयादें, मेरेहमदम, मुझेबर्बादकरदेंगी

कोईदिनऔरबाकीहैंशब-ऐ-फुरकतगुज़रनेदो मुझेमुझसेमेरीसाँसेरिहाआज़ादकरदेंगी

नहींमुमकिनज़मानेसेमिलेबिनमैंगुज़रजाऊं
मेरीग़ज़लेंकोईशायर, सफरकेबादकरदेंगी

अगर आवाज़ दूँ तुमको मुझे मिलने तो आओगी

अगरआवाज़दूँतुमकोमुझेमिलनेतोआओगी चलोमेरेनहींलेकिनयेवादाक्यानिभाओगी?
बहोतचाहासनमतुमकोदीवानोंसामगरदेखो नमेरीहोसकीफिरभीउमरभरकोसताओगी
मेराहरगीततुमसेहैजोमैंतुमकोसुनाताहूँ कहूँदिलकीतोक्यादिलसेमुझेतुमसुनभीपाओगी?
वोजुल्फोंकेखमोंकोमैंकभीसुलझानहींपाया मेरीउलझनकोकंघेसेकहाँसुलझाभीपाओगी?
मनालूंगातुम्हेंचाहेमुझेदिलसेगिरादेना जोमैंरूठाकभीतोक्यामुझेभीतुममनाओगी

बताता है तबस्सुम भी, के सांसें हो चलीं भारी

बताताहैतबस्सुमभी, केसांसेंहोचलींभारी मगरअबभीलिएहूँमैं, निगाहोंमेंरवादारी
उदूसेक्यागिलाकीजे, वोकहताहैतोसुनलीजे ज़रादिनकीख़लिशउसकी, ज़रादिनकीअदाकारी
उभरतीहैमेरेदिलमें, वहीक्यूँबारहाँगोया कोईतस्वीरअपनीहो, कोईदिलकीकलमकारी
दिखावाहैजिधरदेखो, येलोगोंकेशहरक्याहैं तमाशाहैमेरेआगे, बतातीहैनज़रखारी
दीवानोंकीमगरकोई, कहींपेबस्तियांहोंगी वहींअपनाठिकानाकर, वहींगुज़रेउमरसारी
नुमायाँहैवज़ूदअपना, भीसागरसाकहाँहोगा खुदीपेहौसलाकबथा, नथीख़ुदसेवफादारी



हमने दिल के दरवाज़ों से, सौ बार कहा चुप रहने को

हमनेदिलकेदरवाज़ोंसे, सौबारकहाचुपरहनेको बाम-ओ-दरकीआवाज़ोंसे, सौबारकहाचुपरहनेको
मुमकिनहैकेख़ामोशीमें, वोनामहमारालेतीहो लेकिनऐसेअंदाज़ोंसे, सौबारकहाचुपरहनेको
हरसपनापूराहोजाए, ऐसीतोकोईशर्तनहीं उम्मीदोंकीपरवाज़ोंसे, सौबारकहाचुपरहनेको
गरजिन्दारहनाइकशैथी, तोइकशैथीमज़बूरीभी
मुफ़लिस-जाँनेसबनाज़ोंसे, सौबारकहाचुपरहनेको

मुझे थाम लो दोबारा कहीं मैं फ़िसल गया तो?

मुझेथामलोदोबाराकहींमैंफ़िसलगयातो? अजीअबनआज़माओमेरादमनिकलगयातो?
कहोमुझसेआशनाक्यूँहोतीहोतुममेरीजाँ कहींमौसमोंकेपर्दोंसामैंभीबदलगयातो?
यहाँख़ाकसारहोकरअभीबेंचतोदूँखुदको मगरबेचनेसेपहलेमेरादिलपिघलगयातो?
कोईजाँ-निसारहोकरकभीउसकोपासकाहै इसीआसमेंहैबिस्मिलकहींवोदहलगयातो?
मुझेगैरकरकेअबजोकिसीऔरकेहुएहो ज़रायेमुझेबतादोकभीदिलमचलगयातो ?
कभीमहफ़िलोंमेंजाओतोसंभलकेजामथामो
उठानेसेपहलेसोचोकेसागरउबलगयातो?

मैं तुम्हारे बगैर रहूँ कबतक .....

हमारे बीच जो शब-ऐ-फ़ुर्क़त के फासले हैं वो अँधेरे हैं जो हर लम्हा सिमट रहे हैं उस वस्ल की एक रात में जिसमें चाँदनी की रिदा लिपट जायेगी हमारे तपते जिस्मों से और तुम्हारे गेसुओं की खुशबुओं में हर एक ख़्वाब, हर एक चाह सेहरा पे आकर रुके बादलों तले खिलखिलाते हुए बच्चों की मानिंद हँस पड़ेंगे...
तन्हाइयों के सूखे पत्ते तुम्हारी आहटों से टूट जाएंगे
तुम जब आओगी अपने होटों पर उन सभी दिनों  के बही-खाते लेकर जिनको नफ़े  नुक्सान का ख़याल इसकदर था के तुमसे मुझे मिलने न दिया हर भरम टूट जाएंगे और डर है मुझे मैं रो न पडूँ तुम्हारी खुली बाहों पर ज़माने के तानों से बने निशानों को देख कर डर है मुझे कहीं तुम्हारी ख़ामोशी में तुमको टोकने वाली अपनी ज़ुबाँ को गर न मैं रोक पाया तो क्या तुम्हें सुन सकूँगा...
मेरे क़रीब, मेरे पहलु में तुम आकर बैठ जाना और मुआफ़ कर देना मेरी सभी मज़बूरियों को
जब सितारे तुम्हें उफ़क़ से देखेंगे अपनी बाहों में तुमको कस लूंगा और किसी नज़्म में तुम्हें पिरो दूंगा उन्ही तारों की तरह जो आजतक उस रूह को लिए जी रहे हैं जिसने  उन्हें लफ़्ज़ों में बयाँ किया था जो अब नहीं है पर होने का अहसास कराता  है जिसकी कलम रात के सियाह सफ़ह…

फूल सब खार बन गए होंगे

फूलसबखारबनगएहोंगे
हर्फ़बेज़ारबनगएहोंगे

चारदिनबज़्ममेंनहींबैठा
रिन्दफनकारबनगएहोंगे

दिनमेंक्यादेखूंमैंज़मानेको
लोगकिरदारबनगएहोंगे

जारहाहैतोयेभीमुमकिन

आज भी खुल्द की दुवा करके

आजभीखुल्दकीदुवाकरके
लौटआयारसमअदाकरके

आदमीआदमीसेमिलताहै
लफ्ज़सेदिलकोक्यूँजुदाकरके

ज़ीस्तहीमर्ज़बनचलाऐदिल
फायदाक्याहोअबदवाकरके

आधियोंमेंनहींबुझी

घर में जबसे तंगी है मज़बूरी है

घर में जबसे तंगी है मज़बूरी है रिश्तों में कुछ तल्ख़ी है कुछ दूरी है
हम चादर छोटी कर के कितना बचते साँसों पर भी दो-आना दस्तूरी है
मैं शायर होकर के भी क्या क्या लिख दूँ माँ की  सिसकी पर हर नज़्म अधूरी है
अबके तूफाँ में छप्पर ना बच पाया किस मुंसिब की फ़तवों पे मंज़ूरी है ?
जिनसे बातें होतीं थीं वो कब रूठें क्या जानूँ क्यूँ तनहा हूँ महजूरी है

बैठें हैं फ़ुरसत के सब दिन आने को उनसे मिलने की तैयारी पूरी है


तेरे गेसुओं में कहीं खो गया हूँ

तेरे गेसुओं में कहीं खो गया हूँ
ज़माने से ही मैं जुदा हो गया हूँ

तेरा नाम सुनकर अभी जाग जाता
सदा के लिए जाँ मगर सो गया हूँ

नहीं आज दिल में कोई ज़ौक़-ए-वसलत
सनम जीतेजी मैं फना हो गया हूँ