Tuesday, February 16, 2016

जाने क्यूँ संघदिल से ही फिर इश्क़ फ़रमाता हूँ मैं

जाने क्यूँ संघदिल से ही फिर इश्क़ फ़रमाता हूँ मैं 
राज़ लाता हूँ लबों तक और पछताता हूँ मैं 

ज़ब्त कर के हर ख़लिश इस ज़िन्दगी के नाम पर 
महफ़िलों में गीत गाता नाचता जाता हूँ मैं 

कुछ सितारे आसमाँ से टूट कर गिर जाएंगे 
रात भर छत पे खड़ा हो नज़रें दौड़ाता हूँ मैं 

साक़िया के गेसुओं में जब उलझती उंगलियां 
वो लिपट जाता है मुझसे यूँ सुलझ जाता हूँ मैं 

एक सूरज की तरह बस फ़ितरतन हर शाम ही 
सागरों में डूब जाता हूँ निकल आता हूँ मैं 

~Sagar

Beeti baate.n bhula ke hansta hu.n

Beeti baate.n bhula ke hansta hu.n
Apni ghazale.n jalaa ke hansta hu.n..

Log is baat par khafa mujhse..
Unko ungli dikhaa ke hansta hu.n...

Zikr chheda kisi ne ulfat ka..
Aur mai.n muh daba ke hansta hu.n

Rehnuma kar gaya mujhe tanha..
Apni manzil pe aa ke hansta hu.n...

Ye na samjho ke bach gaya 'Sagar'
Ashq moti bana hansta hu.n

koi dil se utar gaya jaise

....

koi dil se utar gaya jaise
koi mausam guzar gaya jaise

apni khaamoshiyaaN suna kar maiN
reza reza bikhar gaya jaise..

uske kehne pe kuchh nahi kehta
ye naa samjho ke dar gaya jaise..

maine kab haar yunhi maani hai
bas mera dil hi bhaR gaya jaise..

meri ghazloN pe rang yuN aaya hai
mera humdam saNawar gaya jaise..

alvida keh ke wo chala lekin
saaraa aalam thahaR gaya jaise..

Sagar
~ckh

Sunday, February 7, 2016

अँधेरी रात में मैंने ढुलकता चाँद पाया है

अँधेरी रात में मैंने ढुलकता चाँद पाया  है
महाभारत के किस रथ का ये पहिया छत पे आया है

उठाया है इसे हाथों में जिसने है वो अभिमन्यु
या केशव ने पितामह को कहीं इससे डराया है?

कहीं ये कर्ण के रथ का वो पहिया तो नहीं जिसने
अभागे सूर्य के बेटे को किसी रण में हराया है?

समय का चक्र लगता है ये टूटा हुआ पहिया
कई बीती हुयी सदियों का इसमें रंग समाया है

चल दोबारा ज़िन्दगी से प्यार कर

तू किसी शोख़ का सिंगार कर रख भी दे ये ख़ामोशी उतार कर तीरगी ये पल में टूट जायेगी  चल दोबारा ज़िन्दगी से प्यार कर एक ही नहीं कई शिकायतें ...