Tuesday, February 16, 2016

जाने क्यूँ संघदिल से ही फिर इश्क़ फ़रमाता हूँ मैं

जाने क्यूँ संघदिल से ही फिर इश्क़ फ़रमाता हूँ मैं 
राज़ लाता हूँ लबों तक और पछताता हूँ मैं 

ज़ब्त कर के हर ख़लिश इस ज़िन्दगी के नाम पर 
महफ़िलों में गीत गाता नाचता जाता हूँ मैं 

कुछ सितारे आसमाँ से टूट कर गिर जाएंगे 
रात भर छत पे खड़ा हो नज़रें दौड़ाता हूँ मैं 

साक़िया के गेसुओं में जब उलझती उंगलियां 
वो लिपट जाता है मुझसे यूँ सुलझ जाता हूँ मैं 

एक सूरज की तरह बस फ़ितरतन हर शाम ही 
सागरों में डूब जाता हूँ निकल आता हूँ मैं 

~Sagar

No comments:

चल दोबारा ज़िन्दगी से प्यार कर

तू किसी शोख़ का सिंगार कर रख भी दे ये ख़ामोशी उतार कर तीरगी ये पल में टूट जायेगी  चल दोबारा ज़िन्दगी से प्यार कर एक ही नहीं कई शिकायतें ...