बड़ा पायाब रिश्ता है मेरा मेरी ही हस्ती से
ज़रा सी आँख लग जाये, मैं ख़ुद को भूल जाता हूँ
(पायाब: shallow)
दरख़्तों को शिकायत है के तूफ़ाँ तोड़ जाते हैं
ज़रा सी शाम ढल जाये, तो साये छोड़ जाते हैं
मेरी बातों में अक्सर रौ कहीं से आ ही जाती है
किसी साये की नर्मी में तपिश हो धूप की जैसे