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Thursday, December 5, 2013

सीमाएं हैं हालातों की

हर गीत तुम्हारी देन प्रिये
हर नज़्म तुम्हारे बातों की
मैं कब मंचों पर आ पहुंचा
किताब लिए जज़बातों की

हर शब्द तुम्हारे चेहरे से
चुनकर के कविता में आयें
कोरे कागज़ पर होंठ तेरे
तस्वीरों में रंग भर जाएँ

श्रींगार करूँ कैसे शब्दों में
रूप तेरा अब ले आऊं.…
मेरी उलझन कुछ दूर करो
थोड़ा सा तो मैं लिख पाऊँ

मैं कौन भला इस महफ़िल में
कविओं के इन रातों की.....
हर गीत तुम्हारी देन प्रिये
हर नज़्म तुम्हारे बातों की


सब लोग यहाँ जी भर कर के
मुझको जो सुनने आयें हैं
कैसे बतलाऊँ अब इनको
के शब्दकोष मुस्काएं हैं

जो छवि तुम्हारी बसती है
मेरे अतृप्त कविमन में
कैसे बुन दूँ अब मैं उसको
सात सुरों के दर्पण में.…

अधिकार नहीं कुछ मेरा तुमपर
सीमाएं हैं हालातों की
हर गीत तुम्हारी देन प्रिये
हर नज़्म तुम्हारे बातों की..

Sunday, August 25, 2013

दिल के तारों को न छेड़ो साज़ वो काफी पुराना है


दिल के तारों को न छेड़ो साज़ वो काफी पुराना है
जो हमसे तुम पूछ रहे हो राज़ वो काफी पुराना है

दो लफ़्ज़ों की बात थी लेकिन जाने कितना बोल गए
उनके आगे भूल गए जो अलफ़ाज़ वो काफी पुराना है

बात न करना या यूँ करना के जैसे कोई बात नहीं
जुल्फों में ऊँगली उलझाना अंदाज़ को काफी पुराना है

Thursday, July 11, 2013

कैसे अब हम भूलें तुम्हें मुश्किल है

कैसे अब हम भूलें तुम्हें मुश्किल है ...
क्या करें बच्चों सा ये अपना दिल है ...

बाद तुम्हारे सूनी लगेंगी सब राहें 
जहाँ अकेले हो जाएँ कैसी मंजिल है .. 

वादा है अब न बोलेंगे दिल की बातें 
यार मेरा देखो तो कितना संघ्दिल है ...

ग़ज़लें भी सब आप की हैं और नग्मे भी 
आप न होंगे तो जीवन का क्या हासिल है

डूब ही जातें आप की आँखों में लेकिन 
सोचते हैं के नाचीज कहाँ इस काबिल है ..


शायर शायर कह के लोग बुलाते हैं
कितनी फीकी देखो तो ये महफ़िल है...


दरिया से तो हो आये हम बच कर के
जान का दुश्मन बन बैठा ये साहिल है ...

Thursday, June 7, 2012

मासूम से सवाल में, उलझा रखा है दिल


मासूम से सवाल में, उलझा रखा है दिल ;
इक बावले ख़याल में, उलझा रखा है दिल ;

जीते थें जिस निगाह पर, हर शै निसार कर; 
उसने ही तो रुमाल में, उलझा रखा है दिल ;

यूँ तो किसी उम्मीद का, हमपर असर नहीं;
पर दिन महीने साल में, उलझा रखा है दिल; 

कुछ था न कुछ ले आये थें, महफ़िल में तेरी हम; 
देखो मगर मलाल में, उलझा रखा है दिल;

ठोकर में रख चले सभी, आराईशों को हम 
तुम हो के किस बवाल में, उलझा रखा है दिल 






आराईशों: embellishments.




-ckh-

Wednesday, October 20, 2010

सिन्दूरी आँचल शाम के बादल


सिन्दूरी आँचल शाम के बादल

चंदा का यूँ शर्माना
कितनी मधुर है प्रेम की बेला
कितना मधुर तेरा आना


इन साँसों की तुम सरगम हो
धड़कन की तुम हो शेहनाई
पल भर जो आकर मिलती हो
मिट जाती है सब तन्हाई
क्या मांगे अब वो इश्वर से
सोच में तेरा दीवाना

मन की गलियों में झंकृत हो
बन कर के पायल की धुन
वीणा की जैसे तान कोई हो
मीठा सा इक स्वर रुनझुन
लायी हो इंतना संगीत कहाँ से
मुझको ज़रा ये बतलाना



विधाता की कोई रचना हो तुम
क्या लिखे कहो तुमपे ये कवी
शब्दों में उतारे कोई तुमको
ऐसी कहाँ बोलो है ये छवि
रूप में जल के क्या हाल हुआ है
कैसे कहे ये परवाना





क्या होठों पे तुम रखती हो
हर शब्द कलि बनके ढल्कें
ये नयन दो मद से हैं भरे
मुस्काई जो तुम ये छलकें
सीख भी लो अब रूप पे अपने
थोड़ा  सा तुम इठलाना


सिंदूरी आँचल ....

Monday, October 18, 2010

सोचने कब दिया

जिंदगी ने हमे तो था गम सब दिया
हंसाते रहे तुम सोचने कब दिया

हर नए शेर की तुम पहचान हो
शायरी का है तुमने नया ढब दिया

जिस गली में हारे अपनी खुदी
देने वाले ने हमको वहीं रब दिया

आँचल के कोने में लपेटें वो उंगली
कब साँसें रूकीं गिरेह कब दिया

बाग़ का हर फूल मेहरबान तुम्हारा
खिलने का कलि को तुमने सबब दिया

मेरे सच्चे शेर

 बड़ा पायाब रिश्ता है मेरा मेरी ही हस्ती से ज़रा सी आँख लग जाये, मैं ख़ुद को भूल जाता हूँ (पायाब: shallow)  दरख़्तों को शिकायत है के तूफ़ाँ ...