Tuesday, October 7, 2025

मेरे सच्चे शेर

 बड़ा पायाब रिश्ता है मेरा मेरी ही हस्ती से

ज़रा सी आँख लग जाये, मैं ख़ुद को भूल जाता हूँ

(पायाब: shallow) 



दरख़्तों को शिकायत है के तूफ़ाँ तोड़ जाते हैं

ज़रा सी शाम ढल जाये, तो साये छोड़ जाते हैं 


मेरी बातों में अक्सर रौ कहीं से आ ही जाती है 

किसी साये की नर्मी में तपिश हो धूप की जैसे 

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