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Saturday, December 21, 2013

चंदा कोई बात तो कर

चंदा कोई बात तो कर
कैसे होगी ये रात गुज़र

कह भी तो दे दिल की लगन
प्यार है क्या, क्या है चुभन
हाल पे है किसका असर
चंदा कोई बात तो कर

मैं ही कहूं मैं ही सुनूँ
उदास रहूँ, ख्वाब बुनूं
कबतक यूँही हो उम्र बसर
चंदा कोई बात तो कर

तनहा रहा तन्हा जिया
दर्द लिया, प्यार दिया
तू ही बता कब होगी सहर
चंदा कोई बात तो कर

नींद में हैं सारा शहर
जाग रहा मैं हूँ मगर
आजा मेरे कमरे में उतर
चंदा कोई बात तो कर

Thursday, October 28, 2010

रंज बन के जब धुवाँ आँखों पे यूँ ही छा गया

रंज बन के जब धुवाँ आँखों पे यूँ ही छा गया
तब उसे भी पागलों सा खुद पे हँसना आ गया

हार के रोया न होता दिन सारा पर वो रो पड़ा
खुद खुदा आ ख़्वाबों में सजदा करना सिखा गया

आयतों में पीर कहता तो सही सब बात है
वो यहाँ लगता है लेकिन काफी कुछ छुपा गया

आज तू हँसता क्यूँ काफिर हाल पे उसके बता
सोचता हूँ वो क्या हारा, और तू क्या पा गया ?

तू न समझा उम्र के पहलू कभी ऐ नासमझ
और नासमझी में अपनी तू बस सवाल उठा गया

Monday, October 25, 2010

उन दिनों तुम न थे


जिन दिनों उम्र पर तन्हाई का बुखार था
टूटता शरीर और ह्रदय तार-तार था
चिलचिलाती धुप में छाँव ढूंढ रहा था मैं
वीरानी पड़ी बस्तियों में गाँव ढूंढ रहा था मैं
मेरे हर इक स्वप्न पर वक़्त का प्रहार था
उन दिनों तुम न थे
उन दिनों तुम न थे

रक्त-लेप भाल पर
मैं समय की ताल पर
गर्त नापता गया
अंतर झाँकता गया
समाज रुष्ट जब हुआ मेरे हर सवाल पर
उन दिनों तुम न थे
उन दिनों तुम न थे

स्वाभिमान हार कर असहाय था जब पड़ा
जागता था रात-रात, शोक था जब बड़ा
साँस-साँस में एक बस ही पुकार थी
हार स्वीकार थी, मौत की गुहार थी
निर्वस्त्र बीच बाज़ार में सर झुका था मैं खड़ा
उन दिनों तुम न थे
हाय! तब तुम न थे

दोष शास्त्र ने मढा जब हाथ की लकीर पर
कुंडली भी हंस पड़ी जब भाग्य के फ़कीर पर
न कोई जब विकल्प था
चला लिए संकल्प था
जब हँसा वो योद्धा मेरे खाली तुनीर पर
हाय! तब तुम न थे
उन दिनों तुम न थे

Wednesday, October 13, 2010

शाम होते ही तलास-ऐ-आशियाँ होने लगी


शाम होते ही तलास-ऐ-आशियाँ होने लगी

खुद से बातें छोड़ दीं खामोशियाँ होने लगी
दिल की सब बातें नज़र से बयाँ होने लगी

अब नहीं रोके रुके है
आसूवों का सिलसिला
क्या कहें किनसे है शिकवा
और किनसे था गिला
महफ़िल में आम सब बातें-पिन्हाँ होने लगी...१

रोज़ सोचें हम ठहर कर
और आगे अब कहाँ
दैर हमसे दूर है
दर नहीं कोई यहाँ
शाम होते ही तलास-ऐ-आशियाँ होने लगी...२

इक सदी से छाई रही
वीरानी औ खिजा जहाँ
हम वहीं पर चले सजाने
ख़्वाबों का इक बागबाँ
जिंदगी जीने की फिर हसरत जवाँ होने लगी...३

हमको कब मालूम था
के हम अकेले थें खड़े
वो तमाशाई फकत थें
जिनके खातिर हम लड़े
'चक्रेश' जुदा सब अपनी परछाईयाँ होने लगी...४

यूँ तो तनहा ही सफ़र था
था न कोई कारवाँ
हम किनारों पे कहीं थें
और न था कोई वहां
आज क्यूँ हर हमपे नज़र मेहरबाँ होने लगी...6


Ckh.

Monday, October 11, 2010

ये शाम कहीं फिर मुझसे न


ये शाम कहीं फिर मुझसे न
कोई कविता लिखवा जाए
कहीं अनकही बात कोई फिर
इन पन्नो पे न आ जाए

हाथ बाँध दो कोई मेरे
मुझे कहीं और ले जाओ
शोर मचा दो बस्ती में
मौन मुझे बस दे जाओ
मन के गलियारों में फिर से
भूला बचपन न छा जाए

क्यूँ करती हो अट्हास मुझसे
ऐ डूबती किरणों बोलो
उपहासित करते हो क्यूँ मुझको
शब्द माला के वर्णों बोलो
अंतर मन की पीड़ा का
कोई थाह कहीं न पा जाए

न करो बात मुझसे तुम ऐ मन
भावुकता से मैं दूर सही
नहीं चाह मुझको भावों की
चूर ह्रदय सो चूर सही
कहीं कोई स्नेह भाव से
घाओं को न सहला जाए

ह्रदय का मद्धम साँसों का
रुक रुक कर आना जाना
मंद सुरीली पुरवाई का
कानों में कुछ कह जाना
कहीं पल भर का सुख दे कर
मुझको न रुला जाए

Monday, September 27, 2010

शाम रिन्दों ने हमको पिलाया बहुत


शाम रिन्दों ने हमको पिलाया बहुत
हौसला टूटे दिल को दिलाया बहुत

हम भी पीते रहे,
घाव सीते रहे
भूल हम ना सके फिर भी उनको कभी
देखो होता है वो
होना होता है जो
मिल ना पाये दो दिल मिलाया बहुत

सजती दुल्धन कहीं
खूबसूरत कोई
जैसे अम्बर से उतरी हो कमसिन परी
आखों में है उसकी
बस मूरत यही
ना टूटे ये मूरत हिलाया बहुत

ऐसे देखो कभी
ऐसा होता है भी
फूल गुलशन में खिलता बिखर जाता है
फिर भी दुखता है मन,
क्यूँ उस फूल प़र
खिल पाया ना जिसको खिलाया बहुत



जाम छलका किये
रात कटती रही
खुद को खोने का हमको गुमाँ हो गया
जाने किस सख्स से
हमने दिल की कही
होश आया जब उसने हिलाया बहुत

शाम रिन्दों ने हमको पिलाया बहुत.....................

Saturday, September 18, 2010

पत्थर का टुकड़ा

एक पहाड़ की चोटी
सदियों से इक ऊचाई पर टिक कर
लगातार खुला आसमान देखती आई है
और साथ ही नीचे वादी में बहते
तेज धार पानी की उथल पुथल को भी
आज अचना धरती के नीचे हुए हल्की सी गतिविधि से
सतेह पे बड़ा भूचाल आया था
और वो चोटी पहाड़ से टूट कर
घाटी में लुढ़कती ठोकर खाती आ गिरी
गिरते समय एक पल को खुला आसमान दीखता
और दूसरे पल नीचे जल का तेज़ प्रवाह
सदियों का भूत, वर्मान के कुछ क्षणों में परत दर परत खुलता चला गया
और वो पत्थर का टुकड़ा लुढ़कता चला गया
लुढ़कता चला गया

उन पे रोना, आँहें भरना, अपनी फ़ितरत ही नही

  उन पे रोना, आँहें भरना, अपनी फ़ितरत ही नहीं… याद करके, टूट जाने, सी तबीयत ही नहीं  रोग सा, भर के नसों में, फिल्मी गानों का नशा  ख़ुद के हा...